प्लेटो ने कहा है कि शब्दाडंबर लोगों के मस्तिष्क पर शासन करने की कला है। आधुनिक लोकतंत्रों में राजनीतिक भाषणबाजी लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए इशारों को आरोपों के रूप में हथियारबद्ध करने का औजार है। धारणा को ही सबूत बता देने की प्रवृत्ति इतिहास के विश्लेषण या उसकी समीक्षा को रोकती है। चुनावी प्रासंगिकता दरअसल सवालों के जवाब या समस्याओं के समाधान की मांग से जुड़ी है, लेकिन शब्दाडंबरों से ऐसा प्रतीत होता है, मानो यह पीड़ितों और खलनायकों की एक कथा हो।
स्क्रिप्ट के कॉपीराइट और नारे पट्टे पर उपलब्ध हैं, और अगर इसे स्टार्ट-अप के रूप में तब्दील किया जाए, तो यह एक नया व्यवसाय हो सकता है। विपक्षी पार्टियां और उनके नेता अक्सर सत्तारूढ़ पार्टी पर वे काम न करने का आरोप लगाते हैं, जो सत्ता में रहते हुए उन्होंने खुद भी नहीं किए थे। यह सामान्य तौर पर राजनीतिक सृजनात्मकता को कम कर देता है- राजनीतिक दलों का रुख स्थायी रूप से इस पर निर्भर करता है कि वे कहां हैं, सत्ता में या विपक्ष में। वैश्विक स्तर पर संस्थागत स्वायत्तता का मुद्दा उसकी स्थिति पर निर्भर करता है, और जो राजनीतिक उद्देश्य के अनुसार होता है। भारत में संस्थानों की स्वायत्तता अक्सर व्यक्तिगत रूप से हासिल की जाती रही है-इसका सबसे स्पष्ट प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए टी एन शेषण ने किया था।
सीबीआई इन दिनों फिर से खबरों में है। इसकी स्वायत्तता का मिथक बोफोर्स और उससे पहले से ज्ञात है। जैन हवाला मामले में पहली बार इसका खुलासा हुआ था और जो अदालत की निगरानी में जांच की जरूरत से स्पष्ट था। सीबीआई की स्वायत्तता की खोज विपक्ष में रहने वाले लोगों को लगातार रही है-यूपीए के दौर में अर्जुन मेघवाल जैसे भाजपा नेता इसकी खोज करते थे और अब बीजद के भर्तृहरि महताब इसकी तलाश कर रहे हैं।
इन वर्षों में सीबीआई ने कई नाम हासिल किए हैं-जिनमें सबसे हालिया नाम 'पिंजरे का तोता' है। 2012 में लालकृष्ण आडवाणी ने सीबीआई को 'यूपीए का सबसे भरोसेमंद गठबंधन साथी' बताया था। अक्तूबर, 2013 में अरुण जेटली (जो तब नेता प्रतिपक्ष थे) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर मांग की थी कि 'सीबीआई के राजनीतिकरण और जांच करने के इसके सुनियोजित तरीके के आरोपों की जांच सर्वोच्च न्यायालय के एक मौजूदा न्यायाधीश की अध्यक्षता में की जानी चाहिए।'
मई, 2014 के बाद कांग्रेस ने विभिन्न अवसरों पर मोदी सरकार पर राजनीतिक लाभ लेने और भाजपा के एजेंडे के विरोधियों पर निशाना साधने के लिए सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। हाल ही में मनमोहन सिंह ने आरोप लगाया कि सीबीआई जैसे राष्ट्रीय संस्थानों में माहौल खराब हो रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वायत्तता की मौसमी तलाश और स्वतंत्रता के सवाल भविष्य में भी बने रहेंगे, और सत्तारूढ़ दल को किसी तरह का मुगालता नहीं पालना चाहिए कि इस मामले में विपक्षी खेमे से उसे कोई राहत मिलेगी। नतीजा यह है कि प्रमुख जांच एजेंसी संदेह और आलोचना के बीच फंसी हुई है। दिल्ली से लगभग 1,500 किमी दक्षिण-पश्चिम में, भारतीय रिजर्व बैंक, मुंबई में विद्रोह की गर्जना तेजी से बढ़ रही है। यह सही है कि नोटबंदी के बाद एक गलतफहमी पैदा हुई, जो तब और बढ़ी, जब रिजर्व बैंक ने अपने खजाने में लौटी नकदी के आंकड़े का खुलासा किया। वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर के बीच जवाबदेही को लेकर झगड़ा बढ़ने पर इसमें बढ़ोतरी हुई, क्योंकि बैड लोन दस लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। मुख्य बात यह है कि चुनावी मौसम में वित्तपोषण और सार्वजनिक बैंकों को तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई के तहत लाने की जरूरत है। पिछले दिनों रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने रिजर्व बैंक की स्वायत्तता का झंडा बुलंद किया। 55 शब्दों के धाराप्रवाह अकादमिक वाक्य में आचार्य ने चेतावनी दी कि 'जो सरकारें केंद्रीय बैंक की आजादी का सम्मान नहीं करतीं, वे देर-सबेर बाजारों के क्रोध को जन्म देती हैं।'
रिजर्व बैंक के गवर्नर ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक प्रतिष्ठान से असहमत रहे हैं। यह असहमति एनडीए-1 के दौर में एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की बदहाली के दौरान रुपये के मूल्य पर भी थी और यूपीए-1 के समय 2008 के वैश्विक संकट से पहले ब्याज दर व्यवस्था पर भी। जबकि मौजूदा सरकार में यह विवाद एसईबी (स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड्स) के कर्जों के पुन: निर्धारण, नीरव मोदी-मेहुल चोकसी घोटाले की जवाबदेही, बुनियादी ढांचों के लिए वित्तपोषण, कर्जमाफी और एनपीए के निपटारे को लेकर है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने रुपये की गिरावट का मुद्दा उठाया और राजनीतिक निर्देश पर दिए जाने वाले कर्जों के लिए 'फोन बैंकिंग' जैसा मुहावरा गढ़ा। सत्ता से बाहर आने पर कांग्रेस ने भी रुपये के मूल्य में गिरावट, घोटालों और यहां तक कि रघुराम राजन को हटाने पर उसी तरह बदला चुकाया। मनमोहन सिंह ने मोदी सरकार पर रिजर्व बैंक की स्वायत्तता को कम करने का आरोप लगाया। अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों की तरह रिजर्व बैंक की स्वायत्तता का मुद्दा लगातार एक सवाल बना हुआ है और मौसम के अनुसार इसका गोलपोस्ट बदलता रहता है।
रोजगार का मुद्दा-जो राजनीतिक विमर्श का स्थायी विषय है-वैकल्पिक विचारों या दृष्टिकोण की उपेक्षा का प्रतीक है। भारत में हर साल लगभग एक करोड़ लोग रोजगार के बाजार में आते हैं। लेकिन इस मुद्दे की गंभीरता के बारे में कोई नहीं सोचता। केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों, पुलिस, स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे में खाली पद बारहमासी मुद्दे हैं। पर राजनीतिक दलों ने बेरोजगारी और खाली पदों को खत्म करने का प्रयास शायद ही कभी किया हो। गंभीर राजनीति के विकल्प में नारेबाजी का उभार इसकी एक वजह है। पिछले सितंबर में सरकार ने सभी विभागों और राज्यों को खाली पदों के बारे में रिपोर्ट देने के लिए कहा था। कोई नहीं जानता कि वह आंकड़ा आया या नहीं, पर राजनीतिक दल इस पर सवाल नहीं उठाते। संस्थागत क्षय का मुद्दा प्रमुख बीमारी है। शासन के महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस व्यक्तिगत भाषणबाजी में डूब गई है, जबकि कमजोर अर्थव्यवस्था के सशक्तिकरण के लिए मिल-जुलकर काम करने की आवश्यकता है।
-लेखक आईडीएफसी इंस्टीट्यूट में विजिटिंग फेलो हैं।