राज्यपाल का पद एक सांविधानिक और गरिमामय पद है। पर विगत कई दशकों में इस पद की गरिमा गिरी है। राज्यपाल का इस्तेमाल केंद्र सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए करती रही है, खासकर उन राज्यों में, जहां विरोधी दलों की सरकारें होती हैं। केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ राज्यपाल भी बदले जाते रहे हैं। भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार भी नए राज्यपालों को नियुक्त करना चाहती है। कुछ पुराने राज्यपालों ने त्यागपत्र दे दिए हैं, किंतु कइयों ने ऐसा करने से मना कर दिया है।
राज्यपाल की भूमिका पर संविधान सभा में विस्तार से चर्चा हुई और अदालत के समक्ष भी यह मामला आया। शुरू में अदालत ने केंद्र के फैसले की समीक्षा करने से इन्कार कर दिया। पर मई, 2010 में सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस पर विचार कर व्यवस्था दी कि हालांकि संविधान के अनुच्छेद 156 (1) के तहत राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत अपने पद पर रहते हैं और उन्हें हटाने के लिए कारण बताने की जरूरत नहीं है, पर राष्ट्रपति को अनुचित तरीके से काम नहीं करना चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि हटाए गए राज्यपाल प्रथम दृष्टया यह प्रमाणित कर देते हैं कि उनके विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई हुई थी, तो अदालत सरकार को वह तथ्य प्रस्तुत करने को कह सकती है, जिसके आधार पर राष्ट्रपति ने प्रसन्नता वापस ली। यह न्यायिक सक्रियता का भी उदाहरण है। यह स्वीकारने के बावजूद, कि कारण बताना जरूरी नहीं, राष्ट्रपति के फैसले को न्यायिक समीक्षा के दायरे में लेकर अदालत ने अपने हाथ में शक्ति ले ली।
2004 में संप्रग सरकार ने जब पूर्ववर्ती राजग सरकार द्वारा नियुक्त कुछ राज्यपालों को हटाया था, तब बीपी सिंघल ने उसे शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। सरकार ने दलील दी थी कि उसे यदि किसी राज्यपाल पर भरोसा नहीं है, तो उसे बिना कारण बताए हटाने का अधिकार है। अदालत ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 156 (1) के तहत प्रदत्त अधिकार का इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता। राज्यपाल को हटाने का यह आधार नहीं हो सकता कि उसकी विचारधारा केंद्र सरकार की नीतियों एवं विचारधारा से मेल नहीं खाती।
सवाल यह है कि जब 2004 में राज्यपालों को हटाए जाने का भाजपा ने इतना विरोध किया था, तब फिर वह खुद ऐसा क्यों कर रही है। संघीय ढांचे को दुरुस्त रखने में राज्यपाल की अहम भूमिका है। इसीलिए सरकारिया आयोग ने राज्यपाल पद की गरिमा बहाल करने पर जोर दिया। इस आयोग के मुताबिक, 1947 से 1986 के बीच 154 में से 104 राज्यपाल पांच वर्षों का अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। बाद में एमएन वैंकेटचलैया की अध्यक्षता में गठित संविधान समीक्षा आयोग ने पांच साल का निश्चित कार्यकाल देने की अनुशंसा के साथ कहा कि राज्यपालों को केवल महाभियोग के जरिये हटाया जाना चाहिए। यदि ऐसा हो, तो राज्यपाल उच्च या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह निर्भीक होकर काम करेंगे। नरेंद्र मोदी सीधे मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बने हैं। इसलिए उन्हें राज्यों की परेशानियों का पता है। इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि उनके दौर में संघीय ढांचा प्रभावित नहीं होगा, राज्यपालों के साथ राजनीति नहीं होगी और राजभवन में सम्मानित व्यक्तियों को भेजा जाएगा।