नक्सलियों के हर बड़े हमले के बाद उम्मीद बनती है कि शायद अब रणनीति में बदलाव होगा। पर ऐसा होता नहीं है। जिम्मेदार लोग चाहे वे केंद्र के हों या राज्य के, हर बड़े नक्सल हमले के कुछ समय बाद चुप्पी-सी साध लेते है। जबकि नक्सली ज्यादा तेज और आक्रामक तरीके से रणनीति में बदलाव कर रहे है।
बीते साल अप्रैल में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण कर नक्सलियों ने पूरे देश में इस इलाके को चर्चा में ला दिया था। अब उन्होंने उसी जिले में अब तक की सबसे बड़ी नक्सल वारदात को अंजाम दिया।
आकार में केरल से भी बड़े बस्तर का एक बड़ा हिस्सा बेहद दुर्गम जंगलों से घिरा है। ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के नक्सल असर वाले इलाके इससे लगे हुए है। करीबी झारखंड के धुर नक्सली इलाकों का जंगल भी राज्य से मिला है। और इसी भौगोलिक स्थिति ने नक्सलियों के लिए बस्तर को सबसे सुरक्षित ठिकाना बना दिया है।
राज्य सरकारों में तालमेल की कमी और नक्सल समस्या के प्रति ढुलमुल रवैये ने हाल के दिनों में नक्सलियों को एक मजबूत और गुरिल्ला वार के लिए बेहद प्रशिक्षित फोर्स के रूप में तब्दील कर दिया है। बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों के जवानों की हत्या कर उनसे लूटे हथियारों के बल पर उन्होंने आधुनिक हथियारों से लैस कई बटालियनें खड़ी कर ली हैं। तेंदू पत्ता ठेकेदारों, विकास कार्यों में लगे ठेकेदारों से वसूली और वैध व अवैध खनन में हिस्सेदारी के जरिये उनकी कमाई भी कम नहीं है।
नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन केंद्र और राज्यों की संयुक्त जिम्मेदारी है। बिना आपसी तालमेल के नक्सलियों पर काबू पाना आसान नहीं है। पड़ोसी राज्यों का सहयोग और समन्वय एक अहम मसला है। लेकिन लंबे समय से साझा हमले या शांति वार्ता के जरिये समस्या को सुलझाने की कोई ठोस और कारगर रणनीति नहीं बन पाई है।
नतीजतन नक्सली लगातार ताकतवर होते जा रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों ने पहले इसे सिर्फ जंगल यानी आदिवासी इलाकों की समस्या मानकर आंखें मूंद रखीं। धीरे-धीरे एक प्रशिक्षित आर्म्ड फोर्स में तब्दील हो रहे नक्सलियों को गली के गुंडे या छोटे-मोटे गिरोह के रूप में समझने की भूल भी होती रही।
करीब तीन साल पहले नक्सलियों के सफाये के लिए केंद्र और राज्य के बीच काफी कुछ तालमेल का संकल्प दिखा था। लेकिन वह प्रयास भी अंततः राजनीति की भेंट चढ़ गया। बाद में तो यह दावा ही किया जाने लगा कि ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसा कोई अभियान था ही नहीं। लेकिन उस दौर में पहली बार नक्सली दबाव में दिखे थे। पर बाद में केंद्र पीछे हट गया और राज्यों को ही नक्सलियों से निपटने की जिम्मेदारी थमा दी गईं।
यह समझना होगा कि नक्सल समस्या का हल फौरी तौर पर नहीं निकल सकता। इसमें जरूरत केंद्र और राज्य के दृढ़ संकल्प की ही है। इससे कम समय में हल सिर्फ श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ जाफना में की कई बर्बर सैन्य कार्रवाई से ही हो सकता है।
लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में न यह संभव है और न ही उचित। जिन इलाकों में नक्सली छिपते हैं, वहीं बड़ी संख्या में निर्दोष आदिवासी भी गुजर-बसर करते हैं। सिर्फ शांति वार्ता के जरिये नक्सली समस्या से मुक्ति पा लेने का रास्ता भी एक दिवास्वप्न ही है।
नक्सली गुरिल्ले घात लगाकर हमले की रणनीति अपनाते हैं। इसमें लगातार हो रहे एकतरफा हमलों से ऐसा लगने लगा है कि सुरक्षा बलों के जवानों और आम लोगों की लगातार हत्याएं सहना देश की नियति बन चुका है। अब छत्तीसगढ़ कांग्रेस के बड़े नेताओं पर हमले के बाद शायद केंद्र और राज्य सरकारें चेत जाएं और नक्सल समस्या के हल पर कोई व्यापक रणनीति बना सकें।
पड़ोसी राज्यों से तालमेल क्यों नहीं बन पा रहा, राज्यों की अपनी रणनीति क्या है, केंद्र की नीति साफ क्यों नहीं है, केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय क्यों नहीं है, नक्सल समस्या के हल के लिए किसके जरिये आगे बढ़ा जाएगा, ये ऐसे तमाम सवाल हैं, जिनके जवाब अब साफ होने चाहिए। इन सवालों के जवाब के बिना नक्सलियों से निपटने की ईमानदार और कारगर रणनीति कभी बन नहीं पाएगी।