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पतन की अंधी लीग में

Wed, 29 May 2013 02:31 PM IST
कुमार प्रशांत
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यह कैसी करुण स्थिति है कि आप क्रिकेट की बात करने बैठें और याद आए आपको पाकिस्तान जेल में बैठकर लिखी फैज अहमद फैज की नज्म-निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन कि जहां/चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले/बने हैं अहले-हवस मुद्दई भी मुंसिफ भी/किसे गवाह करें, किससे मुंसिफी चाहें!
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आईपीएल खत्म हो चुका है। रोहित शर्मा अपना कप लेकर अंधकार में विलीन हो चुके हैं और धोनी अपने क्रिकेट जीवन के सबसे अंधेरे दौर में प्रवेश कर चुके हैं। इस जीत-हार से बेखबर, कोलकाता के अद्भुत इडन गार्डेंस में क्रिकेट करीब-करीब दम तोड़ती हालत में पड़ा है!

हर टूटती छोटी-बड़ी चीज व्यक्ति और सामाजिक ताने-बाने को किस कदर खोखला करती आई है, यह हम पिछले दिनों से लगातार इस तरह देख रहे हैं। इसलिए हर आवाज आशंकित करती है, हर किरीच दिल में उतर जाती है!
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आईपीएल में जो हुआ, उसे किसी श्रीनिवासन की बेईमानी बताकर हम निकल नहीं सकते। और थोड़ी गहराई से समझेंगे, तो समझ पाएंगे कि यह जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ खेल नहीं, आदमी का और समाज का पतन है। क्रिकेट की कभी यह शान थी कि यदि आप कुछ भी ऐसा करते हैं, जो नियम-मर्यादा-चलन या शालीनता के खिलाफ जाता है, तो अंग्रेजी में कहावत ही थी-नो, दिस इज नॉट क्रिकेट।

जो गलत है, वह क्रिकेट नहीं है। मतलब सही होगा, योग्य होगा, तभी क्रिकेट होगा। अब श्रीनिवासन हमें नई परिभाषा सीखने को कह रहे हैं कि जो पकड़ा न जा सके, वह क्रिकेट है, भले उससे बेईमानी की बू आती हो।

लेकिन हैरानी यह है कि इतना कुछ होने के बाद भी न सुनील गावस्कर ने इस बारे में कुछ कहा, न रवि शास्त्री ने। इसमें दो राय नहीं कि आईपीएल से व्यापारिक नाता रखने वालों को छोड़ दें, तो इससे सबसे ज्यादा फायदा सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री ने उठाया है।

फायदा उठाना बेईमानी करना नहीं होता, लेकिन आप जिससे फायदा उठाते हैं, उसके प्रति ईमानदार हैं, तो उसकी जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है। सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री की यह नैतिक व पेशेवराना जिम्मेदारी बनती है कि वे आईपीएल के इस पतन में कहां, किधर और किसके साथ खड़े हैं, यह बताएं।

श्रीनिवासन कहते हैं, और कुछ ऐसा मुंह बनाकर कहते हैं, जैसे उन्हें बू आ रही हो कि मैं आईपीएल देखता भी नहीं हूं, चेन्नई सुपरकिंग्स का खेल देखने जाता भी नहीं हूं। ऐसा है, तो श्रीनिवासन साहब, आपको भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का अध्यक्ष बने ही क्यों रहना चाहिए?

यह अधिकार उसका है, जो क्रिकेट से प्यार करता हो। सीमेंट की कंपनी चलाने में वह जितनी दिलचस्पी लेते होंगे, भारतीय क्रिकेट की अध्यक्षता उससे कहीं ज्यादा की मांग करती है, क्योंकि वहां अध्यक्ष को क्रिकेट का सीमेंट बनना पड़ता है।

आज भारतीय क्रिकेट जहां खड़ा है, वहां उसे शरद पवार, राजीव शुक्ला, अरुण जेटली, रत्नाकर शेट्टी, निरंजन शाह, शशांक मनोहर, आदि-आदि क्या कहते हैं, यह सुनने की जरूरत नहीं है। अगर जरूरत है, तो यह कहने की कि आप सब चुप भी रहें और क्रिकेट से दूर भी रहें।

अब क्रिकेट के बारे में वे लोग बोलें, जो आज जो भी हैं, वह क्रिकेट की बदौलत हैं। इसलिए सुनील गावस्कर, रवि शास्त्री, कपिल देव, अनिल कुंबले, सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ बोलें। अभी क्रिकेट की आवाज में बोलने की जरूरत है, क्योंकि अभी वहां पद बोल रहा है, पैसा बोल रहा है, राजनीतिक तिकड़मबाज बोल रहा है और वे बोल रहे हैं, जिन्होंने क्रिकेट को बेच दिया है।

हम यह न भूलें कि सच की ताकत प्रकट ही तब होती है, जब उसे आवाज मिलती है। वर्ष 2000 में हमारे यहां मैच फिक्सिंग का मामला गंभीरता से पहली बार सामने आया था। तब मोहम्मद अजहुरुद्दीन हमारे कप्तान हुआ करते थे। उनकी क्रिकेट प्रतिभा पर किसी को शंका नहीं थी, शंका थी उनकी ईमानदारी पर। इस बारे में सभी जानते थे-सुनील गावस्कर भी, रवि शास्त्री भी, कपिल देव भी और दूसरे भी। लेकिन वे सब चुप रहे।

वह आंच कपिल देव तक भी पहुंची थी और हमने उन्हें टीवी पर जार-जार रोते देखा था। अपने आंसुओं से कपिल देव ने खुद को तो बचा लिया, लेकिन अपने शब्दों से भारतीय क्रिकेट को नहीं बचा सके। उस वक्त इन सारे महान खिलाड़ियों ने अगर क्रिकेट की फिक्र की होती, तो अजहर, मनोज प्रभाकर, अजय जडेजा सब श्रीसंत के रास्ते ही जाते।

पर क्रिकेटरों की चुप्पी और हमारे कानून की अस्पष्टता ने उन्हें जेल जाने से बचा लिया। अब वही अजहर कांग्रेस के सांसद बनकर संसद में बैठते हैं, तो क्या आप क्रिकेट में बेईमानी के खिलाफ कोई आवाज उठा सकते हैं? अजय जडेजा विशेषज्ञ बनकर पेश होते हैं, तो क्रिकेट को मुंह छिपाने की कोई जगह मिलती है?

आईपीएल में खेल रहे जैक कालिस कहते हैं कि मुझे इससे दुख भी होता है और गुस्सा भी आता है कि इतने सारे ईमानदार व समर्पित क्रिकेटरों की नहीं, लोग दो-एक बेईमानों की बात ज्यादा करते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि सारा आलम तो उन जैसे क्रिकेटरों की जरूरत से ज्यादा चर्चा और पूजा से भरा हुआ है।

क्रिकेटरों के पास देश-समाज को देने के लिए खेल के अलावा क्या है? तो क्रिकेट के प्रति ईमानदारी तो हो। वह भी नहीं है। वसीम अकरम ने ठीक कहा है कि आईपीएल के इस दाग को छुड़ाना आसान नहीं होगा। लेकिन जिंदगी हमेशा आसान विकल्प कहां देती है। क्रिकेट पर बाजार का दाग गहरा लगा है। यह दाग ईमानदारी के साबुन से ही छुड़ाया जा सकता है, जो महंगा तो होता है, लेकिन गारंटी वाला होता है। अब देखना है कि इस साबुन के कितने खरीदार आते हैं।
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