उत्तराखंड में आई अभूतपूर्व प्राकृतिक तबाही सिद्धांतों और नीतियों की बात करने वाले पर्यावरणविदों के लिए विकास कार्यों पर निशाना साधने का बहाना नहीं बनना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से, ऐसा ही हो रहा है। वहां बहस तो प्रशासनिक विफलता पर होनी चाहिए, जो प्राकृतिक कोप के दंश को मारक बना रही है, परंतु पर्यावरण को लेकर हल्ला-मचाने वाले लोग बांध, जल विद्युत व सिंचाई परियोजना, शहरीकरण और पर्यटन पर हमले कर अपना एजेंडा थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जो गलत है।
ऐसे लोग गलत कैसे हैं, इसे स्पष्ट करने से पहले उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को समझने की कोशिश ज्यादा जरूरी है। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से कटकर अलग उत्तराखंड राज्य बना। तबसे इसने उल्लेखनीय आर्थिक विकास किया है। वर्ष 2005-06 में उत्तराखंड के सकल घरेलू उत्पाद में 14.34 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जो राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (9.49 प्रतिशत) से ज्यादा था। बाद के वर्षों में भी इन आंकड़ों में उल्लेखनीय वृद्धि होती रही। इसी तरह 2007-08 में राष्ट्रीय विकास दर में 9.32 प्रतिशत की वृद्धि हुई, तो उत्तराखंड में 18.12 प्रतिशत।
अगर एक वर्ष को अपवाद मान लें, तो पिछले आठ वित्त वर्षों में उत्तराखंड का सकल घरेलू उत्पाद राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में ज्यादा ही रहा।
उच्च सकल घरेलू उत्पाद के कारण उत्तराखंड में संपन्नता भी आई। योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2004-05 में राज्य में करीब 32.7 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे थे, जबकि उस समय देश में 37.2 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे थे, लेकिन अगले पांच वर्षों में ही इस आंकड़े में जबर्दस्त कमी आई। वर्ष 2009-10 में जहां देश की 29.8 फीसदी आबादी गरीब थी, वहीं इस हिमालयी राज्य में 18 फीसदी लोग ही गरीबी रेखा के नीचे थे।
यह आर्थिक विकास राज्य की उस ग्रामीण आबादी के लिए वरदान साबित हुआ, जिसकी हिस्सेदारी राज्य की आबादी में 70 फीसदी है। वर्ष 2004-05 में राज्य में 35.1 फीसदी ग्रामीण आबादी गरीब थी, हालांकि तब देश में यह आंकड़ा 42.1 फीसदी था। लेकिन अगले पांच वर्षों में उत्तराखंड में गरीबों की आबादी सिमटकर मात्र 14.9 फीसदी रह गई, जबकि देश में 33.8 फीसदी ग्रामीण आबादी गरीबी में जीने को अभिशप्त थी। स्पष्ट है कि उत्तराखंड में उच्च आर्थिक विकास से केवल अमीर ही और अधिक संपन्न नहीं हुए, बल्कि राज्य से गरीबी भी मिटी।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि राज्य में सब कुछ ठीक ही रहा। आंकड़े बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में गरीबी अपेक्षाकृत कम मिटी। वर्ष 2004-05 में 26.2 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे थी, जिसमें 2009-10 तक मामूली कमी (25.2 प्रतिशत) ही आई। यहां असंतुलित विकास भी एक मुद्दा है। उदाहरण के लिए, आधारभूत ढांचों का विकास अधिकतर मैदानी इलाकों में ही हुआ। मैदानी इलाकों की 90 फीसदी भूमि सिंचित है, तो पहाड़ी इलाकों में 91 प्रतिशत कृषि भूमि वर्षा आधारित है। इसका नतीजा है कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) में पूरे देश में कृषि विकास दर जहां 3.7 फीसदी थी, वहीं उत्तराखंड में यह 3.2 फीसदी रही।
लेकिन यह ऐसी समस्या नहीं है, जिसका समाधान 'बाहरी' सिद्धांतों के आधार पर हो, जिसकी वकालत कथित पर्यावरणविद कर रहे हैं। ऐसे लोग आर्थिक विकास को घृणा की नजर से, विकास को बीमारी के रूप में और पर्यटन को अभिशाप के तौर पर देखते हैं। उत्तराखंड में विकास का लाभ सिर्फ अमीरों को नहीं मिला है। विकास और संवृद्धि रोजगार और संपन्नता के द्वार खोलती है, शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधा देकर सामाजिक उन्नति का ताना-बाना बुनने में मदद करती है और मानव अस्तित्व के नए आयाम खोलती है। इसी तरह, पर्यटन भी एक पर्यावरण-हितैषी प्रक्रिया है, जो समाज के सभी तबके के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाती है।
यह समझ लेना चाहिए कि उत्तराखंड को नुकसान विकास और पर्यटन से नहीं, बल्कि कुशासन से पहुंचा है। तथ्य यह है कि विवेक और वैज्ञानिक कायदों को पूरी तरह दरकिनार कर उन स्थलों पर निर्माण कार्य को मंजूरी दी गई, जिसे अक्षुण्ण रखना चाहिए था। देश के अन्य क्षेत्रों की तरह ही यहां भी अनाधिकृत निर्माण कार्य कुकुरमुत्ते की तरह फलते-फूलते रहे। इसलिए मौजूदा आपदा की दोषी राजनीतिक और प्रशासनिक उदासीनता व भ्रष्टाचार है, कुछ लोग बेकार ही विकास और पर्यटन को बलि का बकरा बना रहे हैं।
ऐसे लोगों को बताना चाहिए कि पर्यटन रोजगार ही नहीं लाता, गरीबी उन्मूलन में मदद करता है और राज्य सरकार के लिए राजस्व और विदेशी मुद्रा का इंतजाम भी करता है। यह भी भ्रांत धारणा है कि पर्यटन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। वर्ष 2011 में फ्रांस में आठ करोड़ और स्पेन में 5.7 करोड़ विदेशी पर्यटक आए, जो उनकी आबादी से भी ज्यादा थे। छोटे-से देश मलयेशिया में भी 2.5 करोड़ विदेशी पर्यटक पहुंचे। लेकिन हमारे 'अतुल्य' भारत में विदेशी पर्यटकों की संख्या महज 63 लाख थी, जो पिछले वर्ष बढ़कर 66 लाख हुई।
यदि पर्यटन पर्यावरण के लिए नुकसानदेह होता, तो फ्रांस, स्पेन और मलयेशिया जैसे देश रेगिस्तान बन चुके होते। जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं। इसलिए बहस को विकास और पर्यटन की घनघोर निंदा की तरफ मोड़ने के बजाय जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक निष्ठुरता, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार जैसी बीमारियों का इलाज किया जाए, जो उत्तराखंड की मौजूदा आपदा की वजहें हैं। अगर इन्हें समय पर दुरुस्त कर लिया जाता, तो निश्चय ही जो तबाही आज दिख रही है, उसकी मारकता कम होती।