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हक से ज्यादा जिम्मेदारी है आजादी

सोनम वांगचुक Updated Tue, 14 Aug 2018 05:54 PM IST
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72वां स्वतंत्रता दिवस
इकहत्तर वर्ष पूर्व जब हम परतंत्रता की बेड़ियों से आजाद हुए थे, तो हमें न सिर्फ सैकड़ों वर्षों बाद आजाद हवाओं में सांसें लेने का मौका नसीब हुआ था, बल्कि अपने मुल्क की किस्मत अपनी पसंद के नुमाइंदों के हाथों में सौंपने का हक भी हासिल हुआ था। यही हक लोकतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है। चाहे जनता हो या शासक, बदकिस्मती से इन दोनों ने अब तक अपनी जिम्मेदारी को बहुत हल्के तौर पर लिया है। अधिकांश मामलों में न लोग अपना नेता चुनने में संजीदगी दिखाते हैं और न ही नेता अपना कर्तव्य निभाते दिखाई देते हैं।


मौजूदा दौर में अपने देश के प्रति निष्ठा या वफादारी दिखाने की बहस ऐतिहासिक रूप से जोरों पर है। अब तक चुनिंदा सार्वजनिक कार्यक्रमों में बजाया जाने वाला राष्ट्रगान सिनेमाघरों में भी बजाया जाता है। मैंने दुनिया के कई देशों की यात्रा की है, लेकिन शायद ही किसी देश में फिल्म देखने से पहले राष्ट्रगान के लिए लोगों को खड़े होते देखा हो। राष्ट्रगान के बाद कुछ लोग नारे भी लगाते हैं। लेकिन क्या सिर्फ नारा लगा देने से भारत माता की जय हो जाती है! 


मैं लद्दाख के ऐसे इलाके से ताल्लुक रखता हूं, जहां से चीन की सीमा बहुत दूर नहीं है। आए दिन सीमापार से घुसपैठ और छिटपुट हिंसा की खबरें आती रहती हैं। भारत माता की जय-जयकार करने वाले देश के आम नागरिक निश्चिंत रहते हैं कि देश की शक्तिशाली सेना उनकी रक्षा कर पाने में सक्षम है। क्या किसी मुल्क की ताकत उसकी सेना में होती है? नहीं, मुल्क की ताकत होती है उसके नागरिकों की कार्यक्षमता में, उसकी अर्थव्यवस्था में और राजनीतिक नेतृत्व की कुशलता में। लापरवाह शिक्षकों से पढ़े छात्रों से राष्ट्र निर्माण की भला क्या उम्मीद की जा सकती है!


भ्रष्ट विद्यालयों से निकले कमजोर नागरिकों के बूते आप चीन से मुकाबला करने की सोच भी नहीं सकते। यही हाल देश की स्वास्थ्य सेवाओं का भी है। पचास साल पहले एक जैसी अर्थव्यवस्था वाले चीन और भारत के बीच आज यदि पांच गुना का अंतर है, तो इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है राष्ट्र निर्माण के प्रति निष्ठा। हमारी निष्ठा सिनेमाघरों में राष्ट्रगान गाने तक सीमित है, पर वहां ऐसा नहीं है। अपने काम के प्रति वफादारी और जिम्मेदारी निभाना ही भारत माता की असली जयकार है। तभी हम सच्चे नागरिक कहलाने के हकदार होंगे। 


देश की अनेक चुनौतियों में सबसे बड़ी समस्या शिक्षा की है। पांच प्रतिशत बच्चे ऐसे विद्यालयों में पढ़ रहे हैं, जो अमेरिकी स्कूलों से भी महंगे हैं और बाकी के 95 प्रतिशत बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जो अफ्रीकी स्कूलों से भी बदतर हालत में हैं। ऐसे स्कूलों से निकले छात्र ही आगे चलकर सामाजिक असंतुलन व अस्थिरता के कारक बनते हैं। दुख की बात है कि सरकारें ग्रामीण विद्यालयों को पर्याप्त महत्व नहीं देती हैं। देश में शिक्षा का स्पष्ट बंटवारा हो चुका है। अमीरों की शिक्षा अलग, गरीबों की शिक्षा अलग। प्रोग्राम फॉर स्टूडेंट असेसमेंट (पीसा) के अंतर्गत दुनिया भर के छात्रों की गुणवत्ता आंकी जाती है। अनेक छोटे-छोटे पूर्वी एशियाई देश इस आकलन में आगे रहते हैं, जबकि भारत का स्थान 74 देशों में 72वां है। रैंकिंग की शर्मिंदगी से बचने के लिए 2009 से भारत इस कार्यक्रम में हिस्सा ही नहीं लेता है। देश की सबसे बड़ी समस्या से मुंह मोड़ लेने का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है! 


शिक्षा का मौजूदा स्तर देखते हुए कहा जा सकता है कि शायद हमारा देश आज भी गुलाम है। शिक्षा की भाषा भी एक बड़ी समस्या है। अंग्रेजी और अनेक मातृभाषाओं के बीच की खाई हर दिन बढ़ती जा रही है। होना यह चाहिए कि हर छात्र को बुनियादी शिक्षा उसकी मातृभाषा में ही दी जाए। उसकी उच्च दक्षता के लिए यह जरूरी है। जिन स्कूलों की पढ़ाई मातृभाषा में होती है, उनकी हालत खस्ता है, और जिनकी हालत सही है, वहां मातृभाषा अंग्रेजी के भार तले दबती जा रही है। शिक्षा की बदहाली दूर करने के लिए सबसे बड़ा इंकलाबी कदम यही होगा कि हर खास शख्सियत को अपने बच्चों को आम बच्चों के साथ पढ़ाना चाहिए।


समाज में व्याप्त गैरबराबरी भी हमारी बड़ी कमजोरियों में से एक है। राष्ट्र परिवार का ही एक बड़ा रूप होता है। परिवार में उस बड़े भाई को तब तक सिर उठाकर चलने में शर्मिंदगी महसूस होनी चाहिए, जब तक उसके अनुजों को सम्मानजनक जिंदगी न मयस्सर हो। संपन्न भारतीयों की यह जिम्मेदारी है कि वे कमजोर और वंचितों को बराबरी पर लाने के लिए पुरुषार्थ करें और उनकी किसी भी रूप में उनकी मदद करें। उदाहरण के लिए, हमारे लद्दाख में जब बड़े लामा दीक्षा देते हैं, तो दीक्षा लेने वाले हर व्यक्ति से एक वस्तु निशानी के तौर पर ली जाती है। कोई सोने की अंगूठी देता है, तो कोई मामूली कलम और कोई रूमाल से भी काम चला लेता है। सबसे वस्तुएं लेने के बाद बड़े लामा उन वस्तुओं की अक्रमतः जोड़ियां बनाते हैं।
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किसी गरीब की कलम की जोड़ी किसी धनवान की अंगूठी से बनती है। प्रत्येक जोड़ियों की बाकायदा घोषणा की जाती है। इन जोड़ियों को 'छुस्पुन' यानी धर्म का रिश्तेदार कहा जाता है। खून के रिश्ते से परे अमीर जोड़ीदार अपने गरीब साथी की मदद करते हुए जीवन भर नातेदारी बखूबी निभाते हैं। ऐसी धार्मिक प्रथाएं हैं, जो सामाजिक गैरबराबरी खत्म करने का माद्दा रखती हैं। क्या कुछ ऐसा ही पूरे देश में नहीं हो सकता, जिसमें देश का रिश्ता बनाने की कोई छुस्पुन प्रथा निभाई जाए!


दुनिया के शीर्ष धनवानों की सूची में भारतीयों के नाम बढ़ने से नहीं, बल्कि गरीबों की संख्या घटने से हमारी इज्जत बढ़ेगी। युवाओं को चाहिए कि पुरानी और वर्तमान की दोषपूर्ण व्यवस्था से प्रेरणा लेने के बजाय नई सोच के साथ एक नया माहौल बनाने की ओर बढ़ें। दुनिया के कई देशों में ऐसा संभव हुआ है।


आजादी ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें अधिकारों के अनेक फूलों के साथ जिम्मेदारियों के कुछ कांटे भी हैं। यदि हम केवल अधिकारों की बात करेंगे और जिम्मेदारियों से भागेंगे, तो यह उसी तरह होगा कि हम अपनी मां का दूध पीकर बड़े तो हो जाएं, पर बदले में उसे कुछ लौटाएं नहीं।

-लेखक अभिनव विचारक एवं शिक्षा सुधारक हैं।
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