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ज्ञान परंपरा का सम्मान: यूनेस्को से मान्यता मिलना पुनर्पाठ का अवसर, ये हमें जिम्मेदारी का स्मरण भी कराएगी

Sat, 07 Nov 2026 09:31 AM IST
न्यूज डेस्क अमर उजाला, नई दिल्ली।
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यूनेस्को में भारतीय मनीषा की तीन पांडुलिपियां शामिल (फाइल) - फोटो : AI Generated
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यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर’ में भारतीय मनीषा की तीन पांडुलिपियों- महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी  का शामिल होना महज एक सामान्य उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध विरासत और विलक्षण ज्ञान परंपरा का वैश्विक सम्मान है। यूनेस्को के इस निर्णय का महत्व इसलिए भी अधिक है कि जिन तीन ग्रंथों की पांडुलिपियों को यह मान्यता मिली है, वे भारतीय बौद्धिक परंपरा के तीन अलग-अलग, लेकिन परस्पर जुड़े आयामों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

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महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि मानवीय स्वभाव, नैतिक द्वंद्व, कर्तव्य, धर्म और सत्ता के संघर्ष का व्यापक आख्यान है। इसकी कथा और विचारों का प्रभाव भारत से बाहर एशिया के अनेक देशों की कला, संस्कृति और साहित्य पर भी पड़ा है। इसी तरह कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्राचीन भारत की राजनीतिक और आर्थिक समझ का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह ग्रंथ बताता है कि भारत में राज्य व्यवस्था और सुशासन को लेकर गंभीर चिंतन की परंपरा कितनी पुरानी रही है।

आज जब दुनिया के देश बेहतर प्रशासन, आर्थिक प्रबंधन और प्रभावी शासन के मॉडल तलाश रहे हैं, तब अर्थशास्त्र का महत्व केवल ऐतिहासिक अध्ययन तक सीमित नहीं रह जाता। संस्कृत में रचित कल्हण की राजतरंगिणी प्राचीन व मध्यकालीन भारत का ऐसा अनूठा ग्रंथ है, जो न केवल इतिहास लेखन की नींव रखता है, बल्कि इसमें 12वीं शताब्दी तक के कश्मीरी राजाओं का क्रमबद्ध इतिहास दर्ज है। यह तत्कालीन कश्मीरी समाज, धर्म-संस्कृति, जीवनशैली, कला, वास्तुकला और आर्थिक स्थिति को समझने का जीवंत स्रोत भी है।
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वास्तव में ये महान ग्रंथ उस भारतीय ज्ञान परंपरा के हिस्से हैं, जो हजारों वर्षों की साधना, चिंतन, अनुभव और प्रयोग का विशाल भंडार हंै, और जीवन के हर क्षेत्र को समझने का समग्र दृष्टिकोण प्रदान करते हंै। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार इन दिनों देश की प्राचीन पांडुलिपियों की पहचान करने, उन्हें संरक्षित करने और उनका डिजिटलीकरण करने का अभियान चला रही है, जिसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी और वैश्विक समुदाय तक पहुंचाना है।

इससे पहले भी यूनेस्को के इस रजिस्टर में रामचरितमानस, सहृदयलोक-लोकाना एवं पंद्रहवीं सदी की पांडुलिपि पंचतंत्र को शामिल किया जा चुका है, जिससे अब इस रजिस्टर में भारत की प्रविष्टियों की कुल संख्या छह हो गई है। यूनेस्को की यह मान्यता हमें अपनी प्राचीन बौद्धिक संपदा पर गर्व करने के साथ-साथ उसके संरक्षण, संवर्धन और समकालीन संदर्भों में पुनर्पाठ का अवसर भी देती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह उपलब्धि अतीत का सम्मान भर नहीं, बल्कि इस ज्ञान परंपरा को भविष्य तक पहुंचाने की जिम्मेदारी का स्मरण भी कराएगी।

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