सुबह आंख खुलते ही हमारे चुनाव शुरू हो जाते हैं। चाय पिएं या कॉफी, कुछ देर शांति से बैठें या मोबाइल उठाकर संदेश और रील देखने लगें। दिनभर ऐसे अनगिनत फैसले होते हैं, जिनमें से अधिकांश पर हम ठहरकर सोचते भी नहीं। हमें लगता है कि हम अपनी पसंद से जी रहे हैं। लेकिन, जिसे हम अपनी पसंद कहते हैं, वह आखिर बनती कहां है?
आज हमारे आसपास वस्तुओं की ही नहीं, प्रभावों की भी भरमार है। कहीं कोई उत्पाद बिक रहा है, कहीं कोई विचार, जीवनशैली या पहचान। हम केवल भोजन का उपभोग नहीं करते; सूचनाएं, भावनाएं, आकांक्षाएं और आदर्श भी ग्रहण करते हैं। जो हमें बार-बार दिखाया जाता है, धीरे-धीरे वही हमारी चाहत की सूची में शामिल होने लगता है। ऐसे में, सवाल केवल यह नहीं कि हम क्या उपभोग कर रहे हैं, बल्कि यह भी है कि उसका चुनाव कौन कर रहा है।
इस प्रश्न को ठीक से समझने का सबसे सटीक उदाहरण हमारा भोजन है। भारतीय परंपरा की एक कहावत है कि जैसा अन्न, वैसा मन। यह लोकप्रिय कहावत भोजन और जीवन के गहरे संबंध की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है। भोजन केवल स्वास्थ्य से ही नहीं, बल्कि हमारी मनोदशा से भी जुड़ा है। फिर भी, जरा सोचिए कि हम कितनी बार सोचते हैं कि हमारी थाली में जो भोजन परोसा गया है, वह हमारे लिए कितना उपयुक्त है? हम यह कदाचित ही पूछते हैं कि यह भोजन किन स्रोतों से आया है, यह कहां उगता है, इसमें कितना पानी लगता है, और इसे हमारी थाली तक पहुंचाने में कितना श्रम लगता है। हमारी मांग इस बात को भी प्रभावित करती है कि खेतों में क्या उगाया जाए, भूमि और पानी का उपयोग कैसे किया जाए तथा अन्य जीवों के लिए कितनी जगह छोड़ी जाए।
जब प्रकृति का मूल्य केवल हमारी उपयोगिता से निर्धारित होने लगता है, तो कई पेड़, पौधे और जीव हाशिये पर चले जाते हैं। उनके आवास सिकुड़ रहे हैं और जैव विविधता पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। करोड़ों लोगों का प्रतिदिन एकसाथ खाद्य चुनाव एक महान सामूहिक शक्ति बन जाता है। इस अर्थ में, हमारी थाली उस विश्व के पक्ष में एक मौन वोट भी है, जिसे हम भावी पीढ़ियों के लिए छोड़ना चाहते हैं।
इसी तरह मन का भी एक आहार है। समाचार, रील, बहस, मनोरंजन और दूसरों की जीवनशैली की झलकियां लगातार हमारे भीतर उतरती रहती हैं। पर, हम कम ही पूछते हैं कि इससे हमारे विचारों और भावनाओं पर क्या असर पड़ रहा है। डिजिटल मंचों की सामग्री चुनने वाली प्रणालियां, यानी एल्गोरिदम, हमारे सामने कुछ चीजें बार-बार रखती हैं। कई बार हम उसी को अपना चुनाव मान लेते हैं। दूसरों की गढ़ी हुई छवियां हमारी पहचान का हिस्सा बन जाती हैं और हमें लगता है कि यह तो हमारी अपनी पसंद है। हम दूसरों की अपेक्षाओं को भी अपने भीतर जगह देते हैं। सफलता कैसी दिखनी चाहिए, किस उम्र तक क्या हासिल कर लेना चाहिए, अच्छा जीवन किसे कहते हैं-इनके उत्तर अक्सर परिवार, समाज और बाजार से आते हैं। दूसरों के भय और महत्वाकांक्षाएं कब हमारी हो जाती हैं, इसका पता ही नहीं चलता। फिर, उन्हीं कसौटियों पर खुद को परखते हुए हम अपने जीवन से असंतुष्ट रहने लगते हैं। इसलिए, अपनी इच्छाओं के स्रोत को पहचानना जरूरी है। किसी विज्ञापन, चर्चित प्रचलन या बार-बार दिखाई गई छवि से पैदा हुई चाहत भी हमें बहुत निजी लग सकती है। जिसे हम ‘मुझे चाहिए’ कहते हैं, उसके पीछे ‘मुझे चाहना सिखाया गया है’ छिपा होता है।
बौद्ध चिंतन में तृष्णा को दुख का मूल कहा गया है। लगातार पाने की बेचैनी में प्राप्त चीजों से मिलने वाला सुख खत्म हो जाता है। अगली इच्छा फिर सामने खड़ी होती है। मन में जन्मी यही इच्छा बाहरी दुनिया में संसाधनों की मांग बनती है। हम जो चाहते हैं, उसे खरीदते हैं; जो खरीदा जाता है, उसके उत्पादन को बढ़ावा मिलता है। उत्पादन के लिए भूमि, पानी और ऊर्जा चाहिए। ये संसाधन असीमित नहीं हैं। इसलिए, पर्यावरण का संकट हमारे भीतर की दुनिया से भी जुड़ा है। भारतीय दर्शन का ‘तत्त्वमसि’ मनुष्य और व्यापक अस्तित्व की एकात्मता का बोध कराता है। इस दृष्टि से प्रकृति कोई बाहरी वस्तु नहीं, जिससे हमारा रिश्ता केवल लेने का हो। हमारा जीवन उसी जल, मिट्टी, वायु और जीव-जगत पर निर्भर है, जिसे हमारे चुनाव प्रभावित करते हैं। प्रकृति की देखभाल में ही हमारी अपनी देखभाल भी निहित है। एक पेड़ इस परस्पर संबंध को सहज ढंग से समझाता है। वह धूप, जल और मिट्टी से पोषण पाता है तथा अपने आसपास के जीवन को सहारा देता है। उसकी छाया, फल और पत्तियां दूसरे जीवों के काम आती हैं। गिरे हुए पत्ते भी मिट्टी में लौटकर पोषण का हिस्सा बनते हैं। प्रकृति के ये चक्र हमें लेने के साथ लौटाने का महत्व बताते हैं। हमारी उपभोग संस्कृति में, इसके विपरीत, जरूरत और इच्छा की दूरी अक्सर मिटा दी जाती है। अधिक खरीदने और जमा करने को ही बेहतर जीवन का प्रमाण मान लिया जाता है।
यहीं संतोष का विचार प्रासंगिक होता है। संतोष का अर्थ जीवन में आगे बढ़ने की इच्छा छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ अपनी जरूरतों को पहचानना और हर नई चाहत के पीछे अनवरत भागने से मुक्त होना है। ‘पर्याप्त’ केवल कोई संख्या नहीं; यह अपने जीवन और पृथ्वी के साथ एक समझदार संबंध है। यह पहचानना कि हमारे पास क्या है और हमें वास्तव में कितना चाहिए, उस बेचैनी को कम कर सकता है, जिसे हर अगली खरीद कुछ समय के लिए ही शांत करती है।
इस समझ की शुरुआत एक छोटे-से ठहराव से हो सकती है। खाने, खरीदने, सोशल मीडिया पर दिखने वाले किसी विज्ञापन से प्रभावित होने या किसी और की अपेक्षा को अपना मान लेने से पहले हम रुकें। पूछें कि हम क्या ग्रहण कर रहे हैं, हमें इसकी जरूरत क्यों महसूस हो रही है और यह हमारे भीतर क्या बदल रहा है। उत्तर तुरंत न भी मिले, तो यह ठहराव आदतन उपभोग के बीच विवेक के लिए जगह बनाता है।
सजग जीवन का अर्थ हर उपलब्ध चीज से मुंह मोड़ लेना नहीं है। इसका अर्थ यह तय कर पाना है कि हमारा ध्यान, समय और ऊर्जा किसे मिले। स्वतंत्रता केवल अधिक विकल्प उपलब्ध होने में नहीं, बल्कि उन विकल्पों के बीच समझदारी से चुनाव कर पाने में भी है। हम बार-बार जो ग्रहण करते हैं, उससे धीरे-धीरे बनते भी हैं। इसलिए, अगली बार किसी चीज को अपनी पसंद कहने से पहले इतना ठहरना सार्थक होगा कि उस पसंद में हमारी अपनी आवाज कितनी है।