फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

असंख्य गुणों से संपन्न जननायक का सम्मान

Sun, 25 Jan 2015 08:08 PM IST
राम नाईक
विज्ञापन
विज्ञापन
भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी! असंख्य गुणों से संपन्न जननायक। परंतु उन सभी विशेषताओं में प्रथम उल्लेखनीय है, उनकी सम्मोहित करने वाली वाणी!  1953 में पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में युवा अटल जी के मुख से निकली राष्ट्रभक्ति परक काव्य पंक्तियों ने ऐसा जादू किया कि राष्ट्र कार्य की लालसा मेरे मन में गहरे पैठ गई। मुंबई के शिवाजी पार्क की सभा में प्रमुख वक्ता के तौर पर यदि अटल बिहारी वाजपेयी हों, तो जनसागर उमड़ना स्वाभाविक बात थी। मुझे स्मरण है, 1984 में भी ऐसी ही एक सभा का आयोजन किया गया था। जब अटल जी बोलने के लिए खड़े हुए, तो तालियों की गड़गड़ाहट से सारा मैदान गूंज उठा। तालियों की गड़गड़ाहट कम होते ही अटल जी बोले ‘हारा हुआ अटल कैसा दिखता है, यह देखने के लिए जनसागर उमड़ पड़ा है।’ और सारी सभा में स्तब्धता पसर गई।
विज्ञापन


1994 में मैं कैंसर से पीड़ित था। एक दिन सुबह अचानक अटल जी के दिल्ली कार्यालय से शिवकुमार जी का फोन आया और घंटे भर में अटल जी आ भी गए। मेरी बीमारी और अटल जी के अचानक आगमन की वजह से उनका यथायोग्य स्वागत नहीं हो पाया। परंतु बीमारी को मात देकर फिर से काम की शुरुआत करने हेतु आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रम में आए अटल जी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा ‘रामभाऊ ने जिस धैर्य का परिचय दिया, वह अतुलनीय है। मैं उनके मकान में गया था। घर छोटा है, मगर मकान बड़ा है। घर ईंट-पत्थर की दीवारों से बनता है, मकान मन से बनता है। हम घर खरीद सकते हैं, पर ममत्व के बिना मकान नहीं बना सकते।’ आज भी उस भाषण की स्मृति से आंखें नम हो जाती हैं।

अटल जी की वक्तृत्व कला में सारी दुनिया को आकर्षित करने का सामर्थ्य था, परंतु वह आज भारत रत्न की उपाधि से गौरवान्वित किए जा रहे हैं, तो उसका कारण यह है कि उन्होंने देश के समक्ष त्यागपूर्ण नेतृत्व का आदर्श निर्मित किया और देश को अंतरराष्ट्रीय पटल पर सम्मान दिलाया। आपातकाल के बाद 18 महीने के विदेश मंत्री के कार्यकाल में अटल जी ने अन्य राष्ट्रों से मधुर संबंध स्थापित किए। उनके विदेश मंत्री के छोटे कार्यकाल पर दुनिया ने दिलचस्पी दिखाई। यह समझते हुए नरसिंह राव ने प्रधानमंत्री रहते हुए संयुक्त राष्ट्र में शांति प्रस्थापित करने की बाबत भारत की भूमिका रखने का दायित्व अटल जी को सौंपा था। वहां हिंदी में अपने संबोधन में हमारी भूमिका पांडवों की तरह वयं पंचाधिकम शतम् (हम 105 हैं) है, यह वक्तव्य उन्होंने दिया था। आज के 'मेक इन इंडिया' के बीज इतने पहले बोए गए थे।
विज्ञापन


कुछ भी करके सत्ता प्राप्त करने के मार्ग के वह प्रखर विरोधी थे। गठबंधन सरकार का सफलतापूर्वक संचालन किया जा सकता है, यह भी उन्होंने सिद्ध कर दिखाया। भारत के विकास का ध्येय मन में रखकर उन्होंने विकास के माध्यम से देश को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना उनका सबसे सफल प्रयास था। राज्यों को महामार्गों से जोड़ने की चतुर्भुज योजना का उन्होंने शुभारंभ किया। नदियों को जोड़ने की योजना हाथ में लेने के लिए आवश्यक भूमिका उन्होंने तैयार की। दुर्भाग्यवश वह योजना आरंभ होने के पूर्व ही सरकार बदल गई। साहसपूर्ण निर्णय लेने में वह जरा भी हिचकिचाते नहीं थे, इसीलिए तो तब हम परमाणु परीक्षण कर सके।

1950 के दशक से अटल जी देशकार्य में दिन-रात लगे रहे- कभी पैदल, कभी साइकिल पर, कभी खुद खाना बनाकर, तो कभी सहयोगी के घर का दाल-चावल खाकर। इन परिश्रमों का अटल जी के स्वास्थ्य पर विपरीत परिणाम तो काफी हुआ। जिस अमोघ वाणी से उन्होंने लाखों लोगों पर जादू किया, वही वाणी अब कुछ बोल नहीं पा रही, यह न जाने, भाग्य की कैसी विडंबना है।

अटल जी अपनी कामयाबी के बाद हमेशा कहते आए हैं, हे प्रभो/मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना/गैरों को गले न लगा सकूं/इतनी रुखाई कभी मत देना। आज जब पूरा देश उन्हें भारत रत्न से सम्मानित कर रहा है, तब इस स्नेह को स्वीकार करने के लिए अटल जी कुछ कह सकें, इसकी शक्ति ईश्वर उन्हें प्रदान करें, यही मेरी प्रार्थना है।
विज्ञापन


-लेखक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल हैं
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें