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सम्मान बड़ा या सियासत?

Sun, 31 May 2015 04:09 PM IST
रवि पाराशर
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हाल ही में बिहार के कुछ नेताओं ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को भारत रत्न देने की मांग उठाई है। दो जनवरी, 1954 को स्थापित देश का यह सबसे बड़ा सम्मान कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल के क्षेत्र में अतुलनीय सेवा के लिए दिया जाता है। लेकिन 1954 के बाद से अब तक यानी जिन 45 हस्तियों को भारत रत्न मिला है, उनमें से 23 राजनीति से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़ी रही हैं। 45 में से 23 यानी 50 फीसदी से थोड़ा ज्यादा। हालांकि ऐसा नहीं है कि जिन 23 सियासी शख्सियतों को भारत रत्न मिला, वे इसके योग्य नहीं हैं। दूसरी तरफ किसी खांटी साहित्यकार को अभी तक भारत रत्न नहीं मिला है। वर्ष 1955 के लिए डॉ. भगवान दास को भारत रत्न मिला था। लेकिन उन्हें साहित्यकार की श्रेणी में रखना सही नहीं होगा। पं. जवाहर लाल नेहरू को भी भारत रत्न दिया गया था। उन्होंने कई चर्चित किताबें लिखीं, लेकिन उन्हें भी साहित्यकार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यही तर्क पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भी हो सकता है। लिहाजा अगर बिहार के निवासी रहे साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर को भारत रत्न देने की मांग ने जोर पकड़ा है, तो यह जायज हो सकता है। लेकिन अगर यह मांग बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उठाई गई है, तो सवाल खड़े होते हैं। इन सवालों पर गौर करने के साथ-साथ देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारत रत्न से जुड़े कुछ तथ्यों पर नजर डाल लेते हैं।
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भारत रत्न को पदवी के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इस सम्मान में कोई पुरस्कार राशि नहीं दी जाती। यानी देश केवल प्रतीकात्मक कृतज्ञता जताता है। यानी यह सम्मान मूर्धन्य महानुभावों को व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव कराने के लिए दिया जाता है कि उन्होंने देश के लिए बड़ा काम किया। देश उनका आभारी है। सवाल यह है कि अगर कोई पुरस्कार राशि नहीं है, महज स्मृति चिह्न और प्रशस्ति पत्र ही है, तो यह अनुभव किसी दिवंगत हस्ती को किस तरह कराया जा सकता है कि उन्होंने देश की अतुलनीय सेवा की? नहीं कराया जा सकता, तो मरणोपरांत सम्मान का क्या औचित्य है? कोई धनराशि सम्मान के तौर पर दी जाती, तब तो मरणोपरांत किसी महानुभाव के परिवार की मदद भी होती। यही वजह रही होगी कि दो जनवरी, 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने भारत रत्न की घोषणा की, तब मरणोपरांत सम्मान देने का प्रावधान नहीं था। एक साल बाद 1955 में मरणोपरांत भारत रत्न देने का भी प्रावधान किया गया। साफ है कि सियासी मजबूरी की वजह से ऐसा किया गया होगा। अभी तक 12 हस्तियों को मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भी मरणोपरांत इस सम्मान के लिए चुना गया था, लेकिन उनकी मृत्यु पर विवाद की वजह से घोषणा वापस ले ली गई। देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने यह दलील देकर भारत रत्न लेने से मना कर दिया था कि चयन समिति के लोगों को यह नहीं मिलना चाहिए। विडंबना यह रही कि वर्ष 1992 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से नवाज दिया गया। 13 जुलाई, 1977 से 26 जनवरी, 1980 तक यह सम्मान स्थगित रहा।

अब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को भारत रत्न देने की मांग ने जोर पकड़ा है, तब सवाल यह है कि क्या ऐसा बिहार विधानसभा चुनाव में किसी तरह का फायदा उठाने की नीयत से हो रहा है? दिनकर के साहित्य का कायल हुए बिना नहीं रहा जा सकता, लेकिन क्या सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, मुंशी प्रेमचंद, मैथिली शरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सोहनलाल द्विवेदी और ऐसे ही दूसरे बहुत से प्रतिभाशाली साहित्यकार मरणोपरांत भारत रत्न के हकदार नहीं हैं? क्या उनके लिए देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान की मांग नहीं उठनी चाहिए? फिर दक्षिणी, पश्चिमी और पूर्वी भारत के बड़े साहित्यकारों का क्या कोई योगदान नहीं है? क्यों नहीं उन्हें भारत रत्न के योग्य समझा जाए? दिक्कत यही है कि सरकारें अपनी सोच के हिसाब से तय करती हैं कि भारत रत्न किन्हें दिया जाए। इससे बहुत बार अप्रिय विवाद हो जाते हैं। इससे बचने का बहुत कारगर उपाय हो सकता है।
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सरकार तमाम लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड में मरणोपरांत श्रेणी में आने वाली हर क्षेत्र की हस्तियों की सूची आम सियासी सहमति से बना ले और संसद में प्रस्ताव पारित कर सबको एक साथ सम्मानित कर दे। इसके बाद सैन्य सेवाओं और शौर्य से जुड़े सम्मानों को छोड़कर सभी बड़े सरकारी सम्मानों में मरणोपरांत श्रेणी खत्म कर दी जाए और जीवित शख्सियतों को ही भारत रत्न या दूसरे सम्मानों के लिए चुना जाए। इससे सम्मान का असल मकसद पूरा होगा। भारत रत्न और दादा साहेब फ़ाल्के जैसे दूसरे लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देने की एक निश्चित उम्र भी तय की जाए। अभी 10 मई को  हम शशि कपूर को मुंबई में व्हील चेयर पर यह अवॉर्ड लेते देख चुके हैं। वह कितने उदास लग रहे थे। राज कपूर को सम्मान समारोह के दौरान अस्थमा का अटैक पड़ा और वह मंच तक नहीं पहुंच पाए। तत्कालीन राष्ट्रपति को उनकी कुर्सी तक आना पड़ा। शशि कपूर की तरह प्राण भी खराब सेहत की वजह से राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने दिल्ली नहीं आ पाए। राज कपूर की तरह सम्मान मिलने के कुछ दिनों बाद ही प्राण का भी निधन हो गया। तो क्या सरकार इस बारे में सोचेगी?
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