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जम्मू-कश्मीर के अंतिम शासक की याद : जन्मदिन पर अवकाश का औपचारिक आदेश और राजनीति का चक्र

राकेश गोस्वामी
Updated Fri, 23 Sep 2022 08:17 AM IST

सार

महाराजा हरि सिंह के जन्मदिन पर राजकीय अवकाश की शुरुआत वर्ष 1931 से हुई थी, जब महाराजा नवंबर, 1930 में लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेकर वापस लौटे थे और जनता की मांग पर रियासत की प्रजा सभा ने यह फैसला लिया था।
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महाराजा हरि सिंह की प्रतिमा - फोटो : अमर उजाला


नेशनल कॉन्फ्रेंस ने डोगरा शासक के योगदान पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि उपराज्यपाल का प्रशासन भेदभाव कर रहा है। बता दें कि 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने वर्ष 2020 के सार्वजनिक अवकाश की सूची से नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की जयंती पांच दिसंबर के दिन राजकीय अवकाश को तो समाप्त कर ही दिया था, साथ ही जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय दिवस के रूप में 26 अक्तूबर को अवकाश भी घोषित कर दिया था। 


तभी से जम्मू क्षेत्र में महाराजा हरि सिंह के जन्मदिन पर अवकाश की मांग की जा रही थी। इसके बाद इस मांग की बुनियाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के तत्कालीन अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के 19 सितंबर, 2002 को दिए गए विवादित बयान ने रखी। उमर अब्दुल्ला ने सांबा में हुई एक चुनावी सभा में कथित तौर पर कहा था कि हमने महाराजा का तब तक पीछा किया, जब तक वह जम्मू-कश्मीर छोड़ कर चले नहीं गए। 


उनके इस बयान पर भारी बवाल हुआ और उसी के बाद चुनावी सियासत में महाराजा हरि सिंह एक मुद्दा बन गए। उसके बाद सियासी हलकों में महाराजा हरि सिंह का नाम डोगरा अस्मिता से जोड़कर पेश किया जाने लगा और उनके सम्मान में जम्मू-कश्मीर में अवकाश की मांग की जाने लगी। बाद में अवकाश घोषित करने के लिए विधानसभा और विधान परिषद में प्रस्ताव भी लाए गए। 


जम्मू नगर निगम ने भी दो बार इस बाबत प्रस्ताव पारित कर मंजूरी के लिए सरकार को भेजा। लेकिन हर बार लोगों की यह मांग अधूरी ही रही। वर्ष 2020 में जब शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की जयंती पर होने वाला राजकीय अवकाश रद्द किया गया, तो एक बार फिर महाराजा के जन्मदिन पर अवकाश की मांग को हवा मिल गई। वैसे महाराजा हरि सिंह के जन्मदिन पर राजकीय अवकाश की शुरुआत वर्ष 1931 से हुई थी, जब महाराजा नवंबर, 1930 में लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेकर वापस लौटे थे और जनता की मांग पर रियासत की प्रजा सभा ने यह फैसला लिया था। 


लेकिन जब राजशाही समाप्त हुई, तो इस अवकाश को रद्द कर दिया गया। उस वक्त भी राज्य के डोगरों ने इस फैसले का विरोध किया था, लेकिन सरकार ने उस विरोध को दबा दिया था। महाराजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला के सम्मान का मसला जम्मू और कश्मीर के बीच की सियासत का हिस्सा रहा है। डोगरा शासक को जम्मू और लद्दाख में काफी सम्मान मिलता रहा है, जबकि कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की शख्सियत बड़ी मानी जाती रही है। 


देश की आजादी के दौर में महाराजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला के बीच गहरे मतभेद थे। शेख अब्दुल्ला ने महाराजा के शासन के खिलाफ आंदोलन भी किया था। अब सोमवार को जारी आदेश के साथ ही जम्मू-कश्मीर में सियासत का एक लंबा चक्र पूरा हो गया है। महाराजा हरि सिंह डोगरा शासक थे और जम्मू में डोगराओं की अच्छी-खासी आबादी है। 
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इस वजह से अवकाश घोषित करने के फैसले से जम्मू में भारतीय जनता पार्टी को इसका राजनीतिक लाभ मिलने की भी संभावना है। पार्टी ने इस मौके को भुनाने के लिए सभी जिलों में जश्न मनाने एवं पार्टी नेताओं के संबोधन के कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इस फैसले से सरकार ने राष्ट्रवादियों को संतुष्ट करने और जम्मू और कश्मीर की सियासत को साधने की भी कोशिश की है। (-लेखक भारतीय जन संचार संस्थान, जम्मू में क्षेत्रीय निदेशक हैं।)

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