ऊषा की एक सखी थी, जिसका नाम चित्रलेखा था। वह मायाविद्या में निपुण व अत्यंत बुद्धिमती थी। उसने ऊषा को व्याकुल देखा, तो कारण पूछा। ऊषा ने अपनी सखी के सामने स्वप्न वाली घटना कह सुनाई और बताया कि उसे युवक से प्रेम हो गया है। चित्रलेखा ने ऊषा की सहायता करने का निश्चय किया। उसने अपनी मायाशक्ति से देवताओं, दानवों और श्रेष्ठ पुरुषों के बहुत-से चित्र बनाकर ऊषा को दिखाए। ऊषा ने जैसे ही अनिरुद्ध का चित्र देखा, तो अपनी सखी को बताया कि यही युवक उसके स्वप्न में आया था।
- चित्रलेखा अनिरुद्ध को पहचानती थी। वह मायाविद्या के बल पर उसी रात द्वारका पहुंची। उस समय अनिरुद्ध अपने अंत:पुर में शयन कर रहा था। चित्रलेखा ने उसे निद्रा की अवस्था में ही उठाया और मायाशक्ति से बाणासुर के राजमहल में ले आई तथा ऊषा की शय्या पर सुला दिया।
अनिरुद्ध की नींद खुली, तो उसने अपने को एक रमणीय पर्वत प्रदेश में पाया। पास ही सुंदर आभूषणों से अलंकृत, कोमल केशों वाली, दिव्य सौंदर्य से युक्त ऊषा बैठी हुई थी। ऊषा की सहमति से अनिरुद्ध उसके साथ रहने लग गया। कुछ दिन बाद दोनों ने गुप्त रूप से विवाह भी कर लिया।
एक दिन ऊषा की कुछ दासियों ने उषा और अनिरुद्ध को साथ रहते हुए देख लिया। उन्होंने यह समाचार बाणासुर को दिया। यह सुनते ही बाणासुर क्रोध से भर उठा। उसने अपने सैनिकों को तुरंत उसे पकड़कर दरबार में लाने का आदेश दिया। सैनिक अनिरुद्ध को पकड़ने गए। सैनिकों को अपनी ओर बढ़ता देखकर अनिरुद्ध ने प्रासाद का एक विशाल स्तंभ उखाड़ लिया और उसी से प्रहार करके सभी सैनिकों को मारकर भगा दिया। भयभीत सैनिकों ने बाणासुर को यह बात बताई। अनिरुद्ध के अद्भुत पराक्रम की बात सुनकर बाणासुर को बड़ा कौतूहल हुआ। उसी समय देवर्षि नारद वहां पहुंचे और उन्होंने बाणासुर को बताया कि अनिरुद्ध कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण का पौत्र है। यह सुनकर बाणासुर स्वयं अनिरुद्ध से युद्ध करने पहुंच गया। आखिर, बाणासुर ने अनिरुद्ध को नागपाश से बांधकर कैद कर लिया।
दैवीय संकेत से यह समाचार श्रीकृष्ण तक पहुंचा। उन्होंने बाणासुर पर आक्रमण कर दिया। तब बाणासुर ने भगवान शंकर की घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उससे वर मांगने को कहा। उसने मांगा कि भगवान शंकर स्वयं उसके नगर-द्वार की रक्षा करें। महादेव ने तथास्तु कह दिया और बाणासुर के नगर-द्वार पर खड़े हो गए। श्रीकृष्ण ने देखा कि महादेव के नेतृत्व में शत्रु सेना युद्ध के लिए तत्पर खड़ी है। वह स्वयं बलराम तथा प्रद्युम्न के साथ युद्ध में उतर पड़े। दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। फिर वह क्षण आया, जब श्रीकृष्ण और शंकर आमने-सामने आ गए। दोनों के बीच युद्ध हुआ, पर दोनों में से किसी की विजय नहीं हो पाई। तब बाणासुर स्वयं युद्ध में आया। श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसकी भुजाएं काट दीं। बाणासुर की यह दशा देखकर महादेव ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि वह उनके भक्त को क्षमा कर दें। श्रीकृष्ण ने बाणासुर को जीवनदान दे दिया।
बाणासुर ने श्रीकृष्ण और बलराम की स्तुति की, अनिरुद्ध को बंधन से मुक्त करके अपनी पुत्री ऊषा का विधिवत विवाह उसके साथ कर दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण, बलराम और अनिरुद्ध अपने रथ से द्वारका लौट आए। द्वारका में अनिरुद्ध और ऊषा आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।