फिर वे चाहे यवन आक्रांता हों या देश के ही विभिन्न राज्यवंशों के हिंदू या बौद्ध राजा ही क्यों न हों या अंग्रेज हुक्मरान और आजादी के बाद विभिन्न दलों के राजनेता। सबने जब मौका मिला, मंदिरों की अरबों की संपत्ति को चुराया या लूटा है। कारण स्पष्ट है कि धर्म-प्रधान देश होने के कारण सनातन धर्म के मंदिरों में हमेशा से भावुक भक्त उदारता से सोना-चांदी, जमीन-जायदाद और हीरे-जवाहरात दान करते आए हैं। इस संपत्ति के प्रबंधन की कोई सुव्यवस्थित पारदर्शी व्यवस्था स्थापित नहीं की गई है।
हर मंदिर के संरक्षकों, सेवायतों और भक्तों द्वारा अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार प्रबंधन की व्यवस्थाएं की जाती हैं। इस दिशा में जो सबसे प्रभावशाली उदाहरण है, वह दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य का है। चोल राजवंश ने तमिलनाडु और आसपास के भूभाग पर नौवीं से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक शासन किया। इन शासकों के कार्यकाल में विदेशों से व्यापार और देश में अच्छे उत्पादन के कारण बहुत संपन्नता आई। चोल राजाओं ने अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मंदिरों पर केंद्रित रखा।
हर गांव, कस्बे और नगर की सभी आर्थिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक, कलात्मक, शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र ये मंदिर हुआ करते थे। इन मंदिरों में लोकतांत्रिक प्रणाली से विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समितियों का गठन किया जाता था। जैसे सरोवरों का प्रबंधन, कर संग्रह, वनों का संरक्षण आदि, इन्हीं समितियों के दायित्व होते थे। इस तरह हर मंदिर स्थानीय समाज के नियंत्रण में काम करता था। इस आशय के जो शिलालेख मिले हैं, उनमें इन मंदिरों की कार्यप्रणाली का विस्तृत ब्योरा है।
आज उपरोक्त अनेक क्षेत्रों में विभिन्न सरकारी या गैर-सरकारी एजेंसियां काम कर रही हैं। इसलिए मंदिर पूरे समाज की गतिविधियों का केंद्र नहीं हो सकते। पर धर्मस्थलों का प्रबंधन समाज की ही जिम्मेदारी होनी चाहिए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन लोगों की होनी चाहिए, जो उस धर्मस्थल विशेष को नियमित रूप से उदारता से दान देते हैं। ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से अपने श्रम अर्जित धन को उदारता से उस धर्मस्थल को दान देता है, वह उस धन की चोरी भी करेगा। ये हमारे संस्कारों में नहीं है।
जो दैविक द्रव्य की चोरी करते हैं, वे चाहे आस्तिक होने का कितना ही आडंबर क्यों न रचें, निरे नास्तिक होते हैं। फिर वे चाहे किसी संगठन से जुड़े हों या राजनीतिक दल से। ऐसे लोगों को धर्मस्थलों के प्रबंधन से कोसों दूर रखना चाहिए। इनमें सरकारी अधिकारी और न्यायपालिका के सदस्य भी शामिल हैं। हर धर्मस्थल के प्रबंधन में प्रभावी मार्ग निर्देशक की भूमिका उस संप्रदाय के प्रतिष्ठित संतों को सौंपी जानी चाहिए। इस पूरे तंत्र के ऊपर निगरानी रखने का दायित्व चारों मान्य शंकराचार्यों का होना चाहिए। उन आत्मघोषित फर्जी शंकराचार्यों या नए बनाए गए तथाकथित संतों का नहीं, जो किसी न किसी राजनीतिक दल या नेता द्वारा प्रायोजित किए जाते हैं। इसके साथ ही केंद्र या प्रांतों की सरकारों को धर्मस्थलों के प्रबंधन में या उनकी समितियों में अपने प्रतिनिधि नामित करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। क्योंकि ऐसे नामित व्यक्तियों की जवाबदेही विराजमान देव विग्रह, उस संप्रदाय या उसके प्रतिष्ठित संतों के प्रति नहीं होती। इन लोगों की जवाबदेही तो अपने प्रशासनिक और राजनीतिक आकाओं के प्रति ही होती है। इसलिए इनकी मौजूदगी के बावजूद सरकारी अधिकृत मंदिरों में बड़े-बड़े घोटाले होते हैं। जैसे ‘तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम’ में आईएएस सीईओ के बावजूद भगवान को लगने वाले भोग के लड्डुओं में जानवरों की चर्बी पाई गई या वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के भंडार में रखी चांदी गलाने पर 80 फीसदी नकली निकली। कोई भक्त तो नकली चांदी चढ़ाएगा नहीं, क्योंकि सोना या चांदी चढ़ाने की उस पर कोई बाध्यता नहीं होती। जो भक्त चांदी या सोना चढ़ाता है, वह श्रद्धा से चढ़ाता है। जाहिर है कि चढ़ावे की चांदी को बदल कर व्यवस्थापकों द्वारा नकली चांदी रखी गई होगी।
सरकार का काम तो बस इतना होना चाहिए कि देश के बड़े धर्माचार्यों, विशेषकर चारों शंकराचार्यों के निर्देश में धर्मस्थलों के प्रबंधन की एक नियमावली बना दी जाए। जिसमें प्रबंधन की कार्यप्रणाली का विस्तृत ब्योरा हो, साथ ही यह भी स्पष्ट हो कि चढ़ावे की संपत्ति का निस्तारण किस फॉर्मूले के तहत होगा? कितना धन धर्मस्थल के रख-रखाव पर खर्च होगा? कितना देव विग्रह की सेवा-पूजा और विग्रहों पर खर्च होगा? कितने धन को भविष्य निधि के रूप में बैंकों में जमा कराया जाएगा? कितने धन को धर्मस्थलों के सेवायतों के रख-रखाव पर खर्च किया जाएगा? कितने धन को निर्धन श्रद्धालुओं के भोजन, शिक्षा और इलाज पर खर्च किया जाएगा? और कितने धन को जनसुविधाओं के विस्तार पर खर्च किया जाएगा? इस नियमावली का शब्दशः अनुपालन करने की बाध्यता हर धर्मस्थल की प्रबंध समिति की होनी चाहिए।
हर समिति को सालाना ऑडिट कराना और ऑडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक करना अनिवार्य होना चाहिए। इसी तरह का प्रारूप मस्जिदों, गुरुद्वारों, चर्चों और अन्य धर्मों के केंद्रों के प्रबंधन के लिए भी बनाया जाना चाहिए। क्योंकि ऐसा नहीं है कि चढ़ावे की चोरी सिर्फ मंदिरों में ही होती है। अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों पर भी ऐसी मानवीय दुर्बलता समय-समय पर सामने आती रहती है। अब देखना यह है कि नेता और अफसर व धनलोलुप, ऐश्वर्यशाली तथाकथित धार्मिक ऐसी पारदर्शिता को लागू होने देंगे या नहीं?