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राहुल क्या ऐसा कर पाएंगे?

Tue, 18 Jun 2013 11:28 PM IST
सुरेंद्र कुमार
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चेतन भगत ने अभी लिखा है कि नरेंद्र मोदी 2014 का लोकसभा चुनाव जीत जाएंगे। उन्होंने जो कहा है, वह आम धारणा है। अंतिम क्षण की गड़बड़ियों को छोड़ दें, तो नरेंद्र मोदी एवं राहुल गांधी चुनावी प्रतिस्पर्धा में अपनी पार्टियों के शीर्ष नेता के रूप में उभरेंगे। राहुल एवं सोनिया अब भी हवा का रुख बदल सकते हैं, बशर्ते कि वे साहस के साथ गैरपारंपरिक योजना पर काम करें।
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लेकिन क्या उनमें ऐसी राजनीतिक इच्छाशक्ति और जोखिम उठाने का साहस है? खैर यह तो समय बताएगा, पर यदि कांग्रेस कुछ बातों पर ध्यान दे, तो शायद बात बन सकती है।

राजनीति में वास्तविकता से ज्यादा धारणाएं महत्वपूर्ण होती हैं। वीपी सिंह ने कहा था कि उनके पास स्विट्जरलैंड के उस बैंक एकाउंट का नंबर है, जिसमें बोफोर्स घोटाले का पैसा जमा किया गया है। लेकिन उन्होंने न तो कभी उस एकाउंट का खुलासा किया और न ही कोई सुबूत दिया, लेकिन राजीव गांधी के खिलाफ लोगों की जो धारणा बन गई, उसके चलते उन्हें भारी पराजय का सामना करना पड़ा।
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भ्रष्टाचार और घोटालों के चलते लोगों की यह धारणा बन गई है कि मनमोहन सिंह की सरकार सबसे भ्रष्ट है। लिहाजा पार्टी की छवि को बेहतर बनाने के लिए सोनिया एवं राहुल को पार्टी संगठन एवं केंद्र व कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारों में व्यापक बदलाव करना चाहिए।

भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे मंत्रियों (चाहे दोष सिद्ध हुआ हो या नहीं) पर पद छोड़ने का दबाव डालना चाहिए और उन्हें अपनी कानूनी लड़ाई खुद लड़ने देना चाहिए, जैसा कि नरसिंह राव के मामले में किया गया था। राबर्ट वाड्रा से संबंधित आरोप खत्म नहीं होंगे, बल्कि चुनाव के समय हमला और तेज होगा। राहुल को ऐसा भाव पैदा करना होगा कि कानून अपना काम करेगा और किसी को भी बचाया नहीं जाएगा।

सामान्य तौर पर जब कोई टीम हारती है, तो उसका नुकसान सबसे पहले कैप्टन को उठाना पड़ता है। क्या सोनिया गांधी को इस नियम का पालन करते हुए मनमोहन सिंह को पद छोड़ने के लिए नहीं कहना चाहिए? मनमोहन सिंह अब भी व्यक्तिगत रूप से ईमानदार माने जाते हैं, लेकिन इससे पार्टी को कोई फायदा नहीं हो रहा है।

पार्टी की प्रतिष्ठा को बचाने एवं लोगों की नकारात्मक धारणा को सकारात्मक बनाने के लिए सोनिया को पंडित नेहरू के उस कदम का अनुगमन करना चाहिए, जिसमें उन्होंने 1962 में चीन से हार के बाद भारी मन से कृष्ण मेनन को पद से हटा दिया था।

मनमोहन सिंह की जगह मीरा कुमार के नाम पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि वह अनुभवी एवं निष्ठावान तो हैं ही, 2014 के चुनाव परिणाम तक पद की गरिमा भी बनाए रख सकती हैं। उनकी पदोन्नति से 1977 में उनके पिता के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय की देर से ही सही भरपाई हो सकती है, जब जेबी कृपलानी एवं अन्य लोगों ने चतुराई से मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री चुन लिया था।

इसके अलावा, इससे दलित वोट भी कांग्रेस के खेमे में आ सकता है। महंगाई के नकारात्मक प्रभावों की अनदेखी नहीं की जा सकती, इसी के चलते भाजपा एक बार दिल्ली में चुनाव हार गई थी। मनरेगा की तरह खाद्य सुरक्षा विधेयक भी चुनाव में कांग्रेस के लिए मददगार हो सकता है।

भाजपा एवं मोदी समाज में ध्रुवीकरण के बल पर ही पनपे हैं। कांग्रेस को ऐसी स्थिति पैदा करनी होगी, जिससे उनके समर्थक भी कांग्रेस के करीब आएं। राहुल को समझना होगा कि विभिन्न कारणों से शहरी मध्यवर्ग का एक बड़ा तबका कांग्रेस को वोट नहीं देता, ग्रामीण क्षेत्रों में दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक ही वोट देते हैं। दलितों के घर खाना खाने से वह दलितों के प्रिय नहीं बन जाएंगे, बल्कि जमीनी स्तर पर उनके हित में किया गया काम मददगार हो सकता है।

इसी तरह अल्पसंख्यकों को भी महसूस होना चाहिए कि मोदी से बेहतर कांग्रेस है। सरकारी सेवाओं में आरक्षण देना पर्याप्त नहीं है। कांग्रेस का हाथ आपके साथ को केवल नारा बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे शिकायत निवारण का एक प्रभावी उपकरण बनाना होगा।

उद्योग जगत आज मोदी राग गा रहा है। मोदी ने गुजरात में निवेश के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे एवं अन्य सुविधाओं के साथ उनके उद्यम को शीघ्र प्रशासनिक मंजूरी दिलवाई। यूपीए-दो इससे बेहतर कर सकता है। राहुल को सरकार पर दबाव बनाना होगा कि वह दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों को लागू करे। यदि जरूरी हो, तो अर्थव्यवस्था में हलचल पैदा करने, निवेश को आकर्षित करने एवं रोजगार सृजन के लिए अध्यादेश जारी करना चाहिए, ताकि अनिश्चितता खत्म हो।

भाजपा में अंदरूनी कलह तो है ही, जद (यू) के साथ 17 वर्ष पुराना संबंध भी खत्म हो गया है। कांग्रेस को इसका फायदा उठाने की कोशिश करनी चाहिए। अप्रभावी एवं अक्षम मंत्रियों को संगठन में भेजने से पार्टी में सुधार नहीं होने वाला। राहुल को बुद्धिमान, ईमानदार, स्पष्टवादी एवं अपेक्षाकृत शारीरिक रूप से मजबूत युवा लोगों को अपनी टीम में शामिल करना चाहिए, जो प्रतिदिन पार्टी के लिए 18 घंटे काम कर सकें।

कांग्रेस के कई प्रवक्ता बातों को रखने में असहज एवं अक्षम दिखते हैं, जबकि भाजपा प्रवक्ता ज्यादा कुशल हैं। राहुल गांधी को शशि थरूर को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रभार सौंप देना चाहिए। उन्हें न केवल संयुक्त राष्ट्र में काम करने का अनुभव है, बल्कि वह अन्य नेता की तुलना में 30 सेकंड में ज्यादा जानकारियां दे सकते हैं। इसके अलावा ट्वीटर पर मोदी से ज्यादा उनके प्रशंसक हैं। कांग्रेस को ऐसी ही योग्यता वाले क्षेत्रीय भाषाओं के जानकार की भी तलाश करनी चाहिए, क्योंकि आज के समय में संदेश से ज्यादा संदेशवाहक महत्वपूर्ण हो गया है।
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