दुनिया भर में विधायिकाओं और राजनीतिक दलों में महिलाओं के लिए कोटा का प्रावधान शुरू करने से महिला सांसदों की हिस्सेदारी औसतन दोगुनी हो गई है। हालांकि कोटा अब भी विवादास्पद बना हुआ है। वास्तव में, हम चुनावी कोटा (आरक्षण) की क्षमता के बारे में बहुत कम जानते हैं और यह नहीं कह सकते कि इसके तहत समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले समग्र रूप से बेहतर ही हैं।
आज के भारत पर ध्यान केंद्रित करते हुए मैंने यह जानने की कोशिश की कि कोटा लैंगिक रूप से समान आर्थिक सुधारों की कैसे शुरुआत करता है। मैंने पाया कि लैंगिक कोटा आर्थिक और सामाजिक समानता को स्थायी बनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, बशर्ते कि वे इन अधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए महिलाओं को संसाधन प्रदान करें।
मेरा विशेष ध्यान विरासत की संपत्ति पर महिलाओं के अधिकारों को लेकर है। विरासत में भूमि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में आर्थिक स्थिरता की सबसे मजबूत गारंटी देती है। साक्ष्य बताते हैं कि जहां महिलाओं का भूमि पर अधिकार है, वहां उन्हें गृहस्थी में ज्यादा अधिकार प्राप्त होता है, उन्हें कम घरेलू हिंसा झेलनी पड़ती है, उनके बच्चे स्वस्थ होते हैं, और कृषि योग्य भूमि और अधिक प्रभावी ढंग से उनके पूरे परिवार के लिए ज्यादा अनाज के उत्पादन में सक्षम बनाता है। यानी जहां महिलाओं को विरासत में भूमि मिलती है, वहां सबको लाभ होता है। फिर भी महिलाओं को संपत्ति की खरीद और सुरक्षा के लिए विशेष बाधाओं का सामना करना पड़ता है। भारत में तीन चौथाई महिलाएं कृषि से अपनी आय प्राप्त करती हैं, पर 13 फीसदी से भी कम भूमि पर उन्हें मालिकाना हक प्राप्त है।
मेरा मानना है कि कोटा महिलाओं के आर्थिक अधिकारों को लागू कर सकता है, हालांकि रूढ़िवादी सामाजिक मानदंडों का एक व्यापक तंत्र अक्सर (संभावित) लाभार्थियों के खिलाफ प्रतिक्रिया करता है। कम संपत्ति या संसाधनों के लिए संघर्ष हिंसा को बढ़ाता है। इसके तहत महिलाओं को विभिन्न मामलों में डराया-धमकाया जाता है, शैशवावस्था, बच्चों के जन्म के समय या वृद्धावस्था में उनकी देखभाल के प्रति अनिच्छा जताई जाती है, कन्या भ्रूण हत्या होती है, जिस कारण 2018 में भारत की आबादी से 6.3 करोड़ महिलाएं गायब हुईं।
मेरा एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि राजनीतिक शक्ति का लाभ उठाने की महिलाओं की क्षमता उन्हें स्थायी सशक्तिकरण की ओर ले जाती है।
मैंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत पर ध्यान केंद्रित किया, जहां कोटा के लिए स्पष्ट सांविधानिक जनादेश है और जो स्थानीय शासन का चेहरा बदल रहा है। पंचायत स्तर पर एक तिहाई सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। पंचायत स्तर पर महिला आरक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल मैंने भारत में हिंदू महिलाओं को विरासती संपत्ति में समान अधिकार के ऐतिहासिक सुधार पर अमल की परीक्षा के लिए किया, इसने बेटों के साथ 40 करोड़ बेटियों को पिता की संपत्ति में अधिकार दिया। मैंने पाया कि विरासत सुधार के पूर्व, आरक्षण ने महिला विरासत की आवृत्ति और परिमाण में वृद्धि हुई। वैसी महिलाएं, जिनके पिता आरक्षण के बाद मरे, उन्हें विरासती जमीन मिलने की संभावना छह प्रतिशत बढ़ गई-महिला विरासत की आवृत्ति 10.3 फीसदी से बढ़कर 16.3 फीसदी हो गई।
1.34 अरब की आबादी वाले भारत में यह आंकड़ा महत्व रखता है, जहां ग्रामीण आबादी 92 फीसदी है और 67 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर परिवारों में रहती है, वहां इसका तात्पर्य है कि 2.36 करोड़ और महिलाओं को विरासत भूमि पर अधिकार मिलेगा। लेकिन विडंबना यह है कि आरक्षण सुधार के बाद बहुत कम महिलाओं को विरासत में जमीन मिली। पैतृक भूमि में समान अधिकार पाने योग्य महिलाओं में से मात्र आधे को विरासत में जमीन मिलने का अनुमान है।
सुधार के इन अप्रत्याशित परिणामों का क्या मतलब है? मेरा मानना है कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में लैंगिक विभाजन देश के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में अब भी आम है। जैसे-जैसे महिलाओं की राजनीतिक संस्थानों में अधिक उपस्थित होती है और सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में सौदेबाजी की शक्ति बढ़ती है, अपने बारे में सुनने और प्रतिक्रिया देने की उनकी आधिकारिक क्षमता असीम रूप से बढ़ जाती है। अभी तक महिलाओं का केवल एक छोटा-सा हिस्सा निजी, पैतृक संपत्ति के लिए अधिक से अधिक सार्वजनिक, राजनीतिक आवाज उठाने की क्षमता हासिल कर पाया है। मेरा अनुभव बताता है कि विवाह के समय महिलाओं के पास परिवार के संसाधनों के वितरण पर हक जताने का ज्यादा अवसर होता है। समान अधिकार प्राप्त करते समय जो महिला जितनी युवा होती है, वह विरासत की सेवा में राजनीतिक शक्ति का लाभ उठाने में उतनी ही सक्षम होती है।
इसके अलावा, मैंने राजनीतिक और सामाजिक चैनलों का परीक्षण किया, जिसके माध्यम से आरक्षण व्यवहार को प्रभावित करता है। मैंने पाया कि निर्वाचित महिला नेता राजनीतिक भागीदारी और महिलाओं की सामाजिक एकजुटता के माध्यम से आर्थिक अधिकारों के प्रभावी प्रवर्तन की मांग करने की महिलाओं की क्षमता बढ़ाती हैं।
केवल आर्थिक सुधारों के माध्यम से समानता की व्यवस्था कायम नहीं हो सकती। न ही यह स्थानीय नागरिकों के लिए व्यापक, अधिक समावेशी निर्णय को पूरी तरह से विकेंद्रीकृत करने के लिए पर्याप्त है। व्यापक स्तर पर समानता के लिए बड़े राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समायोजन की आवश्यकता होती है।
लेखिका न्यूयॉर्क युनिवर्सिटी, अबुधाबी में राजनीतिक विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।