आम तौर पर यह माना जा रहा है कि पीयूष गोयल द्वारा पेश किया गया बजट, जिसे अंतरिम बजट होना था, पर जो संपूर्ण बजट ही है, ‘चुनावी बजट’ है। उसे दो महीने बाद होने वाले आम चुनाव को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। ग्रामीण क्षेत्र में उबल रहे किसानों के गुस्से को शांत करने के लिए उन्हें 500 रुपये महीने दिए जा रहे हैं; भाजपा के परंपरागत समर्थक, शहरी मध्य वर्ग के लोगों के असंतोष को कम करने के लिए उन्हें आयकर में कुछ राहत दी गई है। लेकिन, आबादी का आधा हिस्सा, और सबसे गरीब, शोषित और असुरक्षित हिस्सा, जो महिलाओं का है, उसे तो इस बजट से निराशा ही हाथ लगी है। ऐसा लगता है कि या तो सरकार आश्वस्त है कि महिलाओं का वोट उन्हें हर हालत में मिल ही जाएगा या फिर सरकार को महिलाओं की और उनके वोटों की कोई परवाह ही नहीं है।
अगर हम किसानों को दी जा रही खैरात को ही देखें, तो निश्चित रूप से यह पुरुष किसान, जो जमीन के मालिक हैं, को ही मिलने वाली है। महिलाओं को किसानों के लिए बनाई गई तमाम योजनाओं का लाभ मिलता ही नहीं है, क्योंकि उनकी गिनती किसानों में नहीं होती। हालांकि कृषि संबंधित बहुत सारे काम वे करती हैं। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं अधिकतर जमीन की मालिक नहीं होतीं। इस बजट में भूमिहीनों, बंटाईदारों और खेत मजदूरों को खैरात से भी लाभान्वित नहीं किया गया है।
बेरोजगारी की समस्या पिछले दो वर्षों में कितनी भयानक हो गई है, इसके बारे में लगातार आंकड़े आ रहे हैं। सरकार ने लगातार इन आंकड़ों को तोड़ने-मरोड़ने और छिपाने की कोशिश की है, लेकिन समस्या की जानकारी व्याप्त है। महिलाएं बढ़ती बेरोजगारी की सबसे बड़ी शिकार हैं। इस समस्या के समाधान के लिए एक शब्द भी इस बजट में नहीं कहा गया है। मनरेगा योजना के लिए आवंटित धन राशि में 1,000 करोड़ रुपये की कटौती की गई है, जो ग्रामीण गरीब और बेबस महिलाओं के मुंह पर चांटे के सामान है। बजट में की गई कटौती का मतलब है, बड़े पैमाने पर बहुत कष्टदायक पलायन, कुपोषण से मौतों की आशंका, महिलाओं, बच्चों और बच्चियों के देह-व्यापर में वृद्धि और गरीब परिवारों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में असहनीय बोझ। जो महिलाएं काम करती हैं, उनमें से 95 फीसदी असंगठित क्षेत्र में ही रोजगार में लगी हैं, जहां उन्हें कोई सुरक्षा उपलब्ध नहीं है, न रोजगार की, न हिंसा से और न यौन उत्पीड़न से। बजट में ‘प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना’ की घोषणा की गई है। इसके तहत, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को 60 साल की उम्र के बाद, 3,000 रुपये मासिक पेंशन दी जाएगी, जिसे पाने के लिए उन्हें 100 रुपये महीने का प्रीमियम भरना पड़ेगा। योजना के लिए मालिकों को 500 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई है। इससे योजना का चलना तो असंभव है। हां, गायों को राहत पहुंचाने के लिए 700 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं!
हमारा देश दुनिया की ‘भूख तालिका’ में 119 देशों में 103 नंबर पर है। करीब-करीब सबसे अधिक भूखे लोग हमारे देश में ही रहते हैं और निश्चित तौर पर इस गिनती में सबसे अधिक संख्या में महिलाएं होंगी, जो सबसे अधिक भूख और कुपोषण का शिकार हैं। इस शर्मनाक स्थिति को सुधारने के लिए बजट में किसी तरह का कोई प्रयास नहीं किया गया है। राशन की सुविधा उपलब्ध कराने, राशन की मात्रा बढ़ाने और किसी भी जरूरतमंद परिवार को राशन से वंचित न रखने की बात तो दूर, आवंटन भी नहीं बढ़ाया गया है।
कुल मिलाकर, बजट में महिलाओं का हिस्सा (जेंडर बजट) पहले से घटा है। पिछले बजट में यह पूर्ण आवंटन का पांच फीसदी था और इस बजट में वह 4.7 फीसदी रह गया है।