इस बार बजट में प्रत्यक्ष आयकर में दी गई रियायत एवं किसानों को आर्थिक सहायता दिए जाने को लेकर काफी चर्चा हुई, पर पहली बार रक्षा बजट तीन लाख करोड़ रुपये के पार चला गया, इस पर कोई खास चर्चा नहीं हुई। हालांकि रक्षा बजट की घोषणा होते ही संसद की दीर्घाओं में जोरदार तालियों के साथ इसका स्वागत किया गया, लेकिन जैसे ही तालियां थमीं, सच्चाई सामने आने लगी।
पिछले वित्त वर्ष की तुलना में इस बार रक्षा बजट में मामूली तीन फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। चूंकि मुद्रास्फीति 3.6 फीसदी पर पहुंच गई है, इसलिए इसे बेहतर नहीं कहा जा सकता। अगर जीडीपी से इसकी तुलना करें, तो यह पिछले 1.6 फीसदी से भी कम है, जबकि मांग जीडीपी के करीब ढाई-तीन फीसदी की है। रक्षा बजट के लिए जीडीपी प्रतिशत का वैश्विक औसत दो से ढाई फीसदी के बीच है। पाकिस्तान का रक्षा बजट जीडीपी का 2.36 फीसदी है, जबकि चीन में यह आंकड़ा 2.1 फीसदी है। चीन की अर्थव्यवस्था हमसे पांच गुना बड़ी है।
इसमें एकमात्र अच्छी बात यह है कि बजट की पूंजीगत हिस्सेदारी में दस फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यानी उपकरण और बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण के लिए आवंटन में 10 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसमें यह नहीं बताया गया है कि लंबित देयता कितनी है। ये पिछले वर्षों की खरीद के लिए इस वर्ष भुगतान किए जाने वाले आंकड़े हैं। इसे हटाकर ही आधुनिकीकरण के लिए किए गए आवंटन के सही आंकड़े स्पष्ट होंगे। वास्तव में ये आंकड़े कम हो जाएंगे। राष्ट्र किस खतरे का सामना कर रहा है, इस पर ही सेना की ताकत, उसके उपकरण और उसके बुनियादी ढांचे निर्भर करते हैं। बजट सैन्य बल को बनाए रखने, निरंतर उसके उपकरणों को अद्यतन बनाए रखने और उभरने वाले खतरों के लिए खरीद की योजना से संबंधित होता है। सभी सेनाओं में उपकरण प्रोफाइल का आदर्श अनुपात आधुनिकीकरण, मौजूदा एवं पुरानी तकनीक में प्रत्येक के लिए 33 फीसदी होता है। जबकि भारतीय सशस्त्र बल के पास यह आंकड़ा क्रमशः आधुनिक उपकरण के लिए आठ फीसदी, मौजूदा के लिए 24 फीसदी और पुरानी तकनीक के लिए 68 फीसदी है।
भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जिसके दो विरोधी-पाकिस्तान और चीन परमाणु शक्ति संपन्न हैं। दोनों की नजरें भारतीय क्षेत्र पर हैं। जबकि भारत की नजर किसी दूसरे देश के इलाके पर नहीं है। उनके सहयोग और बल की संभावित संयुक्त तैनाती ने भारतीय रक्षा योजनाकारों को यह सोचने को मजबूर किया है कि सबसे बदतर यही हो सकता कि दोनों मोर्चे पर एक साथ युद्ध छिड़े। इसका वर्तमान बल प्रोफाइल इसी धारणा पर आधारित है। केवल एक मजबूत सैन्य और आर्थिक शक्ति होने के नाते भारत उन्हें दुस्साहस से रोक सकता है। इसलिए भारतीय सशस्त्र बल कभी असावधान नहीं रह सकते।
आलोचक कहते रहे हैं कि बजट में आवंटित अधिकांश राशि सेना के वेतन और पेंशन के लिए निर्धारित है, जो कि सबसे ज्यादा है और सैन्य ताकतों में कमी करनी चाहिए। हालांकि आलोचक तथ्यों के बारे में नहीं जानते। पहला, पेंशन बजट का हिस्सा नहीं होती है। पेंशन बजट हालांकि अलग होता है, जिसमें रक्षा विभाग के असैन्यकर्मी भी शामिल होते हैं, जो ताकत में 25 फीसदी होने के बावजूद पेंशन बजट के 40 फीसदी का उपभोग करते हैं। इसका कारण यह है कि सैन्यकर्मी न्यूनतम सेवा करते हैं और जल्दी सेवानिवृत्त हो जाते हैं और इस तरह कम पेंशन पाते हैं, जबकि हर असैन्यकर्मी 60 वर्षों तक नौकरी करता है और ज्यादा पेंशन पाता है। वेतन में भी यही पैटर्न लागू होता है। दूसरी बात यह है कि केवल प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से ही मैनपावर की बचत हो सकती है। हालांकि इसकी भी एक सीमा है। दुश्मन को घुसपैठ करने से रोकने के लिए दोनों मोर्चों पर सीमाओं के साथ रक्षा बल को मजबूत किया जाना चाहिए। इसके अलावा ऑपरेशन शुरू करने के लिए बलों की आवश्यकता होती है। जहां संभव है, वहां तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण है रक्षा बजट योजना से जिन असैन्य कैडरों को भुगतान किया जाता है, उनकी क्षमता कम करना। तीसरी बात, रक्षा बजट केवल सशस्त्र बलों के लिए नहीं होता है। इस बजट से असैन्य नागरिकों को भी भुगतान किया जाता है, जिनकी संख्या चार लाख है, इसके साथ ही निष्क्रिय आयुध कारखानों और रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों का रख- रखाव किया जाता है। इन सभी में बड़ा खर्च होता है, बदले में आउटपुट हमेशा संदिग्ध होता है। इनमें से ज्यादातर प्रतिष्ठानों का न तो आधुनिकीकरण हुआ है और न ही विकास हुआ है। हालांकि वर्तमान सरकार ने उनमें आगे निवेश नहीं करने का फैसला किया है, पर उसके कर्मचारियों को भुगतान करने की आवश्यकता है।
कोई भी राष्ट्र केवल अपनी सैन्य जरूरतों का आयात करके सैन्य शक्ति नहीं बन सकता है। इसके लिए एक मजबूत आंतरिक रक्षा आधार होना चाहिए। दशकों से सभी रक्षा अनुसंधान एवं विकास से संबंधित कार्य डीआरडीओ को सौंपे गए थे और विनिर्माण का काम या तो रक्षा पीएसयू या आयुध फैक्टरियां करती थीं, पर अब इसमें बदलाव आना शुरू हो गया है और निजी कंपनियां भी जाग गई हैं। भारत में रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियां नवजात स्थिति में हैं, इनके पास स्वतंत्र अनुसंधान करने के लिए धन नहीं है।
इसी कारण सशस्त्र बलों ने अनुसंधान के वित्तपोषण के लिए निजी क्षेत्र का सहयोग तलाशने का काम करना शुरू कर दिया था। सेना की एक जरूरी परियोजना फ्यूचर इंफैन्ट्री कॉम्बेट व्हीकल थी, जो दो वर्षों से पाइपलाइन में है। इस परियोजना को धन की कमी के कारण पिछले वित्तीय वर्ष में स्थगित कर दिया गया था और इस वर्ष फिर से स्थगित कर दिया जाएगा। अन्य दो सेवाओं के साथ भी यही स्थिति है। बेशक राष्ट्र अपनी सामाजिक प्रतिबद्धताओं की उपेक्षा नहीं कर सकता, पर उसे अपनी सुरक्षा जरूरतों के प्रति भी यथार्थवादी होना चाहिए। अगर हम रक्षा खर्च में वृद्धि नहीं कर सकते, तो बेकार खर्चों में कटौती करने की जरूरत है, जिसमें आयुध फैक्टरियां और बेकार पीएसयू शामिल हैं। इससे ही आधुनिकीकरण के लिए धन उपलब्ध हो जाएगा। सरकार को रक्षा जरूरतों को समझने और यथार्थवादी बजट पर विचार करने की आवश्यकता है।