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मुद्दा: कार्बन उत्सर्जन के प्रति सचेत होंगे तो पर्यावरण भी बचेगा और खर्च भी

विवेक एस अग्रवाल
Updated Sat, 28 Oct 2023 07:14 AM IST

सार

'राइट टू रिपेयर' का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ उत्पादों की मरम्मत में निर्माता कंपनियों का एकाधिकार खत्म करना है।
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e-waste - फोटो : istock


विभिन्न उपयोगी उत्पादों को संपूर्ण जीवन अवधि तक उपयोग के उद्देश्य से दुनिया में 'राइट टू रिपेयर' -यानी मरम्मत के अधिकार की मुहिम छिड़ी हुई है। इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ उत्पादों की मरम्मत में निर्माता कंपनियों के एकाधिकार को समाप्त करना भी है। यह आंदोलन मूलतः इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रॉनिक तथा ऑटोमोबाइल उत्पादों की मरम्मत में व्याप्त एकाधिकार के खिलाफ चलाया जा रहा है।


अभी उत्पादों की मरम्मत के लिए पूर्णतया उसके निर्माता द्वारा अधिकृत स्थल पर ही निर्भर रहना होता है। अनेक कंपनियां नियोजित रूप से अपने पूर्ववर्ती उत्पादों को विलोपित कर देती हैं, ताकि उनके कल-पुर्जों के अभाव में उपभोक्ता के पास उत्पाद को फेंकने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही न रहे। बड़े निर्माताओं के एकाधिकार के चलते संपूर्ण विश्व में सूक्ष्म एवं लघु मरम्मत व्यवसायियों, कुशल अभियंताओं, सहायकों के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था पर संकट खड़ा होता चला जा रहा था। इसका असर आम उपभोक्ता पर भी पड़ रहा था।


पूरी दुनिया में लगभग पांच करोड़ टन ई-वेस्ट प्रतिवर्ष उत्पन्न होता है और उसमें से एक तिहाई यानी 1.6 करोड़ टन ई-वेस्ट अकेला भारत उत्पन्न करता है। संसाधनों के अभाव में एक तिहाई का ही पुनःचक्रण या प्रसंस्करण हो पाता है। यह मात्रा इतनी है, जैसे हर सेकंड 800 लैपटॉप फेंक दिए जाएं। यदि विषैले कचरे का विश्लेषण करें, तो उसका 70 फीसदी भाग ई-वेस्ट ही होता है। इन्हीं तथ्यों के मद्देनजर 'राइट टू रिपेयर' यानी मरम्मत के अधिकार आंदोलन की नींव रखी गई, जो ई-वेस्ट की मात्रा कम करने हेतु प्रभावी कदम है।


यदि उपभोक्ता को मरम्मत करने की सुविधा प्राप्त हो जाए, तो इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के बदलाव को आधे से भी कम किया जा सकता है। अधिकांश उपभोक्ता आज वस्तुओं को इसलिए बदलते हैं, क्योंकि मरम्मत की सुविधा नहीं है। अगर यह सुविधा है भी, तो निर्माता द्वारा निर्धारित सीमित स्थलों पर।


'राइट टू रिपेयर' का उद्देश्य निर्माता कंपनियों को बाध्य करना है कि वे अपने उत्पाद संबंधी कल-पुर्जे औजार, निदान के उपकरण तथा समस्त जानकारी उपभोक्ता एवं उन सभी को प्रदान करें। इस अधिकार के कानूनी रूप लेने के साथ मोबाइल फोन, वाशिंग मशीन, फ्रिज इत्यादि की आयु स्वतः ही बढ़ जाएगी और घरेलू व्यय में भी कटौती होगी। अमेरिका में पहली बार 'राइट टू फेयर रिपेयर कानून' पारित किया गया। ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया तथा यूरोपीय संघ के देशों ने भी चक्रीय अर्थव्यवस्था के दृष्टिगत मरम्मत को बढ़ावा देने तथा उपभोक्ता को मरम्मत का अधिकार देने के लिए कानून पारित किए हैं।


भारत में मरम्मत के अधिकार को कानूनी जामा पहनाने हेतु उपभोक्ता विभाग के तहत समिति का गठन किया गया है, ताकि हर व्यक्ति अपने उपकरण को उसके संपूर्ण जीवन तक उपयोग कर सके। हालांकि मरम्मत हेतु अधिकार सम्मत कोई कानून नहीं है। हाल ही में केंद्र सरकार ने लगभग 40 कंपनियों के सहयोग से मरम्मत का अधिकार देने हेतु एक पोर्टल प्रारंभ किया है, जिसमें लाइफ मिशन के तहत कृषि, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक तथा घरेलू उपयोग संबंधी उत्पादों की श्रेणी में विभाजित करते हुए निर्माताओं को पंजीकृत कर उनके सर्विस नेटवर्क, वारंटी संबंधी तथा हेल्पलाइन नंबर की जानकारी प्रदान की गई है।
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अपने उपकरणों का यथासंभव उसके संपूर्ण जीवन तक उपयोग करना एवं अधिकार पूर्वक उनका मरम्मत करवाना जरूरी है। इससे हमारी धरती को जीने योग्य बनाने में मदद मिलेगी।

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