वैसे तो मैं बहुत आशावादी व्यक्ति हूं, लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा होने के अलावा हमारे पास कोई और विकल्प भी नहीं है। यह बात कहना ठीक नहीं होगा कि हमारे आस-पास कुछ भी दुरुस्त नहीं है; सब कुछ गड़बड़ है। आप देखें, तो शिक्षा का हमारे देश में लगातार प्रसार हो रहा है। इसी का प्रभाव है कि राजनीति में जो नई पीढ़ी आ रही है, वह ज्यादातर पढ़ी-लिखी है और ज्यादा समझदार है। मुझे लगता है कि इसका व्यापक असर हमें भविष्य में दिखाई पड़ेगा। अच्छे राजनेता देश और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लेकर आएंगे। लेकिन इस बात से मैं इन्कार नहीं करता कि इस परिवर्तन को आने में थोड़ा वक्त जरूर लगेगा। रातोंरात यह नहीं होने वाला। हमने अब तक धैर्य रखा है। थोड़ा और धैर्य रखने की जरूरत है। मगर आज सबसे अच्छी बात यह है कि आम आदमी भी परिस्थितियों को बदले जाने की मांग कर रहा है। वह इतना सचेत हो चुका कि आपको बता सकता है, कि जो हो रहा है, वह सही है अथवा गलत। यही नहीं, वह पुरजोर आवाज में कहता है कि जो गलत है, उसे बदलना चाहिए।
आज जो राजनीतिक दल सत्तासीन हैं, वे इस क्रमशः आ रहे बदलाव को न केवल देख रहे हैं, बल्कि महसूस भी कर रहे हैं। निश्चित रूप से वे भी अब मन ही मन यह स्वीकार करने लगे हैं कि सर्वजन को यथास्थिति में नहीं रखा जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि इस परिवर्तन की प्रक्रिया क्या होगी। आखिर आम आदमी के हित में परिवर्तन कैसे आएगा? मैं मानता हूं कि एक लोकतंत्र में लोकतांत्रिक ढंग से ही सारी चीजें होनी चाहिए। यह परिवर्तन एक आवश्यक प्रक्रिया के तहत ही आना चाहिए और इसमें जो वक्त लगना मुनासिब है, वह लगना चाहिए। मुनासिब वक्त से मेरा मतलब अनावश्यक वक्त नहीं लगाए जाने से है। गैर-जरूरी विलंब को अब कोई बर्दाश्त नहीं करेगा। पहले ही हमें काफी देर हो चुकी है और इस देरी का एक बड़ा कारण है, भ्रष्टाचार। यह सही है कि व्यवस्था से पनपा भ्रष्टाचार आज हमारी जीवनशैली का हिस्सा हो गया है और गलत काम करने वाले को यह महसूस ही नहीं होता कि वह कुछ भी गलत कर रहा है। लेकिन सच मानिए कि यह भी बदलने वाला है।
मैं देश की राजनीति पर लगातार नजर रखता हूं। उसमें अपनी तरह से भागीदारी भी करता हूं। मैं गुजरात राज्य के चुनाव आयोग का एंबेसडर भी हूं। अतः मैं जहां जाता हूं, वहां सबसे अपने वोट का इस्तेमाल करने की अपील करता हूं। इससे ही बदलाव आ सकता है। मैं फिल्म जगत के उन लोगों में से हूं, जो मानते हैं कि सिनेमा लोगों को प्रभावित करता है। अतः लोगों का मनोरंजन करने के साथ-साथ सिनेमा की सामाजिक जिम्मेदारी बनती है। लेकिन आप हर फिल्म को जिम्मेदारी की श्रेणी में नहीं रख सकते। कुछ गिनी-चुनी फिल्में ऐसी होती हैं। मैं सौभाग्य से कुछ ऐसी राजनीतिक-सामाजिक फिल्मों का हिस्सा रहा हूं। जैसे रंग दे बसंती और थ्री इडियट्स। खास तौर पर थ्री इडियट्स देखने के बाद कई अभिभावकों ने मुझसे कहा कि उन्होंने अब अपने बच्चों को उनकी मर्जी का विषय पढ़ने की छूट दी है। पढ़ाई के अलावा भी अनेक स्तरों पर इस फिल्म ने माता-पिता की सोच में बदलाव किए। बच्चों के प्रति उनके सख्त रुख को नरम बनाया।
वास्तव में सिनेमा दोधारी तलवार है। यह हमें सपने भी दिखाता है और कड़वी सच्चाई भी। इस तरह यह सीधे हमारे कार्यकलापों को प्रभावित करता है। अतः हमें इसे देखते हुए यह चुनना पड़ेगा कि हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं? सिनेमा आप पर दबाव नहीं डालता कि आप इस तरह से जीएं या न जीएं। वैसे सिनेमा को बहुत जिम्मेदार बताने वालों को एक बात समझनी होगी कि दर्शक खुद बड़ा समझदार होता है। वह सिनेमा से हर बात नहीं सीखता। जैसे फिल्मों में हीरो द्वारा सिगरेट पीने का मुद्दा है। यह जरूरी नहीं कि अगर पर्दे पर हीरो सिगरेट नहीं पीएगा, तो लोग सिगरेट पीना बंद कर देंगे। अगर हमें लगता है कि दर्शक बेहतर जीवन के लिए कुछ बातों को नहीं समझ रहे हैं तो हमें अभियान चलाने चाहिए, जिनके द्वारा उन्हें वे बातें समझा सकें। इससे बदलाव जरूर आएगा।
मैं ऐसा विश्वास के साथ इसलिए कह सकता हूं कि मैंने लोगों को देखा है, लोग गलत बातों को खुद बदलना चाहते हैं। कोई भी ‘रांग साइड’ नहीं रहना चाहता। अंततः हम सच्चाई को चुनते हैं। उदाहरण के लिए एक छोटी घटना का जिक्र लाजिमी है। मैं मुंबई में रहता हूं। कुछ समय पहले यहां पुलिस ने शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों के खिलाफ अभियान शुरू किया और लोगों से आह्वान किया कि वह ऐसा न करें। कानून का पालन करें। देखते-देखते पंद्रह दिनों के भीतर लोगों की समझ में यह बात आ गई। आज अगर कोई लेटनाइट पार्टी में जाता है, तो वह या तो ऑटो-टैक्सी का इस्तेमाल करता है या फिर अपने साथ किसी को ड्राइविंग के लिए रखता है। 90 फीसदी लोगों ने पुलिस की बात को माना। दस फीसदी भले ही अभी कानून तोड़ते हों, लेकिन साफ है कि ज्यादातर लोग कायदे से चलना पसंद करते हैं। दिखने में यह साधारण बात लगती है, लेकिन यह बड़ी बात है। मुझे लगता है कि अगर सरकार और अधिकारी चाहें, तो रिश्वत जैसी बातों पर भी देखते-देखते लगाम लग सकती है। जनता में एक भी व्यक्ति आपको शायद न मिले, जो रिश्वत देना चाहता हो। हर कोई अपने और सबके लिए सहज, सुलभ तथा हितकारी व्यवस्था चाहता है। यह बात समझना आखिर कितना जटिल है? वास्तव में परिवर्तन के लिए सिर्फ इच्छाशक्ति की जरूरत है।