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गुंडा हमें बना दो...

Thu, 08 May 2014 07:52 PM IST
प्रकाश पुरोहित
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साहब, मुझे भी पकड़ लीजिए!
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क्यों भई, क्यों पकड़ लें?

गुंडा हूं सा’ब! चाहें तो कालू भिया से पूछ लें! कल ही तीन को ठोका है मैंने!

थाने में रपट है?

नहीं सा’ब! इतना ठोका कि रपट लिखाने लायक ही नहीं रहा!

वाह! थाने पर ताला लगवाएगा क्या?

शर्मिंदा कर रहे हैं सा’ब!

लेकिन, तुझे तो कभी थाने पर देखा नहीं! बंदी देने नहीं आता है क्या?

अभी ऐसा कुछ नहीं किया है कि बंदी देना पड़े। बड़े सा’ब से दो-तीन बार रिक्वेस्ट किया था कि कुछ अमाउंट तय कर दें, मगर बोले-अभी कुछ दिन और हाथ साफ कर!

जब साहब ने ही मना कर दिया, तो मैं कैसे मान लूं कि तू गुंडा है?

यही तो मुश्किल है सा’ब! पुलिस जब तक गुंडा नहीं मानती, पब्लिक भी डरती नहीं है। तीन साल से लगा हूं। हर बार उम्मीद करता हूं कि इस बार गुंडा-अभियान में मेरा नाम आएगा। पर न जाने कहां चूक हो जाती है?
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बेटा, पुलिस वाला बनना आसान है, गुंडा बनना बहुत मुश्किल है।

सा’ब, कोई टिप्पस भिड़वा दीजिए न।

मेरे हाथ में होता, तो अभी गुंडा बना देता, मगर मामला ऊपर का है, फिर एक-एक इलाके से दस-दस लगे पड़े हैं गुंडा बनने के लिए। किसको पकड़ें।

कुछ तो कीजिए! बस, एक बार पब्लिक की नजर में आ जाऊं, तो लाइफ बन जाएगी। आप तो जानते हैं कि पुलिस तो कभी-कभार ही मोहल्ले में आती है, हम गुंडों को ही इलाका संभालना पड़ता है। तय तारीख पर पहुंच जाएगा आपका हिस्सा!
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ठीक है, ऐसा करना! कल दबिश पड़ेगी। तू तो यों ही भागने लगना! पकड़ लूंगा वहीं तुझे! सात गुंडों का टारगेट है। तुझे भी एडजस्ट कर लेंगे।

बस, एक बार गुंडा बनवा दीजिए, फिर देखिएगा, पूरे थाने से ज्यादा कमाई दूंगा आपको।

ठीक है, आ जाना कल। बना देंगे तुझे भी गुंडा।
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