दरअसल, पीओके में असंतोष की यह आवाज अचानक पैदा नहीं हुई है, बल्कि वर्षों की आर्थिक बदहाली, प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक अधिकारों के अभावों की ही परिणति है। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान ने कभी भी पीओके को सांविधानिक रूप से अपने मुख्य भू-भाग का दर्जा नहीं दिया। यह विडंबना ही है कि दशकों से पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर में मानवाधिकारों की दुहाई देता रहा है, लेकिन जब उसके अपने कब्जे वाले क्षेत्र के लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, उद्योग या बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों की बात आती है, तो इस्लामाबाद की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।
ऐसे में, अगर राजनीतिक उपेक्षा की भावना भी जुड़ जाए, तो असंतोष का व्यापक आंदोलन में बदलना स्वाभाविक ही है। पीओके का वर्तमान आंदोलन इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में यहां महंगाई, बिजली संकट, बेरोजगारी, करों में वृद्धि और आटे की कीमतों को लेकर लोग आक्रोशित होते रहे हैं, जिनका पाकिस्तानी हुकूमत ने क्रूरता से दमन कर दिया था। दरअसल, पाकिस्तान विदेशी कर्ज के बोझ तले बुरी तरह दबा हुआ है और संसाधन बहुल पीओके में उसे अपने आर्थिक संकटों का समाधान दिख रहा है।
भारत में जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में जिस तरह से विकास हो रहा है, वह भी पीओके के लोगों से छिपा नहीं है, अलबत्ता यह पाकिस्तानी हुकूमत से उनकी असंतुष्टि को बढ़ा ही रहा है। ताजा आंदोलन में पीओके के लोग जिस तरह से भारत से जुड़ने की इच्छा जता रहे हैं, उसके पीछे भी पाकिस्तानी शासन के प्रति उनकी गहरी निराशा ही है। बलूचिस्तान हो, खैबर पख्तूनख्वा हो या पीओके, पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या यही रही है कि वह अपने भीतर उठ रही हर असहमति को बाहरी साजिश बताता आया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह दूसरे देशों को मानवाधिकारों के उपदेश देता है। भारत को इस स्थिति का रणनीतिक उपयोग करते हुए कूटनीतिक स्तर पर इस्लामाबाद पर दबाव बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। अब समय आ गया है कि दुनिया पीओके की सच्चाई पर नजर डाले।