घाटी से इन दिनों कई तरह की खबरें आ रही हैं। कश्मीर में वक्त-बेवक्त इस्लामिक स्टेट (आईएस) के झंडे लहराए जा रहे हैं। श्रीनगर में आयोजित पहली अंतरराष्ट्रीय हाफ मैराथन में युवाओं को पाकिस्तान का झंडा लहराते देखा गया। जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि लश्कर-ए-ताइबा सोपोर इलाके में बेस बनाने की कोशिश में जुटा है। और, घाटी में आतंकी संगठनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई तेज और हिंसक हो गई है। मसलन, कहा जा रहा है कि हिज्बुल मुजाहिदीन से अलग हुआ लश्कर-ए-इस्लाम नाम का नया आतंकी संगठन लश्कर-ए-ताइबा के निशाने पर है। इस तरह की सूचनाएं किसी को भी चिंतित कर सकती हैं। लेकिन अगर व्यापक अर्थों में देखें, तो इन खबरों के मायने कुछ और होंगे।
दरअसल, कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित कई आतंकी संगठन सक्रिय हैं, जो चाहते हैं कि किसी भी कीमत पर कश्मीर के मसले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सुर्खियों में रखा जाए। इसमें उन्हें पाकिस्तान की शह भी मिल रही है। लिहाजा जब तक पाकिस्तान न चाहे, आतंकी संगठन चुप नहीं रहने वाले; फिर चाहे इसके लिए पाकिस्तान से हमारी सरकार कितनी बार बातचीत क्यों न करे। इसकी वजह यह है कि अगर कश्मीर का मसला हल हो जाएगा, तो फिर पाकिस्तान सरकार के पास अपने नागरिकों को अपनी उपलब्धि बताने के लिए कुछ नहीं होगा। मुश्किल हालांकि यह भी है कि कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित राजनीतिक समूह, खासकर हुर्रियत जैसे संगठन सक्रिय हैं, जिन्हें हमारे राजनीतिक दलों का भी समर्थन प्राप्त है। मुफ्ती मोहम्मद सईद जैसे नेता हुर्रियत के अपेक्षाकृत उदार धड़े (मीरवाइज उमर फारूक के संगठन) का समर्थन करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इनकी बात किए बिना पूरे कश्मीर को लेकर बात पूरी नहीं हो सकती।
मगर यहां सवाल यह है कि वार्ता किसके लिए हो रही है। पाकिस्तान की मंशा पूरे कश्मीर को हड़पने की है। जिस कथित आजादी की वह बात करता है, उससे उसका कोई मतलब नहीं है। दूसरी ओर, हुर्रियत के कट्टरपंथी लड़ाके हैं, जो पाकिस्तान के पिछलग्गू बनने की नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राज्य की चाहत रखते हैं। वे आईएस की तरह कश्मीर को एक अलग इस्लामिक स्टेट बनाने के पक्षधर हैं। इसी तरह कश्मीर में कुछ लोगों का गुट ऐसा भी है, जो चाहता है कि आम कश्मीरी का सत्ता में प्रतिनिधित्व हो। वे 'अपने लोग-अपनी सरकार' की वकालत करते हैं। दरअसल कश्मीर के अवाम की राजनीतिक सोच चार-पांच हिस्सों में बंटी है। चूंकि इस तरह की वहां कई भावनाएं पनप रही हैं, इसलिए हमें वक्त-बेवक्त वहां कई तरह के झंडे लहराते दिख जाते हैं। हमें समझना होगा कि कश्मीर सिर्फ एक राजनीतिक नहीं, बल्कि ऐसा जटिल मुद्दा है, जिसके कई आयाम हैं। और जब हम इन सभी आयाम को समझ जाएंगे, तभी इस समस्या का हल निकाल सकेंगे। मगर सच्चाई यह है कि फिलहाल ऐसी कोई कोशिश हमारे राजनीतिक दलों या नीति-नियंताओं की तरफ से नहीं हो रही है।
रही बात लश्कर-ए-इस्लाम या लश्कर-ए-ताइबा में वर्चस्व की लड़ाई की, तो चूंकि इन आतंकी संगठनों में भी वैचारिक मतभेद हैं, इसलिए उनमें जब-तब वर्चस्व की लड़ाई चलती रहती है। मगर सच यह भी है कि लश्कर का नाम इस्तेमाल करने का मतलब है कि इनके आका एक हैं, और इनकी मंशा घाटी का माहौल बिगाड़ना है। मगर एक-दूसरे पर ये इसलिए आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, ताकि अपने लड़ाकों को प्रोत्साहित कर सकें। असल में, विभिन्न गुटों में इनके बंटने की वजह आर्थिक भी होती है। मसलन, यदि अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान को रातोंरात किसी संगठन पर प्रतिबंध लगाना पड़ा और उसके तमाम बैंक अकाउंट जब्त करने पड़े, तो दूसरे संगठन की आड़ में लश्कर अपना हित साध सकता है। यानी इन संगठनों की विचारधारा भले अलग दिखे, मगर मकसद सभी का एक ही है। हालांकि हाल के दौर में घाटी के युवाओं के आतंकी होने की कई खबरें आई हैं, जिनके बारे में फिलहाल भरोसे के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता। यह पाकिस्तान की साजिश भी हो सकती है, या हो सकता है कि घाटी में आतंकी संगठनों में वर्चस्व की लड़ाई की सूचना आगे जाकर सही निकले। लेकिन फिलहाल कुछ लाशों के आधार पर यह कहना कठिन है कि लश्कर-ए-इस्लाम और लश्कर-ए-ताइबा के बीच जंग चल रही है। दरअसल माहौल बिगाड़ने के लिए घाटी में एक साथ इतने तत्व काम करते हैं कि यकीन के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता।
घाटी में इस्लामिक स्टेट के पांव पसारने की आशंका भी इन दिनों व्यक्त की जाने लगी है। मगर आईएस का कश्मीर में पांव जमाना या इस पर कब्जा करने की मंशा पालना असंभव ही है। हमारी सीमा में दाखिल होने से पहले आईएस को पाकिस्तान पर शासन स्थापित करना होगा। जबकि सच यह भी है कि यह अभी वहां भी अपना दबदबा पूरी तरह नहीं बना पाया है, जहां वह दिन-रात लड़ रहा है। मगर हां, हमें सोशल मीडिया पर उसके प्रसार पर जरूर गौर करना चाहिए। हालांकि इसके लिए भी सोशल मीडिया पर किसी तरह के प्रतिबंध या कार्रवाई के बजाय हमें ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि अगर कोई आईएस से संबंधित वीडियो आदि देख रहा है, तो उसके बरक्स उसे हमारी सरकार की जनहितकारी योजनाओं के बारे में बताया जाए। सरकार चाहे, तो ऐसा तंत्र बनाकर उन लोगों की दारुण दशा की कहानी भी सोशल मीडिया पर शेयर कर सकती है, जो वतन छोड़कर आईएस में शामिल होने के लिए सीरिया गए तो जरूर, मगर वहां उनकी बुरी गत हुई। अगर लोगों को वहां की मुश्किलें दिखाई जाएंगी, तो भला वे आईएस के प्रभाव में कैसे आएंगे! साफ है कि घाटी में समस्या के समाधान के लिए कई मोर्चों पर काम करना पड़ेगा। इसका कोई एक समाधान नहीं है।