आक्रोश अपरिहार्य है और यह सबसे ज्यादा सोशल मीडिया (वाट्सऐप्प, फेसबुक और ट्विटर), टीवी चैनलों और अखबारों में दिख रहा है। चीन में बनी वस्तुओं के बहिष्कार का कोरस पाकिस्तान को चीन के समर्थन और संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित कराने के प्रयास के बार-बार चीनी विरोध से प्रेरित है। यह संदेश इस भावनात्मक अपील के साथ पहुंच रहा है कि जिसका खून हिंदुस्तानी है, वह भारतीय जवानों के बारे में सोचे। चीनी माल के बहिष्कार के आह्वान में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बापू के विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का रोमांस है। इस संदेश ने निस्संदेह आम लोगों, मंत्रियों और सांसदों के दिमाग पर कब्जा कर लिया है-चाहे वह हरियाणा के अनिल विज हों, मध्य प्रदेश के कैलाश विजयवर्गीय हों, आंध्र प्रदेश के जमात का एक गुट हो या उत्तर प्रदेश के व्यापारियों का संघ हो। बिहार में ओबरा की ग्राम पंचायत ने तो चीन में बनी वस्तुओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है।
मगर क्या इस बहिष्कार का उपभोक्ताओं की पसंद और बिक्री पर कोई असर पड़ा है? इसके सबूत कम हैं-आपने बहिष्कार के कारण मंदी की कहानियां सुनी होंगी और यह भी सुना होगा कि कैसे अक्तूबर के शॉपिंग फेस्टिवल के दौरान पांच लाख चीनी फोन सेट ऑनलाइन खुदरा विक्रेताओं द्वारा बेचे गए। चीन पर इसके दीर्घकालीन असर का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि जिन व्यापारियों ने उत्सव के मौसम के लिए आयातित वस्तुओं के लिए पहले ही भुगतान कर दिया है, सबसे पहले नुकसान उन्हें ही होगा।
भावनाएं और आक्रोश सिर्फ संकेत होते हैं। भारत की गरिमा को सुनिश्चित करने के लिए रणनीतिक सोच आवश्यक है। चुनौतियों का आकलन करने के लिए यह भी देखना चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था में चीन की कितनी पैठ है। चीन की सर्वाधिक मौजूदगी संदेश के माध्यमों में दिखाई देती है-जिन फोन के जरिये बहिष्कार के संदेश लोगों तक पहुंचाए जा रहे हैं, वे चीन में बने हैं या उनके पुर्जे चीन निर्मित हैं। बहिष्कार के संदेश संभवतः चीनी इलेक्ट्रॉनिक्स, सिम कार्ड के जरिये ही नेटवर्क पर एक से दूसरे के पास पहुंच रहे हैं और राउटर्स भी ज्यादातर चीन निर्मित ही हैं। कोरिया और जापान में बने फोन के पुर्जे भी चीन निर्मित हैं। चीन का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात कोरिया और जापान में 70 अरब डॉलर का है।
वर्ष 2015-15 में चीन ने भारत से नौ अरब डॉलर का आयात किया, जबकि भारत ने चीन से 60 अरब डॉलर का आयात किया। भारत अन्य किसी भी देश के मुकाबले चीन से सर्वाधिक आयात करता है-अमेरिका, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से भी ज्यादा। चीन इस बहिष्कार का संज्ञान लेगा या नहीं, इसका सही आकलन उसे निर्यात से होने वाली आय पर विचार करके ही किया जा सकता है। वर्ष 2015 में चीन ने 2.15 ट्रिलियन का निर्यात किया, जो लगभग भारत के जीडीपी के बराबर है। चीन जितना निर्यात करता है, उसका मात्र तीन फीसदी ही भारत आयात करता है।
भारत जिन शीर्ष पांच वस्तुओं का आयात चीन से करता है, वे हैं-19.7 अरब डॉलर का इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इलेक्ट्रिकल माल, 10.5 अरब डॉलर का न्यूक्लियर रिएक्टर और मशीनरी, छह अरब डॉलर का जैविक रसायन, 3.2 अरब डॉलर का उर्वरक और 2.3 अरब डॉलर का लोहा एवं इस्पात। दस लाख डॉलर की एक चौथाई से भी कम के पटाखों का आयात होता है।
क्या भारत अपने परमाणु कार्यक्रमों को रोक सकता है या उपकरणों के अभाव में अपनी बिजली परियोजनाओं में देरी कर सकता है? मूल्यवर्धन और रोजगार के लिहाज से इलेक्ट्रॉनिक्स आयात महत्वपूर्ण हैं। इस्पात का आयात ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चर और निर्यात के लिए महत्वपूर्ण है और उर्वरक का आयात खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है। हैरानी नहीं कि वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि 'चीन से आयात पर प्रतिबंध एक व्यावहारिक विकल्प नहीं है'। चीन से निपटने के प्रति भारत की प्रतिक्रिया और घरेलू आक्रोश को व्यावहारिक होना चाहिए।
याद कीजिए, 1990 के दशक में प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत और चीन एक ही जगह पर खड़े थे और दोनों देशों में उदारीकरण की प्रक्रिया भी लगभग एक ही समय शुरू हुई थी। 1993 में विश्व-व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 0.6 फीसदी थी, जबकि चीन की हिस्सेदारी 2.1 फीसदी। वर्ष 2015 में भारत ने 1.7 फीसदी के आंकड़े को छुआ, जबकि चीन की हिस्सेदारी बढ़कर 14.2 फीसदी हो गई। चीन ने वह किया, जो जरूरी था, पर भारत ने नहीं किया।
प्रतिबंध के आह्वान को चीन की जगह लेने के अभियान के लिए रास्ता खोलना चाहिए-यानी मेक इन इंडिया के विचार से आगे बढ़ना होगा। भारत परमाणु रिएक्टरों और बॉयलर के लिए 21 अरब डॉलर की मशीनरी और अन्य उपकरण चीन, अमेरिका, जर्मनी, जापान और कोरिया से आयात करता है, जिसमें से आधा आयात चीन से होता है। क्या आयात ही विकल्प है, और क्या आयात चीन से ही होना चाहिए? आयात का निर्धारण मूल्य शक्ति से होता है। ऊर्जा मंत्रालय की एलईडी बल्व की पहल की सफलता इलेक्ट्रॉनिक्स आयात पर निर्भर है। हमारी सरकार को खुद से यह सवाल पूछने की भी जरूरत है कि वह पांच अरब डॉलर के फर्नीचर, गद्दे, खिलौने, आदि चीन से क्यों आयात करती है? भारत इसलिए आयात करता है, क्योंकि इसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कम है।
भारत को प्रतिस्पर्धी बनने के लिए निवेश और प्रौद्योगिकी को आकर्षित करने तथा खरीद और कराधान नीतियों को बदलने के लिए सुधारों को लागू करना होगा। चीन की भू-राजनीतिक स्थिति उसकी आर्थिक ताकत की उपज है। भारत यदि वाकई विश्व व्यवस्था में अपने कद को लेकर गंभीर है, तो उसे चीन से आर्थिक मुकाबला करना होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ आर्थिक सुरक्षा को जोड़ना होगा।