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रतन टाटा: वादों और मूल्यों पर अटल रहने वाली विभूति, नीले आकाश से ऊंची नैतिकता...

नंदितेश निलय (स्पीकर, लेखक  एवं एथिक्स प्रशिक्षक) Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 11 Oct 2024 05:47 AM IST

सार

Ratan Tata: रतन टाटा भारत के अनोखे वीआईपी थे, जो अपनी फाइल लिए अकेले चलते थे। और महामारी के दिनों में बिना किसी को बताए अपने उस कर्मचारी से मिलने पुणे पहुंच गए, जो बीमार थे। उन्हें यकीन था कि मनुष्य साधन नहीं साध्य होता है। उनका बिजनेस दर्शन मानो कांट के बेहद करीब था, यानी मनुष्य को कभी साधन नहीं समझना चाहिए।
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रतन टाटा (फाइल) - फोटो : पीटीआई


यह वाकया जुड़ा है उस महान जर्मन दार्शनिक से, जिनका नाम शोपेनहावर है। वह चुपचाप पार्क में बैठे थे, तभी एक पुलिस वाला आता है और उनसे पूछता है कि ‘आप कौन हैं?’ यह प्रश्न सुनते ही शोपेनहावर की आंखें चमक उठती हैं और वह भी पुलिस वाले से तपाक से यही पूछ डालते हैं, ‘भाई, मैं भी तो यही जानना चाहता हूं कि आखिर मैं कौन हूं?’ यही कौन होने का अहसास उस रतन को भी था, जो अमेरिका में पढ़ रहे थे। और फिर अपने वतन वह लौटते हैं, उस प्रेम को छोड़कर, जो देशप्रेम से बड़ा नहीं था। वे भारत आते हैं और टाटा की जिम्मेदारी संभालते हैं।


और यह बात दीगर है कि स्वतंत्र भारत में बिजनेस करना और वह भी नैतिकता के मूल्यों के साथ, इतना आसान भी नहीं था। नौकरशाही की दीवारें उन तमाम फाइलों की गति को रोकने के लिए काफी थीं। पर रतन रुके नहीं। जब उनकी ड्रीम कार इंडिका उनकी पैसेंजर कार की सपनों की गति को नहीं पकड़ सकी, तो वह फोर्ड के हेडक्वार्टर डेट्रियट पहुंचते हैं। वह उदास होते हैं जब फोर्ड के चेयरमैन बिल फोर्ड उनसे कहते हैं, ‘जब आपको पैसेंजर कार के बारे में कुछ पता ही नहीं था, तो बिजनेस शुरू क्यों किया। हम इसे खरीदकर आप पर एहसान ही करेंगे।’ रतन टाटा अपनी टीम के साथ भारत लौटते हैं और करीब एक दशक बाद जब फोर्ड मोटर्स दिवालियेपन के कगार पर आ चुकी होती है, तो वह फोर्ड के लग्जरी ब्रांड को खरीद लेते हैं। उनके इस कदम से बिल फोर्ड भावुक हो जाते हैं और कहते हैं, ‘जेएलआर खरीदकर आप हम पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं।’ लेकिन रतन टाटा उसी विनम्रता के साथ खड़े नजर आते हैं। वह विनम्रता, वे नैतिक मूल्य, जो टाटा समूह की पहचान हैं। टाटा यानी गुड बाय नहीं, टाटा यानी भरोसा। और रतन टाटा बिजनेस की दुनिया में एथिक्स की प्राण प्रतिष्ठा करने में बखूबी सफल रहे। वह एथिक्स, जो उनके आचरण में थी, जो ह्यूमन को ह्यूमन रिसोर्स से बखूबी अलग कर लेती थी और रतन टाटा के व्यक्तित्व पर हमेशा वह सफेद रंग बनकर चमकती थी, जिस रंग के वह बेहद करीब थे और अपने घर की दीवारों को भी उसी रंग में रंगे रखते थे। और उस फोर्ड को दिवालियेपन से बचाकर भी उन्होंने अपने अंदर के इन्सान को अभिमानी होने नहीं दिया।


रतन सफल रहे और वह भी उस दुनिया में, जहां अकूत पैसा ही व्यक्ति को पहचान देता है।  लेकिन वह तो जीवन-मूल्यों के धनी थे और उनकी पहचान उनका सहृदय संप्रेषण था। एक जिक्र विलियम शेक्सपियर के नाटक जूलियस सीजर से, जिसमें मार्क एंटनी कहते हैं : ‘दोस्तो, रोमनो, देशवासियो, मुझे अपने कान उधार दो... मैं सीजर को दफनाने आया हूं, उसकी प्रशंसा करने नहीं। मनुष्य जो बुराई करता है, वह उसके बाद भी जीवित रहती है; अच्छाई अक्सर उसकी हड्डियों के साथ दफन हो जाती है... सीजर मेरा दोस्त था, मेरे प्रति वफादार और न्यायप्रिय। लेकिन ब्रूटस का कहना है कि वह महत्वाकांक्षी था। और ब्रूटस एक सम्माननीय व्यक्ति हैं...’  यही अच्छे नेता का गुण होता है। और हां, एक अच्छा नेता सबसे पहले एक अच्छा इन्सान होता है।


मोरल पर्सन एंड मोरल मैनेजर शीर्षक लेख में ट्रेविनो, हार्टमैन और ब्राउन लिखते हैं, ‘नैतिक नेतृत्व की प्रतिष्ठा दो आवश्यक स्तंभों पर टिकी हुई होती है : एक नैतिक व्यक्ति और एक नैतिक प्रबंधक, दोनों के रूप में आपकी धारणाएं। एक नैतिक व्यक्ति के रूप में कार्यकारी को ईमानदारी और अखंडता जैसे व्यक्तिगत गुणों के संदर्भ में चित्रित किया जाता है। नैतिक प्रबंधक के रूप में, सीईओ को संगठन के मुख्य नैतिकता अधिकारी के रूप में माना जाता है, जो एक मजबूत नैतिकता का संदेश देता है और कर्मचारियों का ध्यान भी आकर्षित करता है और उनके विचारों और व्यवहारों को तो प्रभावित करता ही है।’


तभी तो रतन टाटा भारत के अनोखे वीआईपी थे, जो अपनी फाइल लिए अकेले चलते थे। और महामारी के दिनों में बिना किसी को बताए अपने उस कर्मचारी से मिलने पुणे पहुंच गए, जो बीमार थे। उन्हें यकीन था कि मनुष्य साधन नहीं साध्य होता है। उनका बिजनेस दर्शन मानो कांट के बेहद करीब था, यानी मनुष्य को कभी साधन नहीं समझना चाहिए। जब टाटा स्टील के कर्मचारियों ने ब्लड डोनेशन किया, तो रतन टाटा ने उन्हें हाफ डे छुट्टी दे दी। वाकया यह है कि किसी ने उनसे कहा कि इससे तो फैक्टरी उत्पादन पर असर पड़ेगा। लेकिन रतन टाटा कर्मचारियों की कृतज्ञता से अभिभूत थे। उन्होंने माना कि किसी भी औद्योगिक उत्पादन से ज्यादा उनके कर्मचारियों के ब्लड डोनेशन  का योगदान महत्वपूर्ण था। उनके जीवन- मूल्यों में इंटीग्रिटी, एमपैथी और कंपैशन कूट-कूटकर भरा था। लेकिन एक और वैल्यूज के रतन नायक थे और वह करेज था।


उस दिन संवेदनशील रतन टाटा मोटर बाइक पर बैठे उस दंपती को बारिश में भींगता देखकर एक लखटकिया कार का सपना देखते हैं। उनकी आंखों में नैनो चमकती है। सिंगूर की भीड़ उनके लोगों पर हमला करने आती है और रतन दहाड़ते हैं। वह 500 करोड़ रुपये छोड़ने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन अपने कर्मचारियों को बचा के ले जाते हैं। और उस सपने को भी, जो पहली बार भारत के निम्न वर्ग के दंपती को कार की सुरक्षा और सपना देने वाला था। एक लाख वाली कार का सपना। टाटा का पूरा प्लांट गुजरात के साणंद पहुंचता है। रतन टाटा बैलेंस शीट पढ़ते हैं, तो हानि ही हानि नजर आती है। पर रतन तो रतन ठहरे। बिजनेस को एथिक्स से जोड़कर ही माने और यहां तक कि जिस प्रोडक्ट को टाटा ने छुआ, वह अपने आप में ही भरोसे के लायक हो गया। तमाम घाटे के बावजूद वह नैनो लेकर आए, क्योंकि वह अपने आदर्श वाक्य को कभी नहीं भूलते थे कि प्रॉमिस इज ए प्रॉमिस। जेआरडी अपनी बायोग्राफी बियोंड द लास्ट ब्लू माउंटेन में कहते हैं कि ‘मैं नीले आकाश के ऊपर क्या है, वह भी देखना चाहता हूं।’ शायद उन्हें उस नीले आकाश के ऊपर सफेद रंग में रंगे रतन टाटा मिलें, उन्हीं जीवन-मूल्यों के तेज और नैतिकता के साथ यह कहते हुए, ‘जे, आपके मूल्यों पर चलते हुए मैंने एक ट्रस्टी के ही रूप में कार्य किया। और नहीं भूला कि ए प्रॉमिस इज ए प्रॉमिस, चाहे देशवासियों से हो, अपनी टीम से हो या आपसे हो।’
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रतन टाटा नहीं रहे, लेकिन बिजनेस की दुनिया को एथिक्स दे गए और यह भी सिखा गए कि नैतिक मूल्यों के संग भी बखूबी बिजनेस किया जा सकता है- कई बार हारकर, कई बार जीत कर लेकिन सबसे धनी बनकर नहीं, सबसे अच्छा इन्सान बनकर। टाटा, सर रतन!      

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