जेपी ने अपने क्रांतिकारी जीवन के अंतिम पड़ाव में संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया। राज सत्ता में बढ़ते लोकतंत्र विरोधी रुझान और सार्वजनिक जीवन में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन संपूर्ण सामाजिक परिवर्तन का एक व्यापक जन आंदोलन बन गया, लेकिन तत्कालीन सत्ताधीशों ने उसे अपनी सत्ता के लिए खतरा मानकर आपातकाल लगा दिया। जीवन-मरण के संघर्ष के दौरान जेपी ने देश की अंतर्चेतना को जगाया, जिसके फलस्वरूप 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी द्वारा अलोकतांत्रिक कांग्रेस को पराजित किया जा सका, लेकिन जेपी इस नए प्रयोग से भी संतुष्ट नहीं थे।
स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के इतिहास का सिलसिलेवार अध्ययन जेपी को गांधी, नेहरू, पटेल के बाद सबसे प्रभावी चिंतक के रूप में स्वीकारता है अमेरिका से पढ़ाई समाप्त कर मार्क्सवाद से प्रभावित जेपी को कांग्रेस के तात्कालिक नेतृत्व से ज्यादा आशाएं नहीं थीं। यही वह दौर है, जब जेपी देश भर के समाजवादी तत्वों को इकट्ठा करके कांग्रेस पार्टी को मौलिक एवं परिवर्तन का वाहक संगठन बनाने के प्रयासों में जुटे। इसमें प्रखर गांधीवादी के साथ-साथ मार्क्सवादी चिंतन से जुड़े लोग शामिल थे।
महात्मा गांधी के समय से ही नेपाल की राजशाही के विरुद्ध चल रहे जन आंदोलनों को कांग्रेस का निरंतर समर्थन मिलता था। जेपी के नेपाली कांग्रेस के नेता बीपी कोइराला परिवार से निकट संबंध थे, जिन्हें नेपाल सरकार लंबे अरसे से नजरबंद किए हुई थी। डॉ. लोहिया के नेतृत्व में समाजवादियों द्वारा कोइराला की रिहाई के लिए एक प्रदर्शन नेपाली दूतावास पर रखा गया। डॉ. लोहिया समेत सभी लोगों को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। जेपी तो मानो आग बबूला थे। उन्होंने सरकार की कड़ी निंदा की और इसे नागरिक आजादी पर स्वतंत्र भारत में पहला प्रहार करार दिया।
इसी बीच समाजवादी पार्टी के गठन के बाद कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर जीतकर आए समाजवादियों ने त्यागपत्र देने शुरू कर दिए। यह भारतीय राजनीति में नैतिक मूल्यों की पराकाष्ठा थी। त्यागपत्र देने वालों में अगली कतार में आचार्य नरेंद्र देव भी थे। उपचुनाव की घोषणा हो चुकी थी, आचार्य जी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार घोषित हुए।
पंडित नेहरू ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत से निजी तौर पर आग्रह किया कि उनके विरुद्ध कोई कांग्रेसी उम्मीदवार न खड़ा किया जाए, लेकिन समाजवादियों से क्षुब्ध कांग्रेस का दक्षिणपंथी नेतृत्व मानो उन्हें सबक सिखाने के लिए तैयार बैठा था। जेपी के आक्रोश की सीमा नहीं थी। उन्होंने लिखा कि कांग्रेस तानाशाही की ओर अग्रसर है।
1952 में लोकसभा के आम चुनावों में समाजवादियों की करारी हार हुई। उन्हें मात्र 13 सीटों पर ही विजय हासिल हुई। इधर समाजवादी पार्टी में निरंतर उभर रहे अंतर्विरोधों से जेपी निराश हुए और मेहनत से बनाई अपनी ही पार्टी को उन्होंने अलविदा कहा। इसी बीच डॉ. विनोबा भावे भूदान कार्यक्रम चलाकर काफी लोकप्रिय हो चले थे। जेपी का साथ मिलने से कई लाख एकड़ भूमि का वितरण भूमिहीनों में कराकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।
वर्ष 1974 के छात्र विद्रोह की कमान भी उन्होंने सशर्त संभाली कि इसमें हिंसा की कोई जगह नहीं होगी। इंदिरा गांधी के इर्द-गिर्द जमा चौकड़ी ने चंद्रशेखर के सभी प्रयासों पर पानी फेर दिया, जब वे दोनों के बीच तालमेल के प्रयासों में लगे थे। आपातकाल में जेपी समेत लाखों कार्यकर्ता जेल गए। जेपी के आभा-मंडल के प्रभाव के कारण ही जनता पार्टी का जन्म हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी की करारी हार हुई।
इंदिरा जी चुनाव हार चुकी थीं। समाजवादियों में जेपी अकेले नेता थे, जो पंडित नेहरू को ‘भाई साहब’ कहकर संबोधित करते थे। ऐसा ही रिश्ता उनका इंदिरा गांधी से बना रहा। आंदोलन जब चरम पर था, तो जयप्रकाश नारायण ने अपने एक विशेष दूत के जरिये कुछ पारिवारिक पत्र इंदिरा जी के यहां इस आशय के साथ भिजवा दिए कि निजी रिश्तों को राजनैतिक रूप दिए जाने से बचा जा सके।
रामलीला मैदान की जनता पार्टी की विजय रैली में अपना भाषण समाप्त कर वह सीधे इंदिरा जी से मिलने उनके आवास पहुंचे और कुशल-क्षेम पूछते हुए अश्रुपूर्ण आंखों से विदाई ली।