है उससे बिछड़ने का मलाल और तरह का
गुरुवार 10 अक्तूबर, 2024 को भारत के आमोखास का जहन खालिद मोईन की इन पंक्तियों जैसा ही था। रतन टाटा के पार्थिव शरीर के साथ मुंबई में वर्ली के अंतिम संस्कार स्थल की तरफ बढ़ती हुई भीड़ अपनी यादों और बातों में रतन टाटा को सैकड़ों किस्सों में याद कर रही थी। लाजिम भी है, टाटा समूह को याद रखने की हजार वजहें पहले भी थीं, आज भी हैं और आगे भी रहेंगी।
अलबत्ता बाम्बे हाउस, जो बीते सौ साल से टाटा समूह का मुख्यालय है, जिसके गलियारों में इतिहास के देवता बोलते हैं और वहां जमशेद जी के युग से रतन युग तक जिस एक सवाल पर सबसे ज्यादा नाखून चबाए गए हैं, वह है टाटा समूह का उत्तराधिकार। इस भव्य घराने की विरासत कथाओं पर कई किश्तों में धारावाहिक बन सकते हैं। इस पैमाने पर रतन टाटा जमशेद जी और जेआरडी से आगे निकल जाते हैं।
जेआरडी ने जो कॉरपोरेट विरासत छोड़ी थी, वह असंख्य कंपनियों में बिखरा हुआ एक औद्योगिक समूह था। बाम्बे हाउस उन दिनों को याद करता है, जब रतन टाटा समूह को बिखरी रियासतों की तरह एक झंडे के नीचे लाने की कोशिश में लगे थे। टाटा 1917 में बनी टाटा संस समूह की कंपनियों पर नियंत्रण गंवा चुकी थी। 1980 के दशक के अंत तक टिस्को (आज की टाटा स्टील), तब की टेल्को (आज की टाटा मोटर्स) और ताज होटल्स की मालिक इंडियन होटल्स में टाटा संस की हिस्सेदारी इस कदर कम हो गई थी कि टाटा संस इनका प्रबंधन नहीं कर सकता था।
बाम्बे हाउस के दस्तावेजों में रतन टाटा का यह अभियान असंख्य किस्सों के साथ दर्ज है कि कैसे उन्हें खुद अपनी कंपनियों पर नियंत्रण हासिल करना पड़ा। रतन टाटा ने समूह की कंपनियों को एकजुट किया, उन पर टाटा संस का नियंत्रण स्थापित किया और 1991 से 2024 तक टाटा समूह छह अरब डॉलर से 100 अरब डॉलर के घराने में बदल गया। यह काम रतन टाटा ने कैसे किया? विरासत से विरासत कैसे बनती है, इसके लिए हमें टाइम मशीन में बैठना होगा। तो आइए, चलते हैं पुराने इंडिया की ओर, जहां दलदली जमीन पर भारत के सबसे बड़े और सशक्त कारोबारी घराने की नींव रखी गई थी।
यह 19वीं सदी का दूसरा दौर है। टाइम मशीन मध्य भारत के हिस्सों पर मंडरा रही है। यह भारत की कॉटन लैंड है, जो दुनिया के कारोबार को अलग तरह से प्रभावित करने वाली है। टाइम मशीन से उतरकर अब आप उस कारोबार की नब्ज समझिए, जिसने भारत का औद्योगिक भविष्य बनाया है। मुंबई की कारोबारी गलियों में गुजरते हुए पता चलेगा कि अफीम के बाद भारत से निर्यात की दूसरी अहम वस्तु थी कच्चा सूत।
चीन में कपास की फसल बार-बार विफल हो रही है और भारतीय कारोबारियों की पांचों उंगलियां घी में हैं। भारत कच्चे कपास के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार बन गया है। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को भारत का कच्चा कपास चाहिए। अफीम से अमीर हुए पारसी उद्यमी अब कपास की तरफ मुड़े हैं। बरार से कपास लाने के लिए उद्यमी पारसियों ने सड़क नेटवर्क बनाया है और अब बरार की कपास कलकत्ता तक जा रही है।
यह 1854 का साल है, जब कपास के निर्यात से अमीर बने पारसी सेठ कोवासजी नानाभाई डावर (1815-1873) ने भारत की पहली कपड़ा मिल-बाम्बे स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी शुरू कर दी है। मुंबई के बाहरी इलाकों में नई मिलें लगनी शुरू हो रही हैं।
अमेरिका में गृहयुद्ध की वजह से कच्चे कपास की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव हो रहा है। यह 1860 का अंत है, जब कपास की कीमतें धराशायी हुई हैं। कइयों की पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी स्वाहा हो गई है। इस गहराते संकट में सबसे अलग खड़े दिख रहे हैं नुसेरवानजी रतनजी टाटा और उनके पुत्र जमशेद जी।
जब कपास की कीमतें टूट रही हैं, 25 साल के युवा जमशेद जी अपनी पहली विदेश यात्रा पर ब्रिटेन में हैं। विलायत पहुंचते ही कपास का संकट आ गया। कर्जदारों का हुजूम, नाराज बैंक और भारी देनदारी। जमशेद जी ने जिस सूझ-बूझ से यह संकट निपटाया, उसकी चर्चा आप बाम्बे में सुन सकते हैं। जमशेद जी यह नसीहत लेकर लौटे हैं कि उन्हें मिल लगानी होगी। यह 1868 का साल है। जमशेद ने मुंबई के चिंचपोकली में कपड़ा मिल लगाई और अब उसे मुनाफे पर बेचकर फिर इंग्लैंड गए हैं, कपड़ा बनाने की नई तकनीक सीखने।
टाटा संस की दास्तान बाम्बे हाउस से शुरू नहीं होती है। टाइम मशीन अब नागपुर की तरफ उड़ चली है, दशक है 1870। यहां कुछ बड़ा होने वाला है, जमशेद जी ब्रिटेन से लौट आए हैं। वह मुंबई छोड़कर नागपुर में मिल लगाने जा रहे हैं। जमशेद जी ने दलदली जमीन कौड़ियों के भाव खरीद ली है। लोग कह रहे हैं कि इस दलदली जमीन पर कपड़ा मिल की नींव कैसे पड़ेगी? जमशेद को यह पता है कि नागपुर कपास उत्पादन केंद्रों के बीच है, जहां पानी भी है और कोयला भी। मगर बैंकरों के बीच चर्चा है कि जमशेद जी सोने को मिट्टी में मिला रहे हैं। खबर है कि बैंकर उनकी इस दलदली मिल को पैसा देने को तैयार नहीं हैं। अलबत्ता जमशेद जी की मिल शुरू हो गई। नाम रखा गया है-एंप्रेस मिल। बैंकरों का डर सही साबित हो रहा है। मिल लड़खड़ा रही है। मिल की बोहनी खराब रही है, मगर जमशेद जी ने मशीनें बदल दी हैं। अब मिल फायदा देने लगी है, मगर कैसे? मिल को कामयाब बनाने के लिए जमशेद जी एक रेलवे अधिकारी और एक फिरंगी विशेषज्ञ को ले आए हैं। रेलवे अधिकारी हैं बेजोन जी मेहता और अंग्रेज तकनीकी विशेषज्ञ हैं जेम्स ब्रुक्सबी। इन दोनों ने देखते-देखते एंप्रेस मिल को आधुनिक कपड़ा इकाई में बदल दिया। जमशेद ने इस मिल के साथ टाटा संस की भी नींव रख दी है, जो 21वीं सदी में रतन टाटा के विदा होने तक 100 अरब डॉलर का समूह हो जाएगा। जमशेद जी ने एंप्रेस मिल के साथ परिवार आधारित कारोबार में पेशेवरों को लाकर ऐसी परंपरा डाल दी है, जो भविष्य में टाटा समूह की सफलता का आधार बनेगी।
टाइम मशीन बाम्बे हाउस के सामने उतर रही है। यह दलदली जमीन पर बनी एंप्रेस मिल की उत्तराधिकारी टाटा संस का मुख्यालय है, जो इस विशाल समूह की मालिक या होल्डिंग कंपनी है। रतन टाटा को श्रद्धांजलि देते हुए हमें पता चलता है कि रतन टाटा अपनी टाटा संस को ऐसी अनोखी कंपनी में बदल कर गए हैं, जिसका 66 फीसदी हिस्सा रतन टाटा ट्रस्ट और दोराब टाटा ट्रस्ट के पास है, जो जनकल्याण के कार्य करते हैं। रतन टाटा विरासत और नसीहत, दोनों छोड़ गए हैं।