फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेतरतीब पनपते शहर

Mon, 19 Nov 2012 04:00 PM IST
मधुरेंद्र सिन्हा
विज्ञापन
विज्ञापन
आर्थिक विकास की पटरी पर तेजी से दौड़ते भारत के लिए आने वाला समय चुनौतियों से भरा होगा। लेकिन इसमें सबसे बड़ी चुनौती करोड़ों मकान बनाने की होगी, और उससे भी बड़ी चुनौती उन शहरों को संभाले रखने की होगी, जिनमें ये मकान बनेंगे। इस समय देश में कम लागत वाले मकानों की सबसे ज्यादा जरूरत है, लेकिन उनका निर्माण सबसे कम हो रहा है।
विज्ञापन


पिछले एक दशक से शहरों की ओर भागने की जो प्रवृत्ति आई है, उसी का नतीजा है कि 2001 से 2011 के बीच शहरों की आबादी 28.5 करोड़ से बढ़कर 37.5 करोड़ हो गई। इस दौरान देश में शहरों की कुल संख्या भी 5,161 से बढ़कर 7,935 हो गई। शहरों की ओर पलायन का एक बड़ा कारण यह है कि गांवों में आजीविका के स्रोत पैदा नहीं हो रहे और जमीन के टुकड़े-टुकड़े होते जाने से खेती भी अब लाभकारी नहीं रही। दूसरी ओर, शहरों में कल-कारखानों की संख्या में लगातार इजाफा होता गया और दूसरी तरह के रोजगार भी उपलब्ध होते गए।

भारत उन चुनींदा देशों में है, जहां सबसे तेजी से शहरीकरण हो रहा है। इस हिसाब से 2050 तक हमारे शहरों में 85 करोड़ से भी ज्यादा लोग रहेंगे, यानी अमेरिका, ब्राजील, रूस, जापान और जर्मनी की कुल आबादी से भी ज्यादा!
विज्ञापन

शहरों पर बढ़ती हुई जनसंख्या का असर साफ दिख रहा है। वहां बड़ी तादाद में झोपड़पट्टियां और मलिन बस्तियां बसती जा रही हैं, जहां सिर छिपाने के अलावा कोई सुविधा नहीं है।

बिजली तो दूर की बात, उन बस्तियों में तो पीने का स्वच्छ पानी तक मयस्सर नहीं। ऐसे में सबसे बड़ी जरूरत है, कम आय के लोगों के लिए बड़ी संख्या में मकानों की। लेकिन हालत यह है कि गरीबों और कम आय के लोगों के लिए अभी 1.9 करोड़ घरों की तत्काल जरूरत है, जबकि इसके 10 प्रतिशत का भी निर्माण नहीं हो रहा। देश में जो मकान निजी क्षेत्र में बन रहे हैं, वे समृद्ध लोगों के लिए ही हैं। चूंकि सस्ते मकान बनाकर पैसे नहीं कमाए जा सकते, इसलिए बिल्डर-डेवलपर मध्यम और उच्च आय वर्ग के लोगों के लिए मकान बनाते जा रहे हैं।

ज्यादा राजस्व के लालच में राज्य सरकारें भी उनका साथ देती जा रही हैं। बहुत कम राज्य सरकारें गरीब वर्ग के लिए मकान बनाती हैं। हरियाणा का उदाहरण सबके सामने है, जहां सरकार की नीति के तहत 15 प्रतिशत मकान आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए बनने हैं, लेकिन इस दिशा में वहां कोई प्रगति नहीं हुई। इसके विपरीत वहां समृद्ध और अति समृद्ध लोगों के लिए धड़ाधड़ मकान बन रहे हैं, जिनकी कीमत प्रति फ्लैट एक करोड़ रुपये से भी ज्यादा है। लग्जरी फ्लैटों की कीमत तो पांच करोड़ रुपये तक है! राज्य सरकारें अगर बड़े पैमाने पर सस्ते आय वर्ग के लिए मकान बनाएं, तो यह रोजगार देने का बड़ा साधन भी हो सकता है, क्योंकि आज रीयल एस्टेट उद्योग देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है।

अपने यहां जिस तरह से अब शहर बनते जा रहे हैं, उससे कई सवाल खड़े होते जा रहे हैं। एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते हम चीन का अनुसरण कर सिटी प्लानिंग नहीं कर सकते। हमें अपना मॉडल ढूंढना होगा। लेकिन सवाल है कि इसके लिए हमारे पास संसाधन क्या हैं। शहरी आबादी के लिए सबसे बड़ी समस्या आज पीने के पानी की है। कई शहरों में तो यह भयंकर रूप ले चुकी है और खासकर गरमियों में तो हाहाकार मच जाता है। पानी के बारे में राज्यों ने शायद ही कोई नीति बनाई हो। सब कुछ राम भरोसे है। यही हाल कचरा निपटान का है।

देश के शहरों में लाखों टन कचरा हर रोज निकलता है, जिसके निपटान की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। नतीजतन पर्यावरण को खतरा पैदा हो रहा है और हवा भी प्रदूषित होती जा रही है, क्योंकि लाखों टन कचरा खुले में फेंका जा रहा है। शहरों में साफ-सफाई की समुचित व्यवस्था न होने के कारण कई तरह की बीमारियां फैल रही हैं। नदियों-तालाबों का जल प्रदूषित होता जा रहा है।

देश की राजधानी दिल्ली में यमुना एक गंदे नाले में तबदील हो गई है। अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद वह जस की तस है। कुओं और बावड़ियों को ढककर उन पर मकान बना दिए गए, जिससे जलस्रोत गायब होते जा रहे हैं। बिजली का संकट तो इन शहरों में शाश्वत होता जा रहा है, और इस बात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि निकट भविष्य में इनमें बदलाव होगा। मतलब साफ है कि जो शहर बस रहे हैं, वे नाम भर के शहर हैं और वहां सुविधाओं का भारी अभाव है। वहां जीवन का स्तर निराशाजनक है और आगे कोई उम्मीद भी नहीं दिखती।

हैरानी की बात यह है कि इसी भारत में आज से चार हजार साल से भी पहले मोहनजोदड़ो नामक शहर था, जिसकी आबादी लगभग 35,000 थी, लेकिन वहां एक बेहतरीन शहर की तमाम सुविधाएं थीं। वहां इस्तेमाल किए गए पानी के प्रबंधन की भी व्यवस्था थी। वह प्राचीन शहर इतनी ज्यादा आबादी के बावजूद आज के शहरों को मात देता दिखाई देता था। सिर्फ वही नहीं, मध्यकाल में राजाओं द्वारा बनाए गए बहुत से शहर इस दृष्टि से पूरी तरह स्वावलंबी थे। बहुत बड़ी आबादियों के बावजूद उनमें तमाम सुविधाएं थीं।

जब हमारा अतीत इतना शानदार रहा है, तो वर्तमान इतना निराशाजनक क्यों है, इस पर गंभीर विचार करने की जरूरत है। बिना किसी योजना के शहरों का बसते जाना भी खतरनाक और चिंताजनक है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। अगर नियोजित तरीके से गरीबों और कम आय वर्ग के लोगों के लिए मकान बनेंगे, तो जाहिर है कि शहरों में सीवर, पानी, बिजली, सड़क जैसी तमाम सुविधाएं भी होंगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें