हाल के समय में लोगों की बढ़ती आर्थिक कठिनाइयों के बीच केंद्र और अधिकांश राज्य सरकारों के व्यवहार में जनता से निरंतर दूरी बढ़ती जा रही है। लोग महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान हैं, पर सरकारें अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए महंगाई को इस रूप में प्रस्तुत करती हैं, जैसे अर्थव्यवस्था के मौजूदा दौर में इससे बचा न जा सकता हो। तिस पर ऐसी सरकारी नीतियों और निर्णयों को आर्थिक ‘सुधार’ का नाम दिया जाता है, जिनके बारे में पूरी आशंका है कि इनसे लोगों की समस्याएं बढ़ने वाली हैं।
पिछले महीने दिल्ली में आयोजित विशाल रैली में कांग्रेस नेतृत्व ने इस पर काफी जोर दिया कि खुदरा व्यापार और अन्य क्षेत्रों में विदेशी निवेश का औचित्य सिद्ध किया जा सके। पर हकीकत यह है कि रिटेल की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से हमारी किसी समस्या का समाधान तो क्या होना, स्थिति बिगड़ने की पूरी आशंका है।
शुरुआत में ये कंपनियां चमक-दमक के बीच भले ही कुछ नए रोजगारों का सृजन करें, लेकिन उसके बाद तो इनके दुष्परिणाम ही भुगतने पड़ेंगे। रोजगार पर कुल मिलाकर असर प्रतिकूल ही होगा, क्योंकि स्थानीय उद्यम इन कंपनियों की अपेक्षा अधिक श्रम-सघन हैं। भूमंडलीकरण के दौर में हमारे बाजार में विदेशी माल की अधिक उपस्थिति की जो प्रवृत्ति बढ़ी है, उसे रिटेल में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश से और बढ़ावा मिलेगा। स्थानीय उद्योगों और किसानों को दीर्घकालीन स्तर पर क्षति होगी।
पर केंद्र सरकार ने जब रिटेल में विदेशी निवेश की अनुमति को अपना महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार मान लिया है, तो वह इससे अलग कोई बात ही नहीं सुनना चाहती। जन हितों की ऐसी ही अवहेलना कई राज्य सरकारों के स्तर पर भी देखी जा रही है। छत्तीसगढ़ और झारखंड से तो आदिवासियों को बहुत उम्मीदें थीं कि छोटा राज्य बनने पर उनके हितों का ध्यान रखा जाएगा, पर इन सरकारों ने उन्हें विस्थापित करने की प्रवृत्तियों को और तेजी से बढ़ाया। तब से उत्तराखंड की भी ऐसी ही स्थिति है कि लोग अपने को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं।
सत्ताधारियों और जनता के बीच बढ़ते अलगाव की पराकाष्ठा हाल के समय में महाराष्ट्र में देखी गई। वहां के विदर्भ क्षेत्र में किसानों का गंभीर संकट देश में ही नहीं, विश्व स्तर पर चर्चित हुआ है। इन किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधा मिल सके, तो उनके कष्टों का समाधान हो सकता है। पर सत्ताधारी और मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने मिल-जुलकर वहां की सिंचाई परियोजनाओं में हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार किया है।
बुंदेलखंड क्षेत्र की हालत भी इससे मिलती-जुलती है, क्योंकि वहां की सिंचाई परियोजनाओं में और बुंदेलखंड पैकेज के अन्य कार्यों में जमकर घोटला हुआ, जबकि पांच-छह वर्षों के सूखे व प्रतिकूल मौसम को झेलने के बाद वहां के अधिकांश गांववासियों की आर्थिक स्थिति बहुत चिंताजनक हो चुकी है।
दिल्ली में बिजली के बढ़ते बिलों से परेशान लोगों के लिए मुख्यमंत्री की टिप्पणी जले पर नमक छिड़कने जैसी है कि लोग चाहें, तो बिजली का अपना कनेक्शन कटवा सकते हैं। सत्ताधारियों को इस तरह के बयान नहीं देने चाहिए। बल्कि यदि गलती हो जाए, तो उस पर खेद प्रकट करना चाहिए। अन्यथा लोगों से उनकी दूरी और तेजी से बढ़ेगी। बिजली जैसी बुनियादी जरूरतें सब लोगों तक पहुंचे, यह सरकार की जिम्मेदारी है, और यदि अनेक परिवारों की पहुंच से बिजली बाहर हो रही है, तो सहानुभूतिपूर्ण माहौल में लोगों से बातचीत कर जरूरतमंद लोगों के लिए कोई राह निकालनी चाहिए।
लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं है कि किसी तरह बस चुनाव जीत लिए जाएं, अपितु सही अर्थ में तो लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था है, जिसमें शासक एवं शासित की दूरी समाप्त की जाती है। इस व्यवस्था में सरकारों से यह उम्मीद की जाती है कि वे निरंतर लोगों से नजदीकी संबंध व संवाद बनाए रखेंगे। पर हाल के वर्षों में सरकारों की अनेक महत्वपूर्ण नीतियां व निर्णय जन हित से हट रहे हैं। सरकारों की लोगों से दूरी बढ़ रही है। लोकतंत्र को सफल बनाना है, तो इस चिंताजनक प्रवृत्ति को नियंत्रित करना होगा।