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मिथक गढ़ने में अव्वल

Sat, 17 Jan 2015 11:05 PM IST
रामचंद्र गुहा
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वर्तमान शताब्दी के शुरुआती वर्षों में भारत के भीतर और बाहर के लोगों ने यह कहना शुरू किया कि हमारा देश ज्ञान के क्षेत्र में एक महाशक्ति के तौर पर उभर रहा है। तब ऐसा मानने की वजह शायद देश का उभरता हुआ सॉफ्टवेयर उद्योग था। लोगों की यह सोच परंपरागत विवेक की अगुआ बनी, और 2005 में न्यूयॉर्क टाइम्स के थॉमस फ्रीडमैन ने भी इसे रेखांकित करते हुए लिखा, 'जो भारत कभी सपेरों, गरीबों और मदर टेरेसा के देश के तौर पर जाना जाता था, आज वही मेधावियों और कंप्यूटर जीनियसों के देश के रूप में पहचाना जा रहा है।' भारत को लेकर दुनिया की सोच में आए इस बदलाव को भारतीय प्रेस ने हाथोंहाथ लिया, और खूब बिकने वाली तमाम पत्रिकाओं में 'ग्लोबल चैंप्स' और 'नंबर वन बनने की ओर' जैसे शीर्षक छाए रहे। यह तर्क भी दिया गया कि जहां चीन के विकास का आधार मानवीय श्रम है, वहीं भारत के विकास की चमत्कारी कहानी ज्ञान आधारित है, और इसीलिए एक ओर जहां इसका मूल्य ज्यादा है, वहीं दूसरी ओर यह ज्यादा टिकाऊ भी है।
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ये सारी बातें मुझे दुविधा में डालती हैं। मैं उस बंगलूरू का वासी हूं, जिसे उस 'ज्ञान क्रांति के केंद्र' के तौर पर प्रस्तुत किया गया, जो कथित तौर पर पूरे देश में हो रही है। मगर मुझे लगता है कि महज कोड नाम देना, और वास्तव में वैज्ञानिक ज्ञान के सृजन के क्षेत्र में कुछ मौलिक योगदान देना, दो अलग-अलग बातें हैं। जहां तक मैं जानता हूं, बंगलूरू में ढंग का कोई पुस्तकालय तक नहीं है। यही नहीं, शहर के प्रमुख विश्वविद्यालय ने पिछले तीन दशक से मौलिक अनुसंधान के क्षेत्र में कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं की है। ऐसे में समझना मुश्किल नहीं कि बंगलूरू यूनिवर्सिटी इस मामले में समग्र तौर पर देश में मौजूद तमाम दूसरे विश्वविद्यालयों का ही प्रतिनिधित्व करती है। हालांकि यहां गुणवत्ता के कुछेक केंद्र जरूर हैं। मेरे शहर में आईआईटी और नेशनल बायोलॉजिकल साइंसेज जैसे संस्थान भी हैं, जो वैज्ञानिक अनुसंधान के खासे गुणवत्तापूर्ण केंद्र हैं। पूरे देश की बात करें, तो मुंबई में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, और हैदराबाद में सेंटर फॉर मॉलिकुलर बायोलॉजी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान हैं।

इसके अलावा दिल्ली यूनिवसिर्टी और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी की फैकल्टीज में भी कुछ उत्कृष्ट समाज विज्ञानी और इतिहासकार हैं। मगर समग्र तौर पर हमारे देश की विशालता को देखते हुए कहा जा सकता है कि यहां अनुसंधान सुविधाओं का न सिर्फ अभाव है, बल्कि इसकी गुणवत्ता पर भी सवाल उठते हैं। ऐसे में, ज्ञान की महाशक्ति बनने की दिशा में भारत के आगे बढ़ने का दावा न केवल अपरिपक्व, बल्कि बेतुका भी है।
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मेरे इस संदेह को मजबूती तब मिली, जब मैंने इसी वर्ष मुंबई में आयोजित भारतीय विज्ञान कांग्रेस के सालाना अधिवेशन के बारे में एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट पढ़ी। पहली बार इसमें प्राचीन भारत में विज्ञान पर एक सत्र का भी आयोजन हुआ। एक तरह से यह स्वागतयोग्य कदम था, क्योंकि हमारे देश में विज्ञान के इतिहास पर ज्यादा शोध नहीं हुए हैं। चिकित्सा और गणित के क्षेत्र में विश्लेषण के उन अभूतपूर्व तरीकों को जानना हमारे लिए दिलचस्प हो सकता है, जो हमारे पूर्वजों ने विकसित किए थे-हालांिक बाद में उसे और विस्तार मिला, मगर यह भी सच है िक अपने समय में हमारे वे पूर्वज दुनिया के दूसरे हिस्सों की तुलना में कहीं आगे थे। मगर अफसोस की बात है कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस के उस सत्र के वक्ता अतीत के उन घटनाक्रमों के विश्लेषक नहीं, बल्कि वे थे, जिन्होंने ऐतिहासिक मिथकों से सच्चाई खींच लाने के बेतुके दावे किए। उस सत्र में शामिल एक पत्र में दावा किया गया कि संत अगस्त्य और भारद्वाज मुनि ने ऐसे विमानों का विकास किया था, जो न सिर्फ आगे, बल्कि पीछे और दाएं-बाएं भी उड़ सकते थे। एक और दिलचस्प दावा किया गया कि इन विमानों के चालकों के पास वायरस प्रूफ, वॉटर प्रूफ और शॉक प्रूफ जैकेट होती थी।

कुछ महीने पहले मुंबई में एक अत्याधुनिक अस्पताल का उद्घाटन करते वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब भगवान गणेश के अस्तित्व को प्राचीन हिंदुओं के प्लास्टिक सर्जरी के ज्ञान से जोड़ा, तो कइयों ने इसे परिहास समझा। मगर विज्ञान कांग्रेस के वक्ताओं ने निहायत गंभीरता से अपनी बात रखी। उन्होंने बताया िक प्राचीन हिंदुओं को न केवल प्लास्टिक सर्जरी का ज्ञान था, बल्कि उन्हें परमाणु विस्फोट की प्रक्रिया भी पता थी। इतना ही नहीं, उन्होंने दावा किया कि प्राचीन हिंदुओं ने मंगल ग्रह पर भी मनुष्य को भेजा था।

इसी दौरान मैंने चेन्नई की एक पत्रिका फाउंटेन इंक में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के नए अध्यक्ष वाई सुदर्शन राव का एक इंटरव्यू पढ़ा, जिसमें उन्होंने ऐतिहासिक अनुसंधान के आधुनिक तौर-तरीकों, मसलन, पुरातात्विक खनन से मिलीं पांडुलिपियां, अभिलेख और शिल्पकला के नमूने इत्यादि को पश्चिम से प्रेरित बताते हुए खारिज किया। उनकी राय में इतिहासकारों को अतीत को समझने के लिए वेदों का सहारा लेना चाहिए। प्रोफेसर राव की नियुक्ति शुरुआत से ही विवादों में रही है, तो इसकी वजह है। आज तक उनका एक भी शोध पत्र किसी प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित नहीं हुआ है।

महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि महाभारत को ऐतिहासिक स्रोत के तौर पर नहीं, बल्कि एक रूपक की तरह देखा जाना चाहिए। ज्यादातर भारतीय भी इसे इतिहास मानने के बजाय एक ऐसे विस्तृत और उत्कृष्ट महाकाव्य के तौर पर पढ़ते हैं, जो नैतिक शिक्षा से भरपूर है। मगर प्रोफेसर राव को महाभारत की घटनाओं पर तनिक भी संदेह नहीं है, और इसीलिए उन्होंने यह उम्मीद जाहिर की है कि उनके नेतृत्व में आईसीएचआर महाभारत को भारत के इतिहास का अगुआ बनाएगा, और खगोलीय व पौराणिक स्रोतों के आधार पर इसके वास्तविक समय का पता लगाएगा। तो आईसीएचआर को लेकर प्रोफेसर राव की यह योजना है। वैसे उनकी बौद्धिक रुचि तो उनकी एक शोध परियोजना के शीर्षक से ही जाहिर होती है, जिसका नाम है, 'ब्रह्मांडीय प्रघटना और भारतीय युग अवधारणा के आधार पर आध्यात्मिकता और भौतिकता के बीच दोलन के पेंडुलम सिद्धांत का ऐतिहासिक अनुसंधान में अनुप्रयोग'। जाहिर है, भारतीय गणराज्य निकट भविष्य में तो महाशक्ति बनने नहीं जा रहा। हां, हम खुद को यह सांत्वना जरूर दे सकते हैं कि मिथकों की रचना में हम जरूर दुनिया की महाशक्ति हैं।
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