भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में भी अतीत पर राज्य प्रायोजित दृष्टिकोण गहन बहस के विषय हैं। उदाहरण के लिए, मोदी सरकार ने अपने सभी मौजूदा संसाधनों के साथ हिंदू-मुस्लिम संबंधों की एक खास तस्वीर पेश करने की कोशिश की है। इस कोशिश में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के योगदान को कम करने की कोशिश भी शामिल है। फिर भी ऐसी वेबसाइट्स, प्रकाशन संस्थान, यूट्यूब चैनल और अखबार, जो बिना शासनादेश के चलते हैं और जहां लोग इन विषयों को अलग तरीके से समझते हैं, सार्वजनिक रूप से अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। ऐसी स्वतंत्र आवाजों के दमन के लिए ही मोदी सरकार एक नया ‘ब्रॉडकास्टिंग बिल’ लाने की तैयारी में है।
वर्तमान समय में किसी भी संगठन ने इस विचार कि ‘लोग कैसे सोचते हैं या क्या सोचते हैं’ पर इतनी सख्ती से नियंत्रण करने की कोशिश नहीं की है, जितनी कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) ने। अपने देश के अतीत, वर्तमान और भविष्य की प्रस्तुति में सीपीसी ने चार मुख्य प्रस्तावों की रूपरेखा के दायरे में काम किया है-
पहला, पार्टी और नेता हमेशा सही होते हैं।
दूसरा, पार्टी के कैडर, पदाधिकारी और महान नेता, चीन को उन्नति की राह पर ले जाने के साथ उसे मजबूत तथा समृद्ध बनाने के लिए हर मौसम में दिन-रात मेहनत करते हैं।
तीसरा, जो सार्वजनिक या निजी तौर पर पार्टी की नीतियों या उसकी प्रथाओं की आलोचना करते हैं, वे देश के दुश्मन हैं और विदेशी ताकतों के इशारों पर काम करते हैं।
चौथा, यदि पार्टी इस तरह की आलोचनाओं से सख्ती से नहीं निपटती है तो चीन 1949 के पहले वाले अंधकार युग में लौट जाएगा, जब इसे विभाजन, विवाद और गृह युद्ध एवं पश्चिमी शक्तियों ने पंगु बना दिया था।
अगर पार्टी के दृष्टिकोण से देखा जाए तो चीन में अधिक असहमति है। 1949 के बाद भी सरकार के खिलाफ बोलने या लिखने पर नौकरी से हाथ धोने, गिरफ्तार होने, प्रताड़ना झेलने या मारे जाने तक का खतरा बना रहता था। फिर भी जैसा कि एक हालिया पुस्तक दर्शाती है, कुछ लोग अब भी साथी नागरिकों को आधुनिक चीनी इतिहास और विशेष रूप से कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास की सच्चाई पेश करने के लिए इन जोखिमों को उठाने का साहस करते हैं।
हाल में आई किताब का नाम है- ‘स्पार्क्स : चाइनाज अंडरग्राउंड हिस्टोरियन्स एंड देयर बैटल फॉर द फ्यूचर’। किताब के लेखक हैं इयान जॉनसन, जिन्होंने सरकार द्वारा निष्कासित किए जाने से पहले कई सालों तक चीन में रिपोर्टिंग की है। अपनी किताब में जॉनसन पाठकों को चीन के परिदृश्य, शहरी और ग्रामीण सभ्यता-संस्कृति के साथ उसके समृद्ध कला-साहित्य और दर्शन के बारे में भी जानकारी देते हैं। जॉनसन 1949 से 1976 तक सत्ता में रहे माओत्से तुंग द्वारा अपने लोगों पर की जाने वाली निर्दयता के बारे में भी बेबाकी से लिखते हैं। माओ को दुश्मनों की जरूरत थी और वे उन्हें हर जगह मिल जाते थे, खेतों में, कारखानों में, शहर और देश में, यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर भी। लाखों मेहनतकश चीनी नागरिक, जिन्होंने कभी कोई अपराध नहीं किया, उन्हें भी माओ के गुंडों ने दुश्मन के रूप में नामित किया। अगर वे भाग्यशाली होते थे तो उन्हें सिर्फ अपने घरों से बेदखल किया जाता था या किसी छोटे-मोटे काम पर लगा दिया जाता था। ऐसा नहीं होने पर या तो जेल में डाल दिया जाता था या मार दिया जाता था।
माओ सनक और जानलेवा इरादों का एक अनोखा मिश्रण था। 1956 में उसने ‘सौ फूल खिलें’ कहकर लोगों से मन की बात कहने का आह्वान किया। जब लोगों ने उनकी बात मान ली तो उसने अपना आह्वान वापस ले लिया और दक्षिण पंथ विरोध अभियान शुरू कर दिया, जिसमें लेखकों, शिक्षकों, छात्रों, वकीलों, प्रबंधकों और वैज्ञानिकों जैसे दूर की सोच रखने वालों का सफाया हो गया। जॉनसन लिखते हैं, इस प्रक्रिया में विश्वविद्यालय, उच्च विद्यालय, अनुसंधान संस्थान और सरकारी कार्यालय नष्ट हो गए। लाखों की संख्या में लोगों को मजदूरों के कैंप में भेज दिया गया। वे खुद को बचाने के लिए पार्टी के आदेशों का हूबहू पालन करने की कोशिश कर रहे थे। जॉनसन के अनुसार, भूमिगत हुए लेखकों में से कई उनके बच्चे या भाई-बहन थे, जिनको राज्य द्वारा या तो जेल में डाल दिया गया था या मार दिया गया था। ऐसे लोगों की पीड़ा चीन में कम्युनिस्ट शासन के काले पक्ष के बारे में जनता को सचेत करने के लिए प्रेरित करती है। जॉनसन जिन असंतुष्टों के बारे में लिखते हैं, उनमें से कई पहले खुले विचारों वाले थे। इंटरनेट के विकास की वजह से उन लोगों को लेखन और फिल्मों को प्रचारित करने का अवसर मिला। उनका समय बौद्धिक स्वतंत्रता का समय था।
2012 में शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद इन स्वतंत्र इतिहासकारों का काम और कठिन हो गया। अपने कार्यकाल की शुरुआत में शी ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास को बेहतरीन तरीके से पेश करने की बात कही। राज्य द्वारा नियुक्त इतिहासकारों के समूह को स्वतंत्रता का जश्न मनाने का आदेश दिया गया। उन्हें इस बात का भी ध्यान रखने के लिए कहा गया कि युवा और बच्चे पार्टी और उनके नेताओं के बलिदान से अच्छी तरह वाकिफ हों। इसके अलावा सरकारी पत्रकारों से भी पार्टी के इतिहास को बिगाड़ने और बदनाम करने वाली प्रवृत्ति का विरोध करने को कहा गया। माओ के समय की तरह शी जिनपिंग के समय में भी कुछ लोगों ने विरोध में आवाज उठाना जारी रखा। जैसा कि जॉनसन लिखते हैं कि “सच्चाई यह है कि स्वतंत्र विचार चीन में रहते हैं और इसे कुचला नहीं गया है।” कुछ लेखक, पत्रकार, कलाकार और फिल्म निर्माता यह दिखाना जारी रखेंगे कि “पार्टी हमेशा नहीं जीतती।” इस पुस्तक में लोगों के बारे में पढ़ते हुए मैं उनके नैतिक और शारीरिक साहस से प्रभावित हुआ, लेकिन साथ ही उनकी बौद्धिक स्पष्टता से भी। एक महिला लेखिका जियांग जू कम्युनिस्ट चीन में इतिहास के बारे में यह कहती हैं कि ”हमें इतिहास को फिर से लिखना चाहिए। लेकिन इतिहास घटित हो चुका है। अगर यह एक उपन्यास है तो आप इसे फिर से लिख सकते हैं। लेकिन अगर यह इतिहास है तो आप इसे कैसे फिर से लिख सकते हैं? विवेक वाला कोई भी व्यक्ति फिर से लिखे गए इतिहास को अस्वीकार कर देगा।”
किताब में एक अन्य पात्र झांग शिहे नामक एक पुरुष पत्रकार कहता है, “मैं जैसा लिखता हूं, वैसा ही करता हूं, क्योंकि मैं उन लोगों में से एक हूं, जो यह सब देखकर क्रोधित हो जाता है और मुझे बोलना पड़ता है।” किताब में ही तीसरे पात्र के रूप में शिक्षाविद चेन होंगू विडंबनापूर्ण ढंग से पूछते हुए दिखते हैं, “क्या हमारे युग की यही राजनीति है, जहां पागल लोग अंधे को रास्ता दिखाते हैं?” और अंत में फिर से जियांग जू है, जो एक ऐसे मित्र को जवाब दे रही है, जिसने उससे कहा था कि उसका काम व्यर्थ और अप्रासंगिक है और कम्युनिस्ट चीन जैसे कड़े नियंत्रण वाले तानाशाही में इसका कोई प्रभाव नहीं हो सकता- “लेकिन मैं असहमत हूं। अगर आप कोशिश करते हैं तो यह मायने रखता है। मैं एक असामान्य समाज में एक सामान्य व्यक्ति बनना चाहती हूं। मैं सच्ची बातें कहने और दिल की बात व्यक्त करने में सक्षम होना चाहती हूं।”