हालांकि, हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां अतीत को ठीक से जानने, खोजने की न फुर्सत है, न पर्याप्त धन ही। यह अंग्रेजों का जमाना था। कनिंघम और जॉन मार्शल नाम के दो अंग्रेज अफसरों ने भारत में पश्चिमी तरीके से पुरातत्व की खोज शुरू की। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) का जन्म भी हुआ और विकास भी। एएसआई के महानिदेशक जॉन मार्शल और राखालदास बनर्जी का रिश्ता दो जीनियस-गुरुजी-शिष्य या बॉस-अधीनस्थ का रिश्ता है, जिसमें कभी-कभी कॉलोनियल कॉन्सपिरेसी थियरी की गंध भी महसूस की जा सकती है, बहुत लोगों ने की भी है। उस रिश्ते में बौद्धिक टकराव भी हैं, महत्वाकांक्षाओं का कॉकटेल भी है। इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज के 20 सितंबर, 1924 के अंक में मुख्य खोजकर्ता के रूप में जॉन मार्शल ने फर्स्ट पर्सन में इस सभ्यता की घोषणा दुनिया के सामने की, जबकि तब तक जॉन मार्शल ने खुद सिंधु सभ्यता के एक भी स्थल को अपनी आंखों से नहीं देखा था। मतलब वाहवाहियां एक अंग्रेज को मिल रही थीं, काम उसके अधीनस्थों ने किया था, जिसमें आरडी बनर्जी के साथ दयाराम साहनी शामिल थे। और इस बड़ी खोज के आयाम भी कई होने ही थे। एक आयाम यह भी है कि एएसआई का भारत और बर्मा (म्यांमार) में खोदाई का सालाना बजट, जो 1923-24 में बारह हजार रुपये था, इस सभ्यता की खोज की घोषणा के बाद 1924-25 में 80 हजार करने का निर्देश दिया गया था, बाद के वर्षों में खोज और खोदाई के लिए ढाई लाख रुपये का विशेष अनुदान भी दिया गया।
इतिहासकार नयन जोत लाहिड़ी अपनी किताब फाइंडिंग फॉरगॉटन सिटीज के आखिरी अध्याय में लिखती हैं कि भारतीय पुरातत्व अब रोमांच भरे नए चरण में पहुंच गया था, जिसमें बड़े अभियान और भरपूर बजट प्रमुख थे। क्या बनर्जी की खोज का आजादी के आंदोलन से कोई रिश्ता बना था? मोहनजोदड़ो पर 1926 के लरकाना गजट में कहा गया, ‘इस खोज का सौंदर्य प्राचीन भारत का गौरव गान करता है और इस ऐतिहासिक वक्तव्य के सत्य को प्रमाणित करता है कि प्राचीनकाल में भारत एक महान और शक्तिशाली देश था। भारत की प्राचीनकालीन महानता के इस प्रमाण की रोशनी में ब्रिटेन को उसे अपने से बेहतर नहीं, तो कम से कम बराबर समझते हुए सम्मान से व्यवहार करना चाहिए और उसे तुरंत आजाद कर देना चाहिए।’ वर्ष 1922-23 में वह इतना बड़ा काम कर रहे थे और 1924 में उनका स्थानांतरण एएसआई के ईस्टर्न सर्कल में कर दिया गया। यही वह तथ्य है, जो कॉन्सपिरेसी थियरी को जमीन देता है। प्रचंड प्रतिभा के धनी पुरातत्वविज्ञानी को भ्रष्टाचार के इल्जाम में यह सजा दी गई। उन्हें उनके प्रिय काम से अलग कर दिया गया। कितनी कुंठा, कितना अवसाद झेला होगा कि चालीस की उम्र होने से पहले ही उन्होंने एएसआई से सेवानिवत्ति का फैसला किया और बीमार होकर 45 का होते-होते दुनिया से चले गए। उससे पहले उन्होंने इतिहास की दर्जनों किताबें, ऐतिहासिक उपन्यास ही नहीं लिखे, प्राचीन लिपियों को पढ़ने में भी बड़ी लकीर खींच गए।
कलकत्ता के अमृत बाजार पत्रिका और स्टेट्समैन ने पत्रकारिता की कमाल मिसाल कायम की है। बानगी स्वरूप, एक संपादकीय में बनर्जी को बाद की खोदाई से दूर किए जाने की तीखी आलोचना की गई, वहीं जॉन मार्शल को अनभिज्ञ, तुच्छ बुद्धि वाला और प्रचार का भूखा बताया और काम पर अधिक ध्यान देने की फटकारनुमा सलाह भी दी गई। वेस्टर्न सर्कल में रहते हुए बनर्जी पर धन के दुरुपयोग, खोदाई अनुदान का कार्यालय के फर्नीचर खरीदने के लिए उपयोग करने और अत्यधिक यात्रा व्यय करने के आरोप लगे थे। इससे उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई। अक्तूबर 1925 में बनर्जी ने मध्य प्रदेश में एक प्रतिष्ठित हिंदू तीर्थ का दौरा किया, जहां चौंसठ योगिनी की पत्थर की एक मूर्ति गायब हो गई। उन पर चोरी का आरोप लगाया गया, उन्होंने इसमें शामिल होने से इन्कार किया और जांच शुरू की गई। मूर्ति कलकत्ता में बरामद हुई, तो उनके खिलाफ मामला खारिज कर दिया गया, लेकिन इस विवाद के कारण 1927 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बाद में उन्हें निर्दोष पाया गया। एएसआई छोड़ने के बाद, बनर्जी एक प्रोफेसर के रूप में काम करने लगे, लेकिन भव्य जीवनशैली के कारण उन्हें वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इतिहासकार ताप्ती गुहा ठाकुरता ने एक जगह उल्लेख किया है कि बनर्जी ने अच्छे भोजन, घोड़े की गाड़ियों और दोस्तों पर खुले हाथ से खर्च किया।
1928 में वह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनाए गए, पर 45 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। राखालदास बनर्जी एक प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद, इतिहासकार और विद्वान थे। बनर्जी ने अपने अल्प जीवन में विभिन्न लिपियों में प्राचीन और मध्यकालीन 80 अभिलेखों का संपादन किया तथा ऑस्ट्रेलियाई और अफगान मूल के सिक्कों को पढ़ा। उन्होंने भारतीय इतिहास और पुरातत्व पर कई शोधपत्र और पुस्तकें प्रकाशित कीं, जिनमें द ओरिजिन ऑफ द बंगाली स्क्रिप्ट और हिस्ट्री ऑफ इंडिया आदि शामिल हैं। उन्होंने 1910 में कलकत्ता के इंडियन म्यूजियम में सहायक के रूप में काम शुरू किया। 1911 में वह एएसआई में सहायक अधीक्षक बने। 1917 में उन्हें पश्चिमी सर्कल के अधीक्षण पुरातत्वविद के रूप में पदोन्नत किया गया। उन्होंने पहाड़पुर और अन्य ऐतिहासिक स्थलों पर खोदाई की। स्वतंत्र प्रकृति के कारण ब्रिटिश अधीक्षकों के साथ उनके संबंध जटिल रहे थे। कांग्रेस की स्थापना वाले साल में जन्मे बालक की मनःस्थिति अंग्रेजों के लिए अलग तो रही ही होगी। आज भी, बनर्जी इतिहास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण व्यक्ति बने हुए हैं, पर उनके योगदान को ब्रिटिश समकक्षों की तुलना में कम आंका गया है। फिर भी मोहनजोदड़ो की खोज आने वाली पीढ़ियों और पुरातत्वविदों को प्रेरित करेगी, जिससे उनकी विरासत बनी हुई है।