मई 1975 में दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से स्नातक का पहला साल पूरा करने के बाद मैं छुट्टियां बिताने अपने घर देहरादून आ गया। छुट्टियों के दौरान ही आपातकाल की घोषणा हुई। जुलाई के तीसरे सप्ताह में जब मैं विश्वविद्यालय परिसर में लौटा तो इस बारे में सोच रहा था कि इंदिरा गांधी द्वारा अपने विरोधियों को जेल में डालने का मेरे देश के वर्तमान या भविष्य से क्या संबंध था। ऐसा इसलिए, क्योंकि मैं 17 साल का था और कॉलेज की क्रिकेट टीम में अपनी जगह पक्की करने को लेकर बहुत चिंतित था। सेंट स्टीफंस में मेरे दोस्त भी पूरी तरह से गैर-राजनीतिक थे।
राजनीति के प्रति इस तरह की उदासीनता को कॉलेज प्रशासन द्वारा सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया गया था। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) के पदों के लिए चुनाव जोर-शोर से लड़े जाते थे, लेकिन स्टीफन्स कॉलेज के छात्रों को मतदान करने की अनुमति नहीं थी। दूसरी ओर, परिसर के अन्य कॉलेजों जैसे हिंदू, हंसराज, रामजस और किरोड़ीमल के छात्र डूसू चुनावों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। राजनीति में इससे भी कहीं अधिक सक्रिय थे जवाहरलाल नेहरू के नाम बने विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र।
स्टीफंस कॉलेज के छात्र अपनी संस्था का संबंध महात्मा गांधी से जोड़ते थे, क्योंकि उनके करीबी दोस्त सीएफ एंड्रयूज वहां पढ़ाया करते थे। हालांकि इस कॉलेज से लाला हरदयाल और बृजकृष्ण चांदीवाला जैसे कई स्वतंत्रता सेनानी निकले, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन में इसका योगदान मुंबई, पुणे, कोलकाता, चेन्नई, वाराणसी, प्रयागराज (तब इलाहाबाद), पटना और अन्य स्थानों के कॉलेजों की तुलना में बहुत कम है। राजनीति के प्रति इस तरह का असम्मान आजादी के बाद भी बना रहा, तब स्टीफन्स कॉलेज के होनहार छात्रों ने नौकरशाही या राजनयिक दल में शामिल होना बेहतर समझा। 1960 के दशक में कुछ स्टीफेनियन्स का झुकाव मार्क्सवाद की तरफ हुआ। उनके समकालीन या तो सरकारी नौकरी करने लगे या पत्रकार, शिक्षाविद और कॉरपोरेट अधिकारी बन गए।
जिस सेंट स्टीफन्स को मैं जानता था, उसमें कई विशेषताएं तो थीं, लेकिन राजनीतिक सक्रियता उनमें से एक नहीं थी। जुलाई 1975 में गर्मी की छुट्टियों के बाद जब मैं कॉलेज लौटा तो पाया कि वह बिल्कुल भी नहीं बदला था। विपक्षी नेताओं की हिरासत और प्रेस पर सेंसरशिप का हम पर कोई असर नहीं पड़ा। हम पहले की तरह ही बातें करते रहे, हंसते-खेलते रहे। 1975 के उत्तरार्ध में मेरा ध्यान अपनी स्टॉक डिलीवरी, ऑफ-ब्रेक के साथ चलने वाली लेग-कटर विकसित करने पर था, जबकि अन्य स्टीफेनियन्स अपनी पसंद के क्षेत्र में मग्न थे, चाहे शेक्सपियर को पढ़ना हो, पूल खेलना हो या शास्त्रीय संगीत सुनना।
जैसे-जैसे आपातकाल लंबा खिंचता गया, उसके काले पक्ष की कुछ कहानियां हमारे सामने आती गईं। हमने प्रधानमंत्री के बेटे संजय गांधी के बढ़ते रुतबे, पीएस भिंडर नामक एक वरिष्ठ पुलिसकर्मी पर उनके बढ़ते भरोसे के बारे में सुना। एक बहुत ही प्रिय शिक्षक विजयन (उन्नी) नायर को संजय गांधी ने अपने साथ जुड़ने के लिए बुलाया। वे दोनों दून स्कूल में एक साथ पढ़ते थे। संजय ने एक दोस्त के माध्यम से उन्नी को खबर भिजवाया कि वह अंडरग्रेजुएट को पढ़ाना बंद करें और उनके साथ मिलकर देश चलाएं। उन्नी नायर ने बड़ी ही उदारता के साथ जवाब दिया, वह जहां भी हैं, खुश हैं।
उसके बाद हम विश्वविद्यालय के कॉफी हाउस में हर दिन एक भूरी दाढ़ी और रंगीन चश्मा लगाए व्यक्ति को अकेले बैठा देखा करते थे। हमें लगता था कि वह आईबी का एजेंट है और कॉलेज में शांति और सद्भाव की जांच के लिए तैनात किया गया है।
इस घटना ने मेरे अंदर के राजनीतिज्ञ को थोड़ा झकझोरा। अप्रैल 1976 के दूसरे सप्ताह में देर रात ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित कुछ टिप्पणियों ने भी ऐसा ही किया। हममें से कुछ लोग वेस्टइंडीज के खिलाफ पोर्ट ऑफ स्पेन में खेले जा टेस्ट मैच के आखिरी दिन की कमेंट्री सुनने के लिए रेडियो को घेर कर खड़े थे। भारतीय टीम 400 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रही थी और उसने उसे हासिल भी कर लिया, जिसमें लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर और गुंडप्पा विश्वनाथ के शतक शामिल थे। जैसे ही विजयी रन लिया गया, रेडियो कॉमेंटेटर जोर से चिल्लाया, “यह इंदिरा गांधी का देश है! यह बीस सूत्री कार्यक्रम का देश है।” उस समय भी मुझे यह बहुत अपमानजनक लगा था, क्योंकि जो श्रेय हमारे क्रिकेटरों को मिलना चाहिए था, वह एक तानाशाह राजनेता को दिया जा रहा था।
1977 के वसंत में आपातकाल हटा दिया गया और चुनावों की घोषणा कर दी गई। इंदिरा गांधी और उनके कांग्रेस का विरोध करने वाली चार पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया। सेंट स्टीफन्स के सामने मौरिस चौक पर एक रैली हुई, जिसमें हजारों अन्य छात्रों के साथ मैंने भी भाग लिया। हमने हरे रंग का साफा बांधे समाजवादी राज नारायण के भाषण सुने, जिसमें उन्होंने नेहरू परिवार के खिलाफ जमकर हमला बोला। वाशिंगटन और मॉस्को में देश की राजदूत रहीं जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित भी अपनी भतीजी की निरंकुशता को समाप्त करने की मांग को लेकर इस रैली में शामिल हुईं।
मौरिस चौक पर हुई उस रैली ने क्रिकेट और सेंट स्टीफन्स से बाहर की दुनिया में मेरी दिलचस्पी को और बढ़ा दिया। कुछ सप्ताह बाद जब चुनाव संपन्न हो गए और वोटों की गिनती शुरू हो गई, तब मैं अपने दोस्तों के साथ बहादुर शाह जफर मार्ग गया, जहां उस समय हिंदी और अंग्रेजी दोनों में प्रकाशित होने वाले कई प्रमुख अखबारों के मुख्य कार्यालय थे। इंटरनेट दशकों बाद आने वाला था और नवीनतम या विश्वसनीय जानकारी के लिए ऑल इंडिया रेडियो या दूरदर्शन पर निर्भर नहीं रहा जा सकता था। हम समाचार पत्रों के कार्यालयों के बाहर लगे उस बड़े ब्लैक बोर्ड के सामने बैठे थे, जिस पर परिणाम आते ही फ्लैश हो जाता था। जब हमने यह देखा कि संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए तो जोरदार नारे लगे और जब बोर्ड पर इंदिरा गांधी के हारने की भी खबर फ्लैश हुई तो और भी जोर से नारे लगाए लगे।
तानाशाही और परिवारवाद की राजनीति भी खत्म हो चुकी थी। 50 सालों के बाद तानाशाही और परिवारवाद की राजनीति एक बार फिर से हमें डराने लगी है। बस अंतर सिर्फ इतना है कि अब यह दूसरे दलों द्वारा किया जा रहा है।