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जेलों में सुधार कब होगा, बता रहे हैं राजेश प्रताप सिंह

राजेश प्रताप सिंह
Updated Tue, 18 Aug 2020 04:39 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media

‘जेल’ शब्द सुनते ही मन में एक ऐसी जगह की छवि उभरती है, जहां तमाम दुर्दांत अपराधी बंद हों और जिन्हें बाहर रखने का मतलब है समाज को छिन्न-भिन्न होने का खतरा। सामाजिक मान्यताओं के विपरीत कार्य करने वालों को सजा देने का प्रावधान बहुत पहले से समाज में है। अपराधियों को जेल में रखने का प्रमुख उद्देश्य यह होता है कि ऐसे लोग, जो समाज के बनाए हुए नियमों को नहीं मानते, उन्हें खुला छोड़ने पर समाज में अराजकता फैल जाएगी।



साथ ही इसका उद्देश्य समाज के अन्य लोगों को यह संदेश देना भी था कि नियमों का पालन न करने पर सजा भी मिल सकती है। कालांतर में सुधारात्मक पहलू भी जुड़ गया। इस विचार के अनुसार, जो लोग जेल में हैं, वे समाज के ही अंग हैं। अतः आवश्यक है कि हम उन्हें जेल में इस तरह रखें और प्रशिक्षण दें कि जब वे बाहर आएं, तो समाज में सकारात्मक योगदान दें। साथ ही अपना जीवन-यापन भी सही ढंग से कर सकें।


वर्तमान में मानवाधिकार आयोग एवं संयुक्त राष्ट्र की कई अनुशंसाओं के परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे जेलों को सुधार गृह के रूप में देखा जाता है, पर जनमानस में अब भी इसे प्रताड़ना गृह या दुर्दांत अपराधियों की आरामगाह के रूप में ही देखा जाता है। इस तरह की धारणा के पीछे कई कारण हैं।


मसलन, आर्थिक रूप से सक्षम और राजनीतिक व प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त अपराधियों को जेल में येन-केन-प्रकारेण सारी सुविधाएं मिल जाती हैं, जबकि अन्य लोगों को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं। कुछ जेलकर्मी भी ऐसे लोगों को सुविधाएं प्रदान करने में मिले रहते हैं।


इसके अलावा, जेलकर्मियों व अधिकारियों की सुरक्षा व्यवस्था का अभाव होता है, जिसके चलते न चाहते हुए भी उन्हें कई बातों की अनदेखी करनी पड़ती है। उत्तर प्रदेश में कई सहायक जेलर, जेलर एवं जेल अधीक्षकों की हत्या हो चुकी है। इन मामलों में शक की सुई जेल में बंद माफियाओं-अपराधियों पर गई, लेकिन कुछ नहीं हुआ।


लालच और भय, इन दो प्रमुख वजहों से जेलकर्मी दुर्दांत अपराधियों को अतिरिक्त सुविधाएं प्रदान करते हैं। हालांकि मोबाइल सर्विलांस के जरिये इस सांठ-गांठ का पता लगाया जा सकता है, लेकिन जेलों का विस्तृत फैलाव होने का कारण इसमें सफलता नहीं मिलती है।


फिर तकनीक भी इतनी तेजी से बदलती है कि उसके साथ चलना मुश्किल होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सर्विलांस के जरिये सांठ-गांठ का पता लगाना इतना आसान नहीं है। जबसे बड़े प्रशासनिक अधिकारी और व्यापारी जेल जाने लगे, तबसे यह समस्या और बढ़ गई है।
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जेलों में भारी तादाद में कैदियों का होना ही उसे प्रताड़ना गृह में बदल देता है। फिलहाल उत्तर प्रदेश की जेलों में एक लाख के करीब कैदी हैं। जेलों  में सिर्फ सजा प्राप्त कैदी नहीं होते, बल्कि विचाराधीन कैदी भी होते हैं। उत्तर प्रदेश जेल की वेबसाइट के मुताबिक, प्रदेश में कुल 72 जेल हैं, जिनमें 60,580 कैदियों को रखने की क्षमता है। सजा प्राप्त कैदी 25,236 हैं, जबकि विचाराधीन कैदी की संख्या 69,9943 है यानी कुल 95,179 कैदी प्रदेश की जेलों में बंद हैं।


जेलों में तोड़-फोड़ या हड़ताल आदि की कानून-व्यवस्था संबंधी समस्याएं होती रहती हैं। जेलें प्रायः आबादी से दूर बनी होती हैं, ऐसे में पुलिस-प्रशासन को पहुंचने में देर हो जाती है। जेलों में पर्याप्त संख्या में सशस्त्र सुरक्षा बल नहीं होते हैं। जेलों में दंगा नियंत्रक उपकरण होने चाहिए और जेलकर्मियों को इसका प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि पुलिस के आने तक वे स्थिति को नियंत्रण में रख सकें। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में इस दिशा में सार्थक प्रयास किए गए हैं।


जेल में सिपाहियों (बंदी रक्षक) की भी प्रायः कमी होती है और उन्हीं पर सुधार, कैदियों के प्रशिक्षण, अनुशासन आदि की जिम्मेदारी होती है। उत्तर प्रदेश संभवतः देश के उन गिने-चुने राज्यों में है, जिसका मैन्यूअल अब तक पुराना ही है। तमाम कमेटियों के सुझावों के बावजूद अब तक उसे संशोधित नहीं किया गया है।


जेल में क्षमता से अधिक कैदी होने के कारण कैदियों की न्यायालय में पेशी, सुबह-शाम उपस्थिति, ढंग से तलाशी, अवैध वस्तुओं के जेल में प्रवेश न होने देने, आदि काम में मुश्किलें स्वाभाविक हैं। ऐसे में या तो कैदी भाग जाते हैं या मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं होती हैं।


जेलों में कैदियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि छूटने के बाद वे इस हुनर के बल पर मेहनत करके जीवन-यापन करें। पहले जेलों में काम करने के बदले उन्हें जो कुछ मिलता था, वह उन्हीं पर खर्च किया जाता था। वर्ष 1998 में गुजरात उच्च न्यायालय ने यह फैसला दिया कि जेलों में काम करने के बदले कैदियों को समानुपातिक मूल्य दिया जाए। तबसे हर जगह कैदियों को काम के बदले एक सुसंगत धनराशि दी जाती है।


उनके खाने, दवा, कपड़े आदि का खर्च सरकार उठाती है। लेकिन जेल में दिए गए व्यावसायिक प्रशिक्षण का बाहर की दुनिया में सदुपयोग नहीं हो पाता, क्योंकि कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों के पास अपना रोजगार शुरू करने के लिए आवश्यक पूंजी नहीं होती और बड़े अपराधी फिर से अपराध की दुनिया में लौट जाते हैं। जरूरी है कि इस काम को सिर्फ गैर-सरकारी संस्थाओं के जिम्मे न छोड़ा जाए।


उत्तर प्रदेश संभवतः देश का पहला राज्य था, जहां दिवंगत संपूर्णानंद जी ने सबसे पहले खुली जेल का अभिनव प्रयोग किया था। खुली जेल की व्यवस्था इस उद्देश्य से की गई थी कि कैदियों को अपने परिवार के साथ रहने का अवसर मिले, जिससे वे भटक न सकें। संपूर्णानंद जी जब राजस्थान के राज्यपाल हुए, तो वहां भी उन्होंने खुली जेल की व्यवस्था प्रारंभ की। आज राजस्थान इसमें अग्रणी है।


सुना है कि उत्तर प्रदेश के अधिकारी राजस्थान जाकर वहां की व्यवस्था का अध्ययन करने वाले हैं। जेलों में कार्मिकों की कमी सभी प्रोग्राम, अनुशासन, एवं प्रशिक्षण आदि को प्रभावित कर देती है। पर्याप्त कार्मिक न होने के कारण जेलों में केवल दैनंदिन के ही काम हो पाते हैं। अतः इस पर बिना ध्यान दिए हम जेलों में कोई सुधार नहीं ला सकते।

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