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कई स्तरों पर है गांवों से पलायन

सुधीर विद्यार्थी
Updated Tue, 18 Aug 2020 04:32 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई

शहरीकरण की शुरुआत होते ही गांवों से पलायन हमारी गंवई दुनिया में निरंतर विषबेल की तरह विस्तारित होता चला गया। तीन-चार दशक पहले तक मझोले और छोटे किसानों के पास जो खेतिहर जमीन थी, उसका रकबा दूसरी और तीसरी पीढ़ी तक आते-आते तेजी से छीजने लगा।



बीती सदी के सत्तर के दशक में गांव अपने आकार-प्रकार में सही सलामत और आत्मनिर्भर इकाई थे। कस्बों या शहरों की तरफ उनका रूझान इतना था कि वे धान और गेहूं जैसी अपनी कुछ ही तैयार फसलों को वहां की आढ़तों पर बिक्री के लिए ले जाते थे।


शेष के लिए निकट के देहात में जुड़ने वाली साप्ताहिक हाट सबसे मुफीद जगह थी। उन दिनों बाजार स्वयं चलकर गांव आता था। तब रोजमर्रा के इस्तेमाल की अधिकांश चीजें गांव में पैदा की जाती थीं। शहर अपनी खाद्य संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गांव में फसलों के कटने का बेसब्री से इंतजार करते थे।


पर धीरे-धीरे खेती के तौर-तरीके बदले और मशीनों का प्रयोग बढ़ा। इससे खेती के काम में मनुष्य की सहभागिता घटती गई। खेती की जमीन कम होने के साथ कृषि कार्य में मनुष्य-श्रम की आवश्यकता का घटते चले जाना गांवों से पलायन का प्रमुख कारण बना।


फैक्टरियां और उद्योग-धंधे शहरों में लगने से किसानों की बेरोजगार युवा पीढ़ी ने काम की तलाश में उस ओर जाना शुरू कर दिया। यदि ऐसे कल-कारखाने गांवों में स्थापित किए जाते, तो इससे गांव से होते पलायन को रोकने में सहूलियत होती। शहरों ने ग्रामीण युवाओं को खूब आकर्षित किया।


सिनेमा और बाजार के साथ आधुनिक जीवन शैली ने भी नई पीढ़ी को अपनी ओर खूब खींचा। संयुक्त परिवार टूटने पर घर के सदस्यों के बीच सौहार्द कम हुआ। छोटे किसानों के पास जो थोड़ी-बहुत जमीन बची, वह गुजर-बसर करने लायक अनाज देने में असमर्थ हो गई। ऐसे में उन्हें शहरों की तरफ मजदूरी के लिए भागना पड़ा।


ग्रामीण इलाकों से होने वाला पलायन पहले धीमी गति से और सामयिक हुआ। इसके बाद वे लंबे समय के लिए दूर के शहरों में दमघोंटू कोठरियां किराये पर लेकर रहने लग गए। पर शहर से उनका रिश्ता आत्मिक नहीं हो पाया। कभी-कभार होली-दिवाली पर मेहमानों और अजनबियों की तरह वे गांव आते।
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वे न गांव के रहते, न शहर के हो पाते। जो सदस्य गांव में रह गए, वे भी नहीं चाहते कि शहर में रहने के बाद उनके ‘अपने लोग’ पुरानी देहरी पर लौटें। गांवों से होने वाले एक और ‘दैनिक पलायन’ की प्रायः हम अनदेखी कर देते हैं। सुबह-सवेरे न जाने कितने किसान-पुत्र झोले में चार रोटियां और थोड़ी सब्जी बांधकर निजी बसों में आधा-अधूरा किराया देकर छतों पर बैठकर प्रतिदिन शहर के खास चौराहों पर अपना श्रम बेचने के लिए आ खड़े होते हैं।


इंडिया शाइनिंग, ग्रोथ, विकास, तरक्की, अच्छे दिन जैसे खोखले नारों ने बेरोजगार ग्रामीणों को भरमाया तो बहुत, पर उन्हें जीवन जीने लायक ठिकाना नहीं दिया। देहाती मजदूरों ने शहरों को उनका चेहरा सौंपा, उन्हें रोशनी और रंगत दी, पर लॉकडाउन के चलते काम न होने की स्थिति में जब वे अपने सिरों पर पोटलियों और छोटे दुधमुंहे बच्चों को कंधों पर लादे विस्थापित होकर थके-मांदे लौट रहे थे, तब उन्हें किसी ने रोका नहीं। गांवों से एक और ‘सामूहिक पलायन’ कुछ भिन्न ढंग का था।


सड़क या राजमार्गों के किनारे अथवा विस्तारित होते शहरों की चपेट में आने वाले लाखों गांवों को पूंजी ने बेदखल कर दिया। गांव अब प्रेमचंद और रेणु के जमाने का नहीं रहा। वह कथाकार पूरन हार्डी की ‘बुड़ान’ का मर-डूब चुका गांव है, जिसकी आवाज भी हुक्मरान नहीं सुनते। 


पुरानी ग्राम-कथाओं और उपन्यासों के जरिये मौजूदा गांव की बनावट और उसके नितांत जटिल होते चरित्र को नहीं समझा जा सकता। शहर के आलीशान फ्लैटों में रहकर गांव के वर्तमान को चीन्हना और उसकी समस्याओं से रूबरू होना नितांत कठिन है।


संसदीय राजनीति ने भी विगत वर्षों में गांव के चेहरे को बहुत विकृत किया है। ‘अहा, ग्राम्य जीवन भी क्या  है’ की कविता पंक्ति को अब उलट कर देखना होगा। एक समय गांव में जातिगत विभाजन तो था, पर सांप्रदायिकता के  निशान नहीं थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। विकास की ईमानदार दीर्घकालिक ग्रामीणोन्मुखी कोशिशें ही देहाती जीवन को पलायन के अभिशाप से मुक्त कर सकती हैं।

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