उन्हें देश का सबसे प्रयोगधर्मी और बेहतरीन आर्किटेक्ट माना जाता है, जो लगातार नवाचार के लिए प्रयास करते हैं। उदाहरण के लिए, एशियाड विलेज को ले लीजिए, जो आज भी एक बिल्कुल नए, आधुनिक आवास परिसर की तरह दिखता है। इसमें 1982 के एशियाई खेलों में भाग लेने वाले एथलीट और अन्य लोग ठहरे थे। रेवाल ने इसे दिल्ली की गर्म जलवायु को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया था, जिसमें भूनिर्माण पर बहुत ध्यान दिया गया। उनका काम भारतीय शहरों के चरित्र को दर्शाता है। उन्होंने वास्तुकला की दुनिया में अपनी उपस्थिति हॉल ऑफ नेशंस के डिजाइन से दर्ज कराई थी। तब वह 40 वर्ष के भी नहीं थे। निस्संदेह, वह स्वतंत्र भारत की पहली पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ वास्तुकारों में से एक हैं, जिन्होंने पहली बार हॉल ऑफ नेशंस और प्रगति मैदान में नेहरू केंद्र की अपनी डिजाइनों से कला जगत का ध्यान आकृष्ट किया। दुख की बात है कि प्रगति मैदान के पुनर्विकास के दौरान दोनों को ध्वस्त कर दिया गया। इनके डिजाइन न्यूयॉर्क व पेरिस के कला संग्रहालयों में प्रदर्शित किए गए थे। इन्हें ध्वस्त किए जाने पर रेवाल निराश हुए थे।
हॉल ऑफ नेशंस निस्संदेह आधुनिक वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति थी, विशाल और राजसी। जाने-माने वास्तुकार बख्शीश सिंह और स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में उनके छात्र कहते हैं, ‘राज रेवाल ने दिल्ली में अपनी डिजाइन की इमारतों से अपनी स्थायी छाप छोड़ी है। उनका योगदान ईंटों और सीमेंट से परे है। उन्होंने ऐसी इमारतों का निर्माण किया है, जो शहर की आत्मा का हिस्सा बन चुकी हैं।’ वह एक शानदार शिक्षक भी थे। राज रेवाल की इमारतों में सूरज का प्रकाश आता है। वह अक्सर स्थानीय स्तर पर प्राप्त सामग्री का उपयोग करते हैं, पारंपरिक निर्माण तकनीकों को समकालीन संवेदनाओं के साथ मिलाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप ऐसी इमारतें बनती हैं, जो सौंदर्यपूर्ण रूप से मनभावन और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ, दोनों हैं। -विवेक शुक्ला