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बात राजकपूर और नरगिस की थी और हम सब सन्न थे

Sat, 04 May 2013 09:24 PM IST
कैलाश वाजपेयी
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एक अजीब किस्म की कश्मकश में पड़े हम बांद्रा स्थित अपने आवास में लौट आए। देर तक द्वंद्व चलता रहा। जिंदगी हमें कहां ले जा रही है?
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हर व्यक्ति सोचता है कि वह कोई भी काम कर सकता है, अगर चाहे तो! कर वह नहीं रहा, क्योंकि चाहता नहीं। नहीं चाहना भी तो एक चाह ही है। नहीं चाही गई चाह के विषय में नागार्जुन सहित कई बौद्ध दार्शनिकों, जिनमें असंग पठान भी शामिल हैं, ने खासी माथामारी की है।

एक अनर्गल किस्म के अंतर्द्वंद्व में रात बीत गई। सुबह-सुबह पेट में मरोड़ उठी फिर शुरू हुआ उबकाई का दौर। हमने श्रेयांस प्रसाद जी को फोन किया। वे बॉम्बे हॉस्पिटल के ट्रस्टी थे।
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उन्होंने कहा, `घबराओ नहीं जल्द ही एक गाड़ी तुम्हें बॉम्बे हॉस्पिटल पहुंचा देगी। लगभग डेढ़ घंटे बाद हमने स्वयं को अस्पताल में पाया। हमें निसर्ग दत्त (बीड़ी बाबा) द्वारा बोला गया `अस्पताल' शब्द याद आया। चौथे माले पर जहां लिफ्ट का दरवाजा खुलता है, पहला नहीं, दूसरा कमरा खाली था। हमें वहीं ले आया गया। कमरों की कतार के आगे बने बरामदे में बैंचें पड़ी थीं, जहां रोगियों के परिचारक या कि संबंधी बैठे थे। नर्स ने आकर हमारी नब्ज देखी, कुछ पिलाया भी।

हमारे बिस्तर का कोण कुछ ऐसा था कि बाहर बरामदे से गुजरते लोग हमें और हम बाहर आते-जाते लोगों को देख सकते थे। तभी हमारे आगे के किसी कमरे में जाते एक आकर्षक देहयष्टि वाले सज्जन ने हमारी तरफ निगाह घुमाई और बेहद आश्चर्य में डूबे भीतर ही आ गए। ये पृथ्वीराज कपूर थे, जिनका स्वागत हम शोधार्थियों ने लखनऊ विश्वविद्यालय के परिसर में, बीते साल किया था।

`अरे कैलाश जी आप?' उन्हें हमारी याद थी। पृथ्वीराज जी इतने शालीन थे कि आकर सीधे हमारे पैताने बैठ गए। वे प्रश्न पर प्रश्न किए जा रहे थे। हमने उन्हें संक्षेप में सारा ब्यौरा दिया, फिर दबे स्वर में उनके बेटे राजकपूर द्वारा दिए गए ऑफर (प्रस्ताव) का जिक्र किया। राजकपूर का नाम सुनते ही उनकी भौंहें तन गईं।

उन्होंने कहा, `अभी तो मैं अपने पिताश्री विश्वेसरनाथ कपूर (राजकपूर के बाबा) जो अगले कमरे में बीमार लेटे हैं, को देखने जा रहा हूं। पहले उनके दर्शन कर आऊं फिर आता हूं।' काफी देर बाद पृथ्वीराज जी लौटे। राजकपूर के प्रस्ताव वाली बात हम पहले ही कह चुके थे। हमारे पास आते ही बोले, 'कैलाश जी, राजकपूर के कारनामों की आपको कोई खबर नहीं। उसने क्या नहीं किया। मेरे पिता जी उससे इतने नाराज हैं कि वे उसकी शक्ल तक नहीं देखना चाहते। यहां तक कि उसका यहां आना तक मना है।' पारिवारिक पचड़ों से हम पूरी तरह अनवगत थे।

झिझकते हुए पूछा, `ऐसा भी क्या किया है आपके बेटे ने?' पृथ्वीराज जी बोले, `आवारा' फिल्म तो आपने देखी होगी, जिसमें मुझे और पिताश्री को भी अब्बास साहब की कहानी के अनुरूप काम करना पड़ा था। `आवारा' फिल्म करते हुए वह नरगिस पर आसक्त हो गया। इतना भी नहीं सोचा कि उसे कृष्णा जैसी शरीफ बीबी मिली है।' दबी जबान से पृथ्वीराज जी ने उसकी प्रेम गाथा का भी जिक्र किया।
 
यह भी बताया कि, `वह अक्सर घर न आता। घर में कृष्णा सिसकती रहती। नरगिस मुझे भी पापा कहकर ही बुलाती थी।

एक दिन आकर उसने अपने पर आई 'विपत्ति' के बारे में बताया। हम पेशावरी लोग बड़े स्वाभिमानी होते हैं, घर की इज्जत आबरू की रक्षा के लिए मुझे नरगिस को सहारा देना पड़ा। इसके बाद मैंने राज को कहा कि ऐसी बेहूदगी से बाज आए।

जवाब में वह घर छोड़ने की बात बोल उठा। मैंने उससे विनती भी की, मगर वह नरगिस के प्यार में पागल हो चुका था। कैलाश जी हम क्या बताएं! एक दिन नरगिस उससे लड़कर उसे खुदगर्ज और छिछोरा वगैरह कहकर जब चली गई, तो यह फितरी लड़का, घर जब देर से लौटता है, शराब के नशे में धुत्त घर में बड़ा उपद्रव पैदा करता।
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फिल्मों की दुनिया एक गंदे नाले की तरह है। आप जैसा शरीफ आदमी वहां रौंद डाला जाएगा। वहां सभी कुछ नकली है, बनावटी है, कल आपसे फिर बात होगी। अभी मुझे पृथ्वी थिएटर्स पहुंचना है।'
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