पहले तो आप मेरे साथ दिल से दाद दीजिए उस बहादुर महिला को, जिसने तहलका के संपादक के खिलाफ बोलने की हिम्मत की। आसान नहीं हुआ होगा उनके लिए यह फैसला करना, क्योंकि जानती होगी शिकायत करते समय कि उनकी नौकरी चली जाएगी, और शायद चली भी गई होगी, जब तक आप यह लेख पढ़ रहे होंगे। अक्सर महिलाएं चुप रहकर बर्दाश्त कर लेती हैं इस किस्म का शोषण, क्योंकि जानती हैं कि ऐसा तो होता ही है अपने भारत महान में उन महिलाओं के साथ, जो मजबूरी या शौक के कारण घर की चारदीवारियों से बाहर निकलती हैं नौकरी करने।
पत्रकारिता की दुनिया में महिलाओं के साथ ऐसा होना तो नहीं चाहिए, क्योंकि हमारा काम है, समाज की चौकीदारी करना। समाज के लिए आदर्श बनना। हमारे बड़े संपादक दिखते हैं रोज टीवी पर दूसरों को उपदेश देते हुए, जैसे वे खुदा के खास बंदे हों। लेक्चर देने के मामले में तरुण तेजपाल की तहलका पत्रिका हम बाकियों से दो कदम आगे रही है शुरू से।
तहलका का शायद ही आपको कोई अंक मिलेगा, जिसमें लेक्चर न हो किसी न किसी मुद्दे को लेकर। कभी उद्योगपतियों के भ्रष्ट तरीकों पर नसीहतें होती हैं, कभी राजनेताओं की बुरी आदतों पर भाषणबाजी, तो कभी अन्य पत्रकारों और अखबारों की कड़ी आलोचना होती है।
यही वजह है कि पिछले सप्ताह जब उस महिला ने तरुण तेजपाल पर इलजाम लगाए, तो मीडिया की दुनिया में हंगामा मच गया। पहले तो यकीन नहीं आया कि तेजपाल साहब ऐसी घिनौनी हरकत कर सकते हैं। फिर जब उनका माफी मांगने वाला पत्र पढ़ा, तो मेरे जैसी महिला पत्रकारों का खून खौलने लगा। इसलिए कि तेजपाल साहब ने अपनी गलती कबूल करके अपने आपको ही दंडित करने का प्रस्ताव रखा यह कहकर कि छह महीने के लिए वह तहलका से दूर रहेंगे। यानी किया तो मैंने अपराध, लेकिन कानूनी कार्रवाई की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि मैं अपने आपको ही सजा देने का काम कर रहा हूं।
वाह! क्या बात है। ऐसा ही अगर किया होता उन दरिंदों ने, जिन्होंने निर्भया का बलात्कार कर उसकी जान ले ली, तो क्या कहते हम-आप? याद कीजिए, हमको कितनी तकलीफ हुई जब नाबालिग होने के कारण उन बलात्कारियों में से एक बच गया फांसी के फंदे से। याद कीजिए कि हमको कितनी तकलीफ हुई कुछ हफ्तों पहले, जब एक महिला पत्रकार के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ मुंबई के उन वीरान खंडहरों में।
याद किया होता इन घटनाओं को तेजपाल साहब ने, तो न लिखते वह पत्र, जिसमें उन्होंने खुद को सजा देने की बात कही। ऐसी चिट्ठी लिखने के बदले अगर उन्होंने खुद को कानून के हवाले किया होता, तो शायद उनके लिए कुछ हमदर्दी पैदा होती हम जैसे लोगों में। शर्म आनी चाहिए उन्हें और उनसे भी ज्यादा शर्म आनी चाहिए उनकी सहयोगी संपादक शोमा चौधरी को, जिन्होंने यह कहकर पत्रकारों को चुप कराने की कोशिश की तहलका का यह अंदरूनी मामला है। यह वही शोमा चौधरी हैं दोस्तो, जिनको आपने कई बार देखा होगा टीवी पर महिलाओं के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की बड़ी-बड़ी बातें करते हुए।
यहां यह कहना जरूरी है कि पत्रकारिता की दुनिया में क्योंकि मुझे अरसा हो गया है, मैंने कई बार देखा है बुजुर्ग संपादकों को महिला पत्रकारों के साथ ऐसी ही हरकतें करते हुए, जो तेजपाल साहब ने की गोवा के अपने थिंक उत्सव में लड़की के साथ।
याद है मुझे किस तरह दूरदर्शन के प्रोड्यूसर पेश आते थे महिला पत्रकारों के साथ, जब दूरदर्शन के अलावा टीवी में काम ढूंढ़ना नामुमकिन था अपने देश में। उस समय दूरदर्शन के ये अधिकारी अपने आपको बॉलीवुड के निर्देशकों से कम नहीं मानते थे और उतना ही सताते थे नौजवान महिला पत्रकारों को, जितना नई अभिनेत्रियों को बॉलीवुड में सताया जाता है।
शायद आज भी ऐसा ही होता होगा, क्योंकि अगर तहलका जैसी पत्रिका के संपादक ऐसा कर सकते हैं, तो कोई भी कर सकता है। इलाज क्या है इस बीमारी का, मैं नहीं जानती, लेकिन पीड़ित महिलाएं अगर खुलकर बोलने की हिम्मत दिखाती रहेंगी, तो कोई न कोई दिन ऐसा जरूर आएगा, जब इस देश की बेटियों के लिए माहौल बदल जाएगा।