विपक्ष की भूमिका में राहुल गांधी का आगमन दस वर्ष की देरी से हुआ। दरअसल, शुरुआती योजना के मुताबिक 2004 में सोनिया गांधी चाहती थीं कि राहुल विपक्ष की प्रभावी आवाज बनकर उभरें। राहुल उस वक्त इंग्लैंड में कंसल्टेंसी से जुड़ी एक प्रतिष्ठित नौकरी में थे। हालांकि आधिकारिक तौर पर राजनीति को अपनाने के लिए जनवरी, 2004 में उन्होंने वह नौकरी छोड़ भी दी थी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। सोनिया की अगुआई में कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए को अप्रत्याशित झटका दिया; और उसके बाद दस वर्षों तक कांग्रेस की यूथ विंग में राहुल आंतरिक लोकतंत्र लाने की नाकामयाब कोशिशें करते रहे, जबकि मुख्य ग्रैंड ओल्ड पार्टी सुधारों और बदलावों को लेकर अनमनी बनी रही। 2004 से लेकर 2014 तक के दस वर्ष के यूपीए शासन में भी राहुल का राजनीतिक कद बढ़ता नहीं दिखा। इसके उलट इस दौरान कुछ हद तक संभावनाएं दिखाने वाला यह नेता काफी असमंजस में, अनमना और ज्यादातर अगंभीर दिखा। इस तरह से देखें, तो राहुल के लिए सबसे पहली चुनौती भरोसेमंद और हरदम उपलब्ध नेता की छवि बनाने की होगी।
जिस बेबाक अंदाज में राहुल पिछले हफ्ते संसद में बोल रहे थे, और केदारनाथ में जैसी सक्रियता उन्होंने दिखाई, उससे यह सवाल उभरता है कि क्या उनका 58 दिनों के लिए गायब होना, 'ब्रांड राहुल' को फिर से लॉन्च करने की रणनीति तो नहीं थी? पहली नजर में यह बेतुकी लग सकती है, मगर गहनता से देखने पर इसके पीछे एक ऐसे नेता में लोगों की दिलचस्पी पैदा करने की कोशिश दिख सकती है, जो अपनी चमक खो चुका था। राहुल में बतौर नेता संभावनाएं दिखाने में उनकी नाटकीय वापसी कुछ हद तक कामयाब रही है।
अतीत में समय-समय पर राहुल ने अपनी योग्यता, विश्वसनीयता और राजनीति में एक नई तरह की ताजगी की झलक दिखाई है। ऐसा ही एक वाकया दिसंबर, 2005 का है, जब राहुल से मुलाकात के दौरान आईटी क्षेत्र के दिग्गज बिल गेट्स ने अरबों डॉलर वाले अपने बिल गेट्स फाउंडेशन के जरिये भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में अपना योगदान देने की इच्छा जाहिर की। इस पर राहुल बगैर देरी किए तपाक से बोले, 'आप बिहार के लिए कुछ क्यों नहीं करते?' इसके बाद युवा गांधी काफी देर तक उन्हें बताते रहे कि बिहार में हर वर्ष किस तरह घातक कालाजार सैकड़ों जान अपनी आगोश में ले लेता है। बिल और उनकी पत्नी मिलिंडा ने गौर से उनकी बातें सुनीं।
गौरतलब है कि मक्खियों से फैलने वाली इस बीमारी का सही इलाज न मिलने पर मौत हो सकती है। संयोग की बात है कि एक ओर तो राहुल ने बिल गेट्स से बिहार में लाखों डॉलर लगाने का निवेदन किया, वहीं दूसरी ओर वह सरेआम यह बयान भी दे चुके थे कि बिहार में सुशासन का कोई चिह्न नहीं है। एकाएक दिया गया यह बयान कांग्रेस के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गया था, क्योंकि उस वक्त बिहार में उसके सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल का शासन था। हालांकि इसको लेकर हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि बतौर नेता राहुल का अंदाज हमेशा लीक से हटकर ही रहा है।
मगर जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है। मनमोहन सिंह सरकार में शामिल होने में राहुल की बेरुखी, कांग्रेस के संगठन के लिए जरूरी बन चुके सुधारों का अभाव और कमजोर संवाद, कुछ ऐसी कमजोरियां हैं, जिनसे राहुल पार नहीं पा सके। पुरानी कहावत कि 'शब्दों से ज्यादा व्यक्ति के काम बोलते हैं', राहुल पर ठीक बैठती है।
राहुल के सामने कठिन चुनौतियां हैं। मगर इस वक्त उनके लिए जरूरी यह है कि उन्हें पार्टी के दूसरे सदस्यों का सम्मान मिल सके। इसके अलावा ग्रैंड ओल्ड पार्टी के सामने मौजूद नेतृत्व के संकट का भी उन्हें जल्दी हल तलाशना होगा। इस वर्ष कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव भी होने हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या राहुल पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र सुनिश्चित कर पाएंगे, जिसकी बात वह लंबे समय से करते आए हैं? हालांकि सच यह भी है कि पार्टी की आंतरिक चुनाव प्रणाली में सुधार कर पाना इतना आसान नहीं है। खासकर तब, जबकि पार्टी के पास न तो पर्याप्त आधारभूत संरचना है, और न साफ-सुथरे ढंग से चुनाव कराने की इच्छा रखने वाले लोग।
पार्टी को मनचाहा आकार देने के लिए राहुल कौन-से कदम उठाएंगे, इसे लेकर कांग्रेस में काफी लोग आशंकित हैं। पार्टी के पुराने लोग छिपे तौर पर यह कहने लगे हैं कि अब उन्हें समझ आने लगा है कि जनवरी, 2004 में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही राहुल ने पार्टी के प्रमुख संगठन से दूरी क्यों बनाए रखी थी। वह बताते हैं कि ऐसा इसलिए था, ताकि समय आने पर पार्टी में मनचाहे बदलाव आसानी से किए जा सकें। पार्टी के भीतर अब यह विचार अपनी जड़ें जमा रहा है कि राहुल के नेतृत्व में केवल दो तरह के नेता ही पनप सकते हैं। पहले वे, जो चुनाव जीतने की कुव्वत रखते हों, और दूसरे तकनीकी पृष्ठभूमि के वे नेता, जो काफी दिमागी माने जाते हैं। अगर राहुल जनवरी 2014 में जयपुर में दिए गए अपने भाषण पर अमल करते हैं, तो ऐसे नेताओं पर गाज गिरनी तय है, जो चापलूसी करके ऊंचे पदों पर काबिज हैं। गौरतलब है कि 1985 में कांग्रेस के शताब्दी वर्ष में स्वच्छ छवि वाले 41 वर्ष के राजीव गांधी ने मुंबई के ब्रेबॉर्न स्टेडियम में पार्टी के भीतर चापलूस नेताओं पर करारा प्रहार किया था। राहुल के लिए जरूरी है कि वे राजीव के अधूरे सपने को पूरा करें। 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी का सामना करने के लिए तैयार होने को राहुल के पास चार वर्ष हैं। देखने वाली बात होगी कि क्या वह ऐसा संगठन तैयार कर सकेंगे, जो भाजपा और संघ परिवार की संयुक्त ताकत को मात दे सके।
-वरिष्ठ पत्रकार और 24 अकबर रोड के लेखक