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समझ से परे राहुल गांधी

Sun, 18 Dec 2016 07:08 PM IST
तवलीन सिंह
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तवलीन स‌िंह
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हमारे राजनेताओं की कुछ बातें हम राजनीतिक पंडित भी नहीं समझ पाते। सो पिछले सप्ताह मैंने राहुल गांधी के सनसनीखेज वक्तव्य को समझने की कोशिश की, लेकिन अंत में मुझे हार माननी पड़ी। इस बार संसद का पूरा सत्र बेकार गया, क्योंकि नोटबंदी को लेकर विपक्ष इतना परेशान था कि उसने बहस ही नहीं होने दी। सत्र के अंतिम क्षणों में राहुल गांधी न सिर्फ बहस के लिए उतावले दिखे, बल्कि वह कह रहे थे कि उनको अगर लोकसभा में बोलने दिया जाएगा, तो ‘भूकंप’ आ जाएगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनके पास ऐसे दस्तावेज हैं, जो साबित करते हैं कि प्रधानमंत्री व्यक्तिगत तौर भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि ऐसे दस्तावेज उन्होंने छिपाकर क्यों रखे हैं, तो उन्होंने कहा कि वह इन्हें लोकसभा में ही पेश करेंगे। सवाल यह है कि अगर ऐसे दस्तावेज उनके पास हैं, तो क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि वह इन्हें देश के सामने रखें। नरेंद्र मोदी के लंबे राजनीतिक जीवन में कई किस्म के आरोप लगे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के कभी नहीं। मुझे यह समझ में नहीं आता कि जब राहुल गांधी की मां ने मोदी को बेझिझक मौत का सौदागर कहा है, जब कांग्रेस के अन्य नेताओं ने मोदी की तुलना कई बार हिटलर से की है, तो उनके भ्रष्ट होने के सबूत को लोकसभा में ही पेश करने की जरूरत राहुल गांधी क्यों महसूस कर रहे हैं?
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सवाल यह भी है कि इतने दिन यह दस्तावेज संसद में पेश क्यों नहीं किए गए। किसी भी देश के लिए प्रधानमंत्री का भ्रष्ट होना इतनी बड़ी खबर है कि सरकार गिर सकती है, चुनाव समय से पहले कराए जा सकते हैं। सो इतनी बड़ी बात छिपाने का क्या कारण हो सकता है? सवाल यह भी कि अगर राहुल गांधी अपने आरोप साबित नहीं कर पाए, तो क्या वह देशवासियों से माफी मांगेंगे? नोटबंदी ने आम आदमी लिए परेशानियां खड़ी की हैं। ऐसे में, अगर प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के सबूत हैं, तो कांग्रेस इस पर चुप क्यों है?

राहुल गांधी की कई बातें मुझे पहले भी समझ में नहीं आई थीं, लेकिन इस बार तो उन्होंने हद ही कर दी है। जब उनके पास प्रधानमंत्री के खिलाफ इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज थे, तो फिर उनके ही सांसदों ने सत्र को चलने क्यों नहीं दिया? संसद चलती, तो देशवासियों का यह फायदा भी सकता था कि प्रधानमंत्री को संसद के अंदर समझाना पड़ता कि नोटबंदी का असली लाभ क्या होनेवाला है। उनको बताना पड़ता कि नोटबंदी का असली मकसद काला धन कम करना था या देश की अर्थव्यवस्था को डिजिटल बनाना। पहले तो प्रधानमंत्री ने काला धन खत्म करने की ही बातें कीं, पर थोड़े ही समय में उन्होंने यह लक्ष्य बदल दिया और देशवासियों को समझाने लगे किस तरह उनका सेलफोन उनका बैंक बन सकता है। संसद चलती, तो कई और बातें स्पष्ट हो जातीं, जो अभी तक हुई नहीं हैं।
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इसलिए राहुल गांधी के इस आरोप को गंभीरता से लेना कठिन है। न ही उनकी इस बात पर यकीन करना आसान है कि उनके डर से प्रधानमंत्री ने लोकसभा में बहस होने नहीं दी। दरअसल विपक्ष बहस न होने देने के बहाने ढूंढता रहा। पहले प्रधानमंत्री की मौजूदगी की शर्त रखी गई, और जब वह मौजूद हुए दोनों सदनों में, तो मांग की गई कि प्रधानमंत्री को पूरी बहस संसद में मौजूद रहकर सुननी पड़ेगी, वर्ना बहस नहीं होगी। राहुल गांधी शायद भूल गए हैं कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव हार चुकी है। वह शायद यह भी भूल गए हैं कि दशकों बाद केंद्र की सत्ता में उनके परिवार का राज नहीं है।
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