राहुल गांधी ने आखिरकार मेहसाणा की एक सभा में बड़े नाटकीय ढंग से खोदा पहाड़ और निकाली वही मृत चुहिया, जिसे आम आदमी पार्टी के समर्थक अरसे से प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का सबूत कहकर पेश करते आए हैं। अरविंद केजरीवाल के पूर्व साथी प्रशांत भूषण सर्वोच्च न्यायालय में लेकर गए थे ये ‘सबूत’ और न्यायाधीशों ने स्पष्ट कहा कि ये सबूत नहीं, सिर्फ आरोप हैं। शायद राहुल गांधी को इसकी जानकारी नहीं थी। सो कई दिनों से कह रहे थे कि उन्हें लोकसभा में इसलिए नहीं बोलने दिया गया, क्योंकि प्रधानमंत्री जानते हैं कि वह बोलेंगे, तो ‘भूकंप’ आ जाएगा। बड़ी बेसब्री से हम पत्रकार इस भूकंप की प्रतीक्षा कर रहे थे, सो निजी तौर पर मैं बहुत मायूस हुई, जब उन्होंने मृत चुहिया निकाली सबूत के तौर पर।
उन्होंने लंबी फेहरिस्त सुनाई कि कितनी बार सहारा और आदित्य बिरला समूह ने नरेंद्र मोदी को करोड़ों रुपये दिए थे, जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने इसकी भी परवाह नहीं की कि इस सूची में कांग्रेसी नेताओं के भी नाम थे, जिनमें दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का भी नाम था, जो फिलहाल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव अभियान की पैरवी कर रही हैं।
चूंकि मैं मुंबई के उद्योग जगत को अच्छी तरह से जानती हूं, इसलिए मुझे शुरू से इन दस्तावेजों पर शक था। आयकर विभाग का कहना है कि उन्होंने उक्त दोनों उद्योग समूहों के दफ्तर पर छापे मारे थे और उन्हें ये दस्तावेज किसी आला अधिकारी के कंप्यूटर से मिले। समझने वाली बात है कि कोई भी उद्योगपति इतना मूर्ख नहीं होता कि रिश्वत देने के बाद वह इसकी सूची अपने दफ्तर में रखे। ऐसे खर्चों को इतना गुप्त रखा जाता है कि लिखित रूप में इसका सबूत बड़ी मुश्किल से मिलता है। छापे मारने का उद्देश्य होता है, सबूतों को टटोलना और जब सबूत नहीं मिलते, तो टैक्स अधिकारी कई बार अपने छापे का आधार पुख्ता बनाने के लिए ऐसे सबूत खुद पैदा कर देते हैं।
मैंने खुद देखा है कि कैसे टैक्स विभाग के अधिकारी डरा-धमकाकर सबूत पाने की कोशिश करते हैं। अक्सर जांच के बाद भी जब उन्हें सबूत नहीं मिलता, तो वे इस आधार पर मुकदमा बनाते हैं कि फलाने उद्योगपति को तब कॉन्टैक्ट मिला, जब फलां नेता मुख्यमंत्री थे, इसलिए जरूर रिश्वत दी होगी। ऐसा नहीं है कि उद्योगपति रिश्वत नहीं देते हैं। वे रिश्वत देते हैं, क्योंकि ऐसा करने पर वे मजबूर हैं। अपने देश में लोकतंत्र की गाड़ी काले धन के ईंधन से चलती है, सो काला धन रखना पड़ता है, पर उसका सबूत कोई नहीं रखता है। उद्योगपतियों के दफ्तरों में यदि सबूत मिलते भी, तो इसके कि इस छापे से बचने के लिए कितना खिलाया गया है। पूरा देश जानता है कि जितना भ्रष्टाचार सरकारी अधिकारी करते हैं, उतना कोई और नहीं कर सकता। और सबसे भ्रष्ट अधिकारी हैं टैक्स विभाग में।
इसी तरह पहले भी मजाक के पात्र बने राहुल गांधी, जब उन्होंने मायावती सरकार पर 70 किसानों को मारने का आरोप लगाया था भट्टा-पारसौल कांड के बाद। उसके बाद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने उन्हें ऐसा सबक सिखाया कि उसे भूले नहीं होंगे। फिर भी वह राजनीति के दांव-पेच नहीं सीख पाए। वह बड़ी-बड़ी बातें करते थे कि जनता के सामने सबूत पेश करके नरेंद्र मोदी के गुब्बारे फोड़ेंगे, लेकिन पिछले सप्ताह खुद उनका अपना गुब्बारा फूट गया। सो अब राहुल गांधी को समझ जाना चाहिए कि झूठ बोलने वालों को कौआ नहीं काटता, जनता काटती है अगले चुनाव में। बहरहाल, आगे-आगे देखिए होता है क्या!