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तमिलनाडु में तूफान थमा नहीं है

Sun, 25 Dec 2016 07:06 PM IST
ए गंगाधरन
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पनीरसेल्वम और शशिकला
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जयललिता ने तमिलनाडु की राजनीति को तो प्रभावित किया ही, उनकी मृत्यु के बाद भी वहां राजनीतिक उथल-पुथल खत्म होने का नाम नहीं ले रही। एक तरफ अम्मा की सहेली शशिकला नटराजन को उनके समर्थक मुख्यमंत्री पद संभालने के लिए कह रहे हैं, तो दूसरी तरफ मौजूदा मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नजदीकी जताकर खुद को मजबूत करना चाहते हैं। पर मौजूदा उथल-पुथल यहीं तक सीमित नहीं है। एक दूसरी जातिगत गोलबंदी भी जल्दी ही सामने आ सकती है।
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तमिल राजनीति अन्य भारतीय राज्यों की अपेक्षा भिन्न मालूम पड़ती है, लेकिन वास्तविक रूप में ऐसा नहीं है। मौजूदा तथ्य ये साबित करते हैं कि तमिल समाज ने अपनी सामाजिक व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने के लिए उत्तर भारत से सांस्कृतिक आदर्शों और धार्मिक मूल्यों को पुनः आयात किया है। सामान्यतः बाहर से ऐसा प्रतीत होता है कि तमिल समाज अन्य भारतीय राज्यों की तरह ही जातिग्रस्त रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इसने जाति, संप्रदाय और वर्ग के बीच सामंजस्य बनाने के लिए बहुत काम किया है। उपनिवेशवाद के आगमन से तमिल समाज में अंग्रेजी शिक्षा और लोक प्रशासन के रूप में कई महत्वपूर्ण बदलाव आए। आधुनिक विकास का फायदा वहां सीधे तौर पर ब्राह्मण जातियों को हुआ। सवर्ण जाति के अलावा जमींदार वर्ग, अन्य जाति समूहों व व्यापारियों ने इस गंभीर सामाजिक अव्यवस्था को वाणी तो दी, लेकिन अंग्रेजी शिक्षा के क्षेत्र में ब्राह्मण वर्ग से प्रतिस्पर्धा करने में वे सक्षम नहीं हो पाए थे। इसी प्रक्रिया में महान द्रविड़ सभ्यता की खोज 19वीं सदी के प्रारंभ में हुई, जिसने विकसित ब्राह्मण समाज को छोड़कर अन्य वर्गों के असंतोष को एकजुट किया।

1856 में रॉबर्ट कॉल्डवेल नाम के एक स्कॉटिश मिशनरी विद्वान पुरातन संस्कृति की खोज करके मद्रास प्रेसिडेंसी के गैर-ब्राह्मण लोगों को एकजुट करने में सफल हुए। उन्होंने गैरब्राह्मण समुदाय के लोगों को शिक्षित करने का बीड़ा भी उठाया। ब्राह्मणों की आबादी मात्र तीन प्रतिशत के बराबर थी, लेकिन उनका वर्चस्व नौकरशाही, राजनीति व न्यायपालिका तथा अनेकों विभागों में था। ब्राह्मणों के इस दबदबे को कम करने के लिए उन्होंने एक छाता रूपी गैर-ब्राह्मणों का महागठबंधन तैयार किया, और द्रविड़ सभ्यता के विचारों को सामाजिक संवेदनाओं के रूप में आम सभाओं में राजनीतिक रूप से प्रयोग किया।
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कॉल्डवेल ने वर्ष 1916 में जस्टिस पार्टी की स्थापना कर सामुदायिक घोषणापत्र के जरिये रोजमर्रा से जुड़े न्यायिक, विधायिका और लोक प्रशासन के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज की। इसी बीच ईवी रामास्वामी नायकर ने 1925 में स्वसम्मान के लिए सामाजिक सुधार आंदोलन के द्वारा समाज में व्याप्त जाति संबंधित बुराइयों के विरुद्ध कार्य किया। आगे चलकर वर्ष 1944 में यही स्वसम्मान आंदोलन 'द्रविड़ कड़गम' पार्टी के रूप में परिणत हुआ। राजनीतिक अखाड़े में कूदने से पहले इस पार्टी ने समाज के लोगों में शिक्षा एवं उनके सामाजिक व राजनीतिक आधारों के लिए लड़ाई लड़ी।

उसके बाद वर्ष 1949 में सीएन अन्नादुरई द्वारा द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) गठित की गई। इसने तमिल भाषा, संस्कृति और आर्थिक अधिकार के खिलाफ रणनीतियां बनाईं। अन्नादुरई का व्यक्तित्व आम लोगों के बीच भूमिपुत्र के रूप में उभरा। इस पार्टी ने कलम, मीडिया और चलचित्रों के माध्यम से साक्षर और निरक्षर लोगों के बीच अपने विचार पहुंचाए। द्रमुक ने दो दशक के अंदर अपने विचारों और योजनाओं का प्रचार-प्रसार करके मजबूत कांग्रेस पार्टी को धूल चटाकर पूर्ण बहुमत हासिल किया और तमिलनाडु की राजनीति को उसने अपने कंधों पर ले लिया।

वर्ष 1967 में मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए सीएम अन्नादुरई ने एक योग्य प्रशासक के रूप में तमिलनाडु को कल्याणकारी राज्य बनाने हेतु रोडमैप तैयार किया। एम करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन, और जयललिता जैसे लोकसेवकों ने तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ परंपरा का अनुसरण करते हुए कल्याणकारी नीतियों के जरिये वहां के लोगों की प्राथमिक जरूरतें पूरी कीं। इन्होंने सामाजिक क्षेत्र में और भी अनेक जनहित योजनाएं शुरू कीं। दूसरे राज्यों की तरह तमिलनाडु की राजनीति भी जाति पद्धति पर संचालित है, लेकिन यह केवल छिटपुट स्तर पर पार्टियों को गतिशील करने वाले मतदाताओं तक ही सीमित है। उच्च स्तर की राजनीति के लिए मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में जाति-समीकरण का अस्तित्व नहीं है। यही कारण है कि तमिलनाडु के अधिकांश नेताओं ने जातिगत दर्जों से उपर उठकर तमिलों के प्रति अपनी समर्पित भावना से कार्य किया और वहां के लोगों के बीच खूब सुर्खियां बटोरीं। वहां की राजनीति में गैर-तमिल क्षेत्र के लोग भी तमिल संस्कृति और उसके मूल्यों के प्रति अपनी राजभक्ति सिद्ध कर सके, तो इसकी यही वजह है। द्रमुक आंदोलन के संस्थापक पेरियार, एमजी रामचंद्रन और जयललिता सरीखे दो पूर्व और दिवंगत मुख्यमंत्री और अभिनेता के रूप में बेहद लोकप्रिय रजनीकांत और विजयकांत तमिल समाज से नहीं होते हुए भी आम लोगों द्वारा अविश्वसनीय समर्थन प्राप्त करने में सफल रहे।

अम्मा की मृत्यु से तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल-सा उत्पन्न हो गया है। जयललिता के निधन से वहां जो शून्य पैदा हुआ है, उसकी भरपाई करना आने वाले दिनों में मुश्किल ही प्रतीत होता है। बल्कि शोक खत्म होने के बाद अब वहां सत्ता की लड़ाई तेज होगी। तथ्य यह है कि वर्तमान मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम और महासचिव बनने की होड़ में सबसे आगे शशिकला, दोनों दक्षिण तमिलनाडु के प्रमुख मध्यस्थ जाति ‘थेवार’ समुदाय से संबंध रखते हैं। जबकि दूसरी मध्यस्थ जाति ‘गाउंडर्स’ के पास थेवार समुदाय से कहीं अधिक विधायक हैं। जाहिर है, यह समुदाय चुप नहीं बैठने वाला। साफ है कि तमिलनाडु की राजनीति भी उत्तर भारत के हिंदी प्रदेश का रूप अख्तियार कर रही है।
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