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माना: हिमालय की बेटी

Sat, 27 Sep 2014 08:08 PM IST
ओम गुप्ता
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महात्मा गांधी की आत्मकथा का शीर्षक था- 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग'। गांधी जी 1869 में जन्मे थे और 1948 को अपने सत्यों की वेदी पर बलिदान हो गए। लेकिन, उनकी जीवन कथा 1921 में पूर्ण विराम ले लेती है। उसी वर्ष उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अर्पित अपने अनुभवों को अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसक संघर्ष में सफलापूर्वक प्रयोग करके हमें आजादी दिलाई। उसके बाद उन्होंने केवल पोस्ट कार्ड लिखे और तीन अखबार निकाले। उनका मानना था कि बाद का उनका जीवन खुली किताब था, जिसे कोई भी पढ़ सकता है।
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ठीक इसी तर्ज पर हाल ही में एक खूबसूरत किताब आई है ‘माना: हिमालय की बेटी।’ इसे जानी मानी गांधीवादी विचारक और जुझारू राधा भट्ट ने लिखा है। यह एक अदभुत जीवनगाथा है। 81 वर्षीय राधा जी गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष हैं और केवल पांचवी क्लास तक पढ़ी हैं, लेकिन उनकी प्रेरक आत्मकथा गांधी के आदर्शों का मूर्त रूप है। इसे अंग्रेजों के अलावा, डेनिश और स्वीडिश भाषाओं में भी अनूदित किया गया है। इन्हें नोबल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। ये गुजरात विद्यापीठ, गांधी स्मारक निधि, कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट से जुड़ी रही हैं। गांधी की आत्मकथा की तरह यह जीवनी भी इनके जीवन के प्रारंभिक काल में थम जाती है। माना का बचपन विरोध, संघर्ष और विजय का संदेश देता है। एक नमूना देखिए- 'क्या जमाना आ गया है? लड़की अपने ससुर से कह रही है कि मेरे होने वाले पति काे भेज देना' गांव में जिधर देखो, लोग यही बात कर रहे थे। गांव के रिवाज के खिलाफ किसी ने आज तक ऐसा नहीं किया था।  वे न सिर्फ आपस में इस विषय पर बातें कर रहे थे, बल्कि इजा और आमा से भी मिलने आ रहे थे कि आखिरकार माना कर क्या रही थी! यहां तक कि माना के भाई के स्कूल में भी माना चर्चा का विषय बन गई थी। पर माना चुप रही।

एक दिन डाकिया दो पत्र लाया। एक पत्र पिताजी ने और दूसरा दीदी ने भेजा था। पिताजी ने लिखा था- ‘कोई शर्तें-वर्तें नहीं। तुम पहले ही काफी पढ़ चुकी हो। एक मध्यम वर्गीय परिवार में आराम का जीवन बिताने का मौका तुम्हें सौभाग्य से मिला है।’ दीदी का कुछ और ही कहना था, 'तुम्हें अपने लक्ष्य में सफलता मिलेगी माना। बस धैर्य मत खोना। तुम्हारी सफलता गांव की बहुत सी दूसरी लड़कियों के लिए प्रेरणा का काम करेगी।’
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साहित्य प्रकाशन द्वारा छापी गई यह प्रेरक कृति उत्तराखंड की कुमाउनी पहाड़ियों में सरयू की सहायक नदी के तट पर खेतों में धान की फसल पर परवान चढ़ी है। इस कहानी को किसी किशोरी के घने बालों की तरह गूंथा गया है, एक-एक शब्द को भीलनी द्वारा चखे हुए बेरों की तरह। अक्सर इसमें पच्चीकारी और क्रिम्शी का एहसास होता है। माना का जन्म अशुभ माना गया था। लेखिका उन क्षणों को मानों बार-बार जीती आई थी। जैसे ही मंदिर में शाम की घंटिया बजीं इजा की एक चीख के साथ एक बच्चे का जन्म हुआ। नवजात शिशु एक लड़की थी। परिवार की तीसरी लड़की। आमा दादी और इजा तीनों को आशा थी कि इस बार लड़का ही होगा। तीसरी बेटी के जन्म ने सारा वातावरण गमगीन कर दिया।

कई तो यहां तक चाह रहे थे कि यदि बच्चा मरा हुआ पैदा होता, तो ज्यादा अच्छा होता। पराए घर का धन बेटी, बेटा तो वंश का दीपक है, खानदान को चलाने वाला है, बुढ़ापे में मां-बाप के काम वही तो आएगा। ऐसे अनेक मंतव्य लोगों के मुंह से फूट रहे थे। लेकिन इतिहास साक्षी है कि पांचवी के बाद पढ़ाई छुड़वा दिए जाने के बावजूद माना ने जमाने से हार नहीं मानी। उसे हमेशा यह अनुभूति थी कि भले ही उसने अभी घरों की लड़कियों की तरह उच्च औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, लेकिन पहले पिता के घर और फिर जीवन की कक्षा में उन्होंने खुद को एक बड़े संकल्प के साथ महिला उत्थान के लिए जीवन भर काम किया। वह आज तक जारी है।

माना कि बड़ी बहन पाखली असमय ही विधवा हो गई। माना के लिए यह एक बड़ा झटका था, लेकिन उसने अपनी बहन को पूरा सहारा दिया और एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए प्रेरित किया।

यह माना का सौभाग्य था कि उसे एक सहृदयी और दूरदर्शी पिता मिले थे। उन्होंने माना को स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया और अपने परिवार को इसके लिए तैयार किया।

माना जिस युग में पली बढ़ी थी, वह प्रेतों और दुरात्माओं पर विश्वास का जमाना था। लेकिन उसने इन सब अंधविश्वासों का डटकर विरोध और मुकाबला किया।

यह पुस्तक आज के संदर्भ में प्रागैतिहासिक काल की लगती है, लेकिन आज भी देश का एक बड़ा हिस्सा लड़कियों की उच्च शिक्षा का विरोधी है। खासकर दूरदराज के गांव-देहात में। यह बात दीगर है कि अनेक लड़कियां इन बेड़ियों को काटकर अपने उज्ज्वल भविष्य का सपना बुन रही हैं। माना कि यह गाथा ऐसी लड़कियों के लिए जलदीप का काम करेगी।
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