उत्तर प्रदेश एक बार फिर गलत वजहों से सुर्खियों में है। पिछले हफ्ते एक पत्रकार को जिंदा जला देने की खौफनाक घटना सामने आई, जिसने हम सबकी सामूहिक चेतना को झकझोर कर रख दिया। उसका कुसूर बस यह था कि उसने सूबे में राजनीतिकों और अपराधियों के गठजोड़ के खिलाफ लिखने की हिम्मत दिखाई। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक एक जून को शाहजहांपुर में कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों ने एक स्वतंत्र पत्रकार जगेंद्र सिंह पर केरोसीन डालकर आग लगा दी। आठ जून को लखनऊ के एक अस्पताल में सिंह की मौत हो गई। इसी हफ्ते एक अखबार ने सिंह का मृत्युपूर्व बयान प्रकाशित किया। अस्पताल में दिए गए इस बयान में उन्होंने कहा, 'उन्होंने मुझे क्यों जलाया? यदि मंत्री और उनके गुंडों की मुझसे किसी तरह की नाराजगी थी, तो मेरे शरीर पर केरोसीन डालकर जलाने के बजाय वे मेरी पिटाई कर सकते थे।' एक वीडियो क्लिपिंग में सिंह के जख्म साफ नजर आते हैं, इससे परिवार के इस दावे को भी बल मिला है कि अवैध खनन और जमीन हड़पने के मामलों में उत्तर प्रदेश के मंत्री की कथित संलिप्तता के बारे में लिखी गईं उनकी रिपोर्ट उन पर हमले का सबब बनी। सिंह ने एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की पीड़ा के बारे में भी लिखा, जिसका आरोप है कि एक मंत्री ने कथित तौर पर उसके साथ बलात्कार किया।
जगेंद्र सिंह के परिजन उनकी मौत के लिए उत्तर प्रदेश के मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा को जिम्मेदार बता रहे हैं और उनका आरोप है कि पुलिस भी इसमें संलिप्त थी। सिंह के परिजन बताते हैं कि वह फेसबुक पर शाहजहांपुर समाचार नामक एक पेज भी चला रहे थे, जिससे कई लोग उनसे नाराज थे। आरोपों से घिरी स्थानीय पुलिस का दावा है कि जगेंद्र सिंह ने खुद को आग के हवाले किया। कई पत्रकार संगठनों और मानवाधिकार एजेंसियों द्वारा घटना की जांच की मांग करने से शाहजहांपुर में हुई यह क्रूरता इंटरनेशनल स्टोरी बन गई है। राज्य पुलिस को मंत्री और पांच पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कथित तौर पर हत्या, साजिश और धमकाने के मामले में प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ी है। एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित कई संगठनों ने सिंह की मौत की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है। वास्तव में हिंदी मीडिया और फेसबुक पेज पर ग्रामीण मुद्दों पर लिखने वाले एक पत्रकार की मौत की घटना का वैसा संज्ञान नहीं लिया गया, जैसा लिया जाना चाहिए। संभव है कि कुछ दिनों बाद यह स्टोरी धुंधली पड़ जाए। इस घटना की तुलना जरा फ्रेंच पत्रिका शार्ली हेब्दो के पेरिस के दफ्तर में हुए हमले से करके देखिए, जिसमें संपादक सहित 12 लोगों की मौत हो गई थी।
सिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत की निष्पक्ष जांच की इसलिए भी जरूरत है, क्योंकि उत्तर प्रदेश सहित देश के दूसरे हिस्सों में भी ऐसे कम ही लोग हैं, जो भ्रष्ट और आपराधिक तत्वों के खिलाफ कमजोर लोगों के संघर्ष को सबके सामने लाने में अपना जीवन तक जोखिम में डाल देते हैं। सिंह की मौत ने असहज सच को सामने वाले पत्रकारों के जोखिम को भी सामने लाया है। 2013 में राष्ट्रीय मीडिया ने दर्ज किया कि उत्तर प्रदेश में महज 45 दिनों के भीतर चार पत्रकारों की हत्या हो गई। इनमें से एक घटना बुलंदशहर की है, जहां एक लापता पत्रकार का शव एक बैग से बरामद हुआ। वहीं एक हिंदी दैनिक के एक रिपोर्टर को इटावा में गोली मारी गई। इसके अलावा बांदा और लखीमपुर खीरी में भी दो पत्रकारों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। यह किसी को पता नहीं कि आखिर इन मामलों में जांच का क्या हुआ?
जिलों और छोटे शहरों में पत्रकारों को विपरीत परिस्थितियों में दबाव में काम करना पड़ता है। ईमानदार पत्रकार बखूबी अपना काम करते हैं, पर उन्हें राजनीतिकों और आपराधिक तत्वों या माफिया के गठजोड़ से भी जूझना पड़ता है, वह भी ऐसी परिस्थितियों में जहां उन्हें बड़े शहरों के पत्रकारों जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। हालांकि उत्तर प्रदेश अपवाद नहीं है, जहां पत्रकारों का जोखिम बढ़ रहा है। ऐसे समय जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दो वर्ष बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर रेडियो, टीवी और सोशल मीडिया पर अपनी सरकार की उपलब्धियां बता रहे हैं, क्या उन्हें उनके सूबे में पत्रकारों के बढ़ते जोखिम पर भी विचार नहीं करना चाहिए।