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सवाल गेहूं और जवाब चना

Fri, 16 Oct 2015 06:07 PM IST
विशाल शर्मा
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जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की जम्मू बेंच ने विगत नौ अक्तूबर के अपने एक निर्णय में न्यायिक प्रक्रिया के संबंध में एक बड़ा प्रश्न उत्पन्न कर दिया है।
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यह मुकदमा आया तो था अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर, परंतु उच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 370 भले एक अस्थायी प्रावधान के रूप में संविधान में आया हो, लेकिन अब यह स्थायी बन चुका है।

अनुच्छेद 370 का दर्जा भारतीय संविधान में क्या है, यह प्रश्न इस मुकदमे में किसी पक्ष ने पूछा ही नहीं था। अनुसूचित कर्मचारियों को तो न्याय नहीं मिला, पर एक नया विवाद खड़ा हो गया। जबकि संविधान के प्रावधानों की व्याख्या करने का अधिकार अनुच्छेद 145 (3) के अनुसार केवल सर्वोच्च न्यायालय के ही पास है।
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क्या अदालत के ऐसे निर्णय को किसी भी पक्ष के लिए बाध्यकारी माना जा सकता है, जो मुकदमे से संबंधित न हो ओर जो उसके अधिकार क्षेत्र से भी बाहर हो? यह निर्णय भारतीय संसद के संविधान संशोधन के अधिकारों को सीमित भी करता है।

यह तथ्य है कि गठबंधन सरकारों के ढुलमुल कामकाज और अनिर्णय की स्थिति के कारण बीती सदी के नब्बे के दशक से न्यायपालिका को अतिसक्रियता का परिचय देना पड़ा है।

पर क्या न्यायपालिका किसी मुकदमे का इस्तेमाल मनचाहे रूप में कर सकती है या वह भी संविधान के प्रावधानों से बंधी हुई है? यह तय करना मुश्किल है कि 'सवाल गेहूं और जवाब चना' वाले हाई कोर्ट के इस निर्णय से अनुसूचित जाति के कर्मचारियों को ज्यादा नुकसान हुआ या अलगाववादी राजनीति करने वालों को अधिक लाभ।

केंद्र सरकार इस निर्णय की न्यायिक पुनर्समीक्षा तो करवाएगी ही, इस निर्णय की समीक्षा देश की समस्त न्यायिक बिरादरी द्वारा भी की जानी चाहिए।

उम्मीद है कि देश की संसद कानून पारित कर जम्मू-कश्मीर के अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों को सारे देश की अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों के समान लाभ मुहैया करवाएगी। इस निर्णय की समीक्षा सर्वोच्च न्यायालय के लिए भी अनुच्छेद 370 की आड़ में अनुचित रूप से संविधान में जोड़े गए अनुच्छेद 35 ए को परखने का मौका है।

35 ए ही वह प्रावधान है, जिसके चलते जम्मू-कश्मीर में सगे भाई-बहन के कानूनी अधिकारों में अंतर पैदा होता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के मुताबिक लैंगिक समानता के मूल अधिकार के विरुद्ध है। यह सब उस देश में हो रहा है, जहां महिला अधिकारों की बात हर राजनीतिक दल करता है।
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सर्वोच्च न्यायालय को जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के इस अजीब-ओ-गरीब फैसले का स्वतः संज्ञान लेते हुए अनुचित रूप से जोड़े गए शोषण के इस प्रावधान 35 ए की संविधान के मौलिक अधिकारों की दृष्टि से समीक्षा करनी चाहिए, ताकि अनुसूचित जाति-जनजाति, महिलाओं और हाशिये के लोगों को न्याय मिल सके।

35 ए की वजह से ही जम्मू-कश्मीर मे सफाई कर्मचारी, गोरखा समाज तथा पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थी समाज बंधुआ मजदूरों की तरह जीवन बिताने को मजबूर हैं।

-लेखक कानूनविद हैं
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