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पुलिस की काबिलियत पर सवाल

शिवदान सिंह Updated Thu, 26 Apr 2018 06:34 PM IST
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शिवदान सिंह
दिसंबर 2012 में घटित निर्भया कांड की वीभत्सता तथा क्रूरता ने पूरे देश को इतना आंदोलित एवं द्रवित किया कि तत्कालीन केंद्र सरकार को पूरे महिला अपराधों से संबंधित कानूनों को और धारदार एवं प्रभावशाली बनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। इन नए कानूनों को देखने से ज्ञात होता है कि यदि इन्हें ठीक से लागू किया जाए, तो सामूहिक बलात्कार तथा बलात्कार जैसे अपराधों में लिप्त अपराधी को उचित तथा प्रभावी सजा मिलना निश्चित किया जा सकता है। परंतु देश की पुलिस, न्याय व्यवस्था की मौजूदा कार्यशैली के कारण ऐसे अपराधों पर लगाम नहीं लग सकी और इसके बाद निर्भया कांड से भी घृणित अपराध होते रहे। 


जम्मू-कश्मीर के कठुआ तथा उन्नाव में यौन हिंसा से संबंधित अपराधों से देश उसी प्रकार आंदोलित एवं दृवित है, जैसे निर्भया कांड के समय था। टीवी चैनलों पर भी इन घटनाओं पर बहस चल रही है। हर बार की तरह राजनेता एक दूसरे के समय में हुए इस प्रकार के अपराधों की गिनती कर एक दूसरे का तथा जनता का मुंह बंद कर रहे हैं। इस बीच, सरकार ने बलात्कार के मामलों में मौत की सजा के प्रावधान वाला अध्यादेश लाया है। लेकिन क्या ऐसी घटनाओं से निपटने का यही तरीका रह गया है?


इस मुद्दे पर ध्यान नहीं जा रहा है कि आखिर ऐसे कौन से कारण हैं,जिनकी वजह से देश की पुलिस ऐसे मामलों में बेबस नजर आती है? पुलिस की इस बेबसी का नजारा उस समय दिखा जब उन्नाव की घटना के संबंध में जानकारी देते हुए लखनऊ में उत्तर प्रदेश के पुलिस प्रमुख उस किशोरी से सामूहिक बलात्कार और उसके पिता की मौत के मामले में आरोपी को 'माननीय विधायक जी' कहकर संबोधित कर रहे थे। इसके विपरीत अमेरिका में विश्व के सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले राष्ट्रपति ट्रंप पर लगे यौन तथा अन्य अपराधों के लिए वहां की पुलिस तथा व्यवस्था उसी प्रकार व्यवहार करती है, जैसे एक आम नागरिक के साथ करती है।


अभी कुछ समय पूर्व ऑस्ट्रेलिया के उप प्रधानमंत्री तथा ब्रिटेन के एक मंत्री ने खुद पर लगे आरोपों के तुरंत बाद इस्तीफा देकर अपने आपको कानून के सामने प्रस्तुत किया। इस प्रकार के उदाहरण प्रदर्शित करते है कि सामंती व्यवस्था के अवशेष देश की पुलिस प्रणाली तथा नौकरशाही के अंदर मौजूद हैं। इसके कारण पुलिस सामंतों की लठैत तथा नौकरशाह उनके कारिंदों की तरह व्यवहार करते नजर आते हैं। 


उल्लेखनीय है कि देश में पहले से लागू कानून के तहत मौत की सजा दुर्लभ से दुर्लभ मामले में ही दी जाती है। सामूहिक बलात्कार तथा हत्या के अपराध में आखिरी बार 80 के दशक में गीता चोपड़ा सामूहिक बलात्कार मामले में पंजाब के रंगा एवं बिल्ला को फांसी की सजा दी गई थी। जब कभी कोई बड़ा अपराध होता है, तो सीबीआई जांच की मांग होने लगती है।


सीबीआई में भी देश के विभिन्न प्रदेशों से पुलिस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर आते हैं और ये ही अधिकारी यहां प्रभावशाली ढंग से कार्य करने लगते हैं। पुलिस पर अविश्वास होने के कारण ही ज्यादातर पीड़ित सीबीआई जांच की मांग करते हैं। यदि सरकारों में इच्छा शक्ति हो तो प्रत्येक राज्य की पुलिस सीबीआई की तरह बन सकती है। इसके लिए देश में 2006 में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्देशित पुलिस सुधार लागू करने होंगे। इससे पुलिस सत्ताधारी दलों तथा सत्ता में खीचतान में अपराधियों को संरक्षण देने वाले राजनेताओं के चंगुल से मुक्त होकर निष्पक्षता से काम कर सकेगी।
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