इसमें कोई शक नहीं कि अपने दामाद की गिरफ्तारी, खुद उनके फैसलों पर खड़े हुए सवाल और पिछले कुछ दिनों से देश के हर कोने से उठी इस्तीफे की मांग के बावजूद पद न छोड़कर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी हैं।
नैतिकता का आग्रह तो दूर, अपने रिश्तेदार की भ्रष्टाचार में लिप्तता के बावजूद उनके चेहरे पर एक शिकन तक नहीं दिखी। लेकिन जिस देश में थोड़े ही दिनों पहले हम यूपीए के दो मंत्रियों को विवादों में घिरने के बावजूद पद न त्यागने की जिद करते हुए देख चुके हैं, उस मुल्क में श्रीनिवासन का रवैया क्या सचमुच बहुत चकित करने वाला है!
यह मानने का कारण है कि बढ़ते हुए राजनीतिक भ्रष्टाचारों से ही श्रीनिवासन जैसों में इस्तीफा न देने का दुस्साहस पैदा होता है। उन दो मंत्रियों को तो यूपीए अध्यक्ष की सक्रियता के कारण पद छोड़ना पड़ा था, बीसीसीआई के मुखिया के सामने तो ऐसी कोई मजबूरी भी नहीं है।
क्या विद्रूप है कि जिस क्रिकेट बोर्ड को दुनिया की सबसे धनी संस्थाओं में से माना जाता है, और जिससे जुड़ना पैसा, ग्लैमर और ताकत की गारंटी है, उसमें न तो पारदर्शिता की जरूरत समझी जाती है, और न किसी तरह की जिम्मेदारी लेने की। श्रीनिवासन से पहले भी बीसीसीआई अध्यक्ष के विवादास्पद तौर-तरीके के एकाधिक नमूने सामने आए हैं।
सवाल यह है कि बीसीसीआई की स्वायत्तता और खेल संघों पर हस्तक्षेप न करने के नाम पर भ्रष्टाचार के मामलों की अनदेखी कब तक होती रहेगी, और इससे देश-दुनिया में क्या संदेश जाएगा।
चेन्नई में बोर्ड की जिस आपात बैठक में श्रीनिवासन की विदाई तय मानी जा रही था, उसमें न सिर्फ उन पर इस्तीफे के लिए समुचित दबाव नहीं बनाया गया, बल्कि स्पॉट फिक्सिंग की जांच होने तक उन्हें बोर्ड के कामकाज से अलग रखने का जो फैसला लिया गया, उसका प्रावधान बीसीसीआई के संविधान में भी नहीं है!
यानी खेल संघों की स्वायत्तता न सिर्फ भ्रष्टाचार करने, बल्कि मामले की लीपापोती करने की भी पर्याप्त छूट देती है। बीसीसीआई अपने दागी अध्यक्ष को हटाने का साहस भले न जुटा पाए, लेकिन क्रिकेट की गरिमा बचाए रखने के लिए सरकार को कुछ करना ही पड़ेगा।