पिछले कुछ दिनों से रेलवे स्टेशन की बुकस्टॉलों पर कई चर्चित और लोकप्रिय किताबें दिखाई नहीं दे रही हैं। अचानक कुछ शुद्ध साहित्यिक प्रकाशकों के जनप्रिय प्रकाशन (प्रेमचंद आदि) तो मिल भी जाएंगे, लेकिन पत्रिकाओं की भीड़ में पारंपरिक लोकप्रिय पेपरबैक्स गायब मिलेंगी।
प्रकाशकों और वितरकों के बीच चल रही अजीब किस्म की इस कश्मकश का यह दिलचस्प दौर है। सब जानते हैं कि 1887 से, ब्रिटिश जमाने में बनी ए.एच.व्हीलर एंड कंपनी का ढाई सौ से ज्यादा रेलवे स्टेशनों पर एकाधिकार है। दक्षिण में यह अधिकार हिगिन्स बॉथम के पास है। प्रकाशक कहते हैं कि एकाधिकार की वजह से व्हीलर के पास दबाव की रणनीति बनाने का अधिकार भी आ गया है, इसलिए उनकी किताबें स्टॉलों से हट गई हैं।
वे तो चाहते हैं कि उनका व्यवसाय चले, पाठकों तक किताबें पहुंच जाएं, लेकिन वितरण की शर्तो का क्या किया जाए? ए.एच.व्हीलर का अपना बयान है कि स्थानीय व्हीलर बुकस्टॉलों से 'प्राइवेट सेल' यानी प्रकाशकों से अधिक कमीशन पर किताबें लेकर बेचना, व्हीलर के अधिकृत स्टॉक को अनबिका बना देता है। इसलिए हमने होलोग्राम की मांग की और कुछ प्रकाशक इसे मानने को तैयार नहीं हैं।
नतीजतन हम उनके प्रकाशन हटा रहे हैं। पूरा माजरा दिलचस्प है। फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स के अध्यक्ष और राजपाल प्रकाशन के प्रमुख सुधीर मल्होत्रा का कहना है कि एकाधिकार की शक्ति ने व्हीलर को उस जगह खड़ा कर दिया है कि वितरण पाठकों की बजाय वितरक के भरोसे है। वह चाहे तो किताब ही नहीं पहुंचेगी। डायमंड प्रकाशन के प्रमुख नरेन्द्र कुमार जबरदस्त बिक्री के तहत आते हैं, लेकिन व्हीलर के नए आग्रह बाधा बन गए हैं।
नागराज कॉमिक्स और राजा पॉकेट बुक्स के मनीष गुप्ता भी रास्ता निकलने का इंतजार कर रहे हैं। इस रस्साकशी में लोकप्रिय ढंग से रेलवे के स्टॉलों पर मामूली बिकने-दिखने वाले साहित्यिक प्रकाशक प्रसन्न दिखाई देते हैं। राजकमल प्रकाशन के अशोक महेश्वरी को ए.एच.व्हीलर की होलोग्राम नीति उचित जान पड़ती है।
उनके दुष्यंत या प्रेमचंद, व्हीलर के काम आ रहे हैं। लोकप्रिय प्रकाशनों का 'प्राइवेट सेल' बड़ा विचित्र मुद्दा है। व्हीलर के स्थानीय एजेंटों को कंपनी का कमीशन कम और प्रकाशकों से सीधे किताब लेकर ऊपर ही ऊपर बेच देने में कमीशन ज्यादा मिल जाता है।
जाहिर है व्हीलर को नुकसान होता है और उसकी ही स्टॉल पर 'प्राइवेट सेल' वालों को फायदा। लेकिन यह किताबों की वितरण व्यवस्था की एक अजब कहानी है। लाइब्रेरी सप्लाई के भरोसे कई प्रकाशक फले-फूले हैं। उनके पाठकों को सीधी बिक्री में कोई खास रुचि नहीं दिखाई देती।
आजादी के बाद प्रकाशकों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ी है, किताबों की भी, लेकिन एक संस्करण 500 प्रतियों का उस पर भी पाठक की कमी का रोना। रिटेल एजेंटों आदि की व्यवस्था पाठक की परवाह करने के खिलाफ ही दिखाई देती है। वितरण के इस अजीबोगरीब नेटवर्क में एकाधिकार वाला वितरण यदि अपने दबाव बनाता है तो यह स्वाभाविक निष्पति है।
पाठकों को विपुल साहित्य उपलब्ध कराने की रेलवे की गारंटी आजादी पूर्व से व्हीलर के भरोसे है। प्रकाशकों की पारदर्शी नीतियां और वितरकों का समानांतर और पाठक-हितकारी श्रेष्ठ नेटवर्क दोनों अगर मिल जाएं तो सबका भला होगा। मगर सबका भला कौन चाहता है, सबको अपना-अपना भला चाहिए।
‘प्रकाशकों के भी हित में है होलोग्राम की व्यवस्था’
ए.एच.व्हीलर के एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसीडेंट, रंजीत बनर्जी कहते हैं-“देश के कोने-कोने तक रेलवे स्टेशनों पर 'किताबों का कोना' कायम करने वाले ए.एच.व्हीलर के स्टॉल पर अब 'व्हीलर के होलोग्राम' बिना किताबें नहीं बिकेंगी।
जो प्रकाशक इस शर्त को नहीं मानते, उनसे व्हीलर कोई नाता नहीं रखेगा और न ही उनकी किताबों को व्हीलर के स्टॉल पर जगह मिलेगी। होलोग्राम की व्यवस्था प्रकाशकों के भी हित में है, ऐसे में उनकी ओर से विरोध का कोई औचित्य नहीं है। यह व्यवस्था पहले भी थी, तब स्टीकर लगाए जाते थे, लेकिन पाइरेसी, डुप्लीकेसी आदि के आरोप के बाद होलोग्राम अपनाया गया। बिना होलोग्राम किताबों की बिक्री को रोकने के लिए जांच दलों को भी सक्रिय किया गया है।
दरअसल व्हीलर को हाशिये पर रखते हुए कई प्रकाशकों की ओर से सीधे व्हीलर के स्टॉलों पर पुस्तकें सप्लाई की जा रही थीं। इससे न सिर्फ व्हीलर बल्कि रेलवे के राजस्व को भी चूना लग रहा था। रेलवे स्टेशनों पर स्थित व्हीलर स्टॉल के कमीशन एजेंटों और कई प्रकाशकों की ओर से की जा रही धोखाधड़ी से रेलवे को हो रही राजस्व हानि और पुस्तकों की पाइरेसी, अनाधिकृत बिक्री को रोकने के लिए ही ऐसी शर्त जरूरी की गई।
हालांकि तकरीबन तीन वर्ष पहले होलोग्राम अनिवार्य किया गया था। बावजूद इसके अब तक तमाम प्रकाशकों की ओर से उसे नजरअंदाज करते हुए स्टॉल्स को किताबों की सीधे सप्लाई की जा रही थी।
हमने जब इस पर सख्ती से अमल किया तो कई प्रकाशकों ने विरोध शुरू कर दिया। पेंग्विन, रूपा, वेस्टलैंड, राधाकृष्ण, राजकमल, लोकभारती आदि ने व्हीलर की शर्त पर अमल किया है, जबकि ओरियंट पब्लिशिंग, पुस्तक महल, डायमंड पॉकेट बुक्स, हिंद पॉकेट बुक्स, मंजुल पब्लिशिंग, राजा पॉकेट बुक, मनोज पॉकेट बुक आदि इसे मानने से इनकार कर रहे हैं।
व्हीलर अपने सभी स्टॉल्स पर पिन से लेकर पेंटिंग तक की पूरी जिम्मेदारी का निर्वाह करता है। फिलहाल देश के 258 स्टॉल से तकरीबन चार सौ से ज्यादा प्रकाशक जुड़े हैं। अब व्हीलर ने चरणबद्ध तरीके से अपने स्टॉल्स से पुराना स्टॉक मंगाकर 'व्हीलर होलोग्राम' के साथ नया स्टॉक भेजना शुरू किया है। ”