सीआरआईएसपीआर (CRISPR) जीन एडिटिंग टूल ने आनुवंशिक बीमारियों के इलाज की अलख तो जगाई ही है, कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण जैसे नवाचार हमें स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर ले जा रहे हैं। इन वैश्विक बदलावों के बीच सामूहिक पहलों, दूरदर्शी नीतियों तथा शैक्षिक संस्थानों, उद्योगों और सरकार के बीच मजबूत सहयोग के साथ, भारत नवाचार को बढ़ावा देकर न केवल तेज गति से आगे बढ़ रहा है, बल्कि एक नेतृत्वकर्ता की भूमिका भी निभा रहा है।
भारत की बायो ई3 नीति बायो-एआई हब, बायो फाउंड्री और बायोमैन्युफैक्चरिंग हब जैसी उन्नत सुविधाओं के जरिये जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाकर ‘जीव विज्ञान के उद्योग’ का मार्ग प्रशस्त कर रही है। इससे दवाइयों, जैव ईंधन, जलवायु के अनुकूल फसलों और बायोप्लास्टिक्स तथा बायो-सीमेंट जैसे उत्पादों का उत्पादन संभव हो रहा है।
भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रही प्रगति का शानदार उदाहरण अंतरिक्ष कार्यक्रम है, जो दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। सफल चंद्रयान-3 मिशन ने चंद्र अन्वेषण में भारत की स्थिति को मजबूत करने का काम किया है और महत्वाकांक्षी गगनयान परियोजना का उद्देश्य भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजना है, जिससे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी। इसके अलावा, जहां एक ओर इसरो के उपग्रह प्रक्षेपणों ने संचार, मौसम पूर्वानुमान और कृषि योजनाओं में क्रांति लाई है, वहीं दूसरी ओर निजी कंपनियां भी नवाचार के क्षेत्र में सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। इससे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तक सुलभ पहुंच तो बन ही रही है, साथ ही भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को बढ़ावा भी मिल रहा है।
क्वांटम कंप्यूटिंग, संचार, संवेदन और सामग्रियों पर केंद्रित राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (एनक्यूएम) एक और परिवर्तनकारी पहल है। इनके व्यावहारिक लाभों में दवाओं की खोज में तेजी लाना, ऑनलाइन लेनदेन को सुरक्षित करना, अति-सुरक्षित सैन्य संचार को संभव बनाना और ऊर्जा दक्षता में सुधार करना शामिल हैं। गहरे समुद्र में चलने में सक्षम वाहन ‘मत्स्य 6000’ की वजह से भारत का डीप ओशन मिशन भी चर्चा का विषय बना हुआ है। यह अत्याधुनिक वाहन गहरे समुद्र के रहस्यों का पता लगाने, नई समुद्री प्रजातियों की खोज करने और बहुमूल्य संसाधनों को निकालने के लिए समुद्र में हजारों मीटर नीचे उतरने में सक्षम है। यह समुद्री संपदा का जिम्मेदारी से दोहन करने, रोजगार पैदा करने और सतत विकास को सुनिश्चित करते हुए ब्लू इकनॉमी को भी मजबूत करता है।
भारत का राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन भविष्य के लिए स्वच्छ ऊर्जा हासिल करने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है, जिसमें प्रदूषण मुक्त हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली कारों और उद्योगों की कल्पना की गई है। इन सबके बीच, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) हाइपरसोनिक्स में नवाचारों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स का विमानन में उपयोग (एवियोनिक्स) करके मिसाइल प्रौद्योगिकी में आमूलचूल बदलाव तो ला ही रहा है, भारत की तकनीकी ताकत को बढ़ाने के लिए शिक्षाविदों और उद्योग के साथ सहयोग भी कर रहा है। इससे युवा शोधकर्ताओं की इस क्षेत्र में भागीदारी बढ़ रही है और नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है। अगर बात भारत के स्टार्टअप परिदृश्य की करें, तो यह रचनात्मकता और ऊर्जा से भरपूर तथा नवाचार का केंद्र है, जिसे युवा उद्यमियों और सरकारी नीतियों से बढ़ावा मिल रहा है। इसके अलावा, भारत जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य समस्याओं जैसी वैश्विक चुनौतियों को हल करने के लिए यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, अमेरिका और ब्रिक्स जैसे अन्य देशों के साथ सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है।
वैज्ञानिक प्रगति में हो रहे बदलावों का फोकस सिर्फ नई चीजों की खोज या उसे लागू करने के बजाय, विशिष्ट आवश्यकताओं के लिए डिजाइन की गई सामग्री और जैविक उत्पाद बनाने पर है। इनका संचालन एआई और रोबोट से किया जा रहा है। भविष्य में, रोबोट प्रयोगशालाओं में किए जाने वाले कार्यों को संभाल सकते हैं और क्लाउड-आधारित प्रयोगशालाओं के जरिये डिजिटल विचारों को वास्तविकता में बदलकर अभूतपूर्व सफलताएं प्राप्त की जा सकती हैं। हालांकि, वैज्ञानिक प्रगति की इस राह में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे पहला सवाल यह है कि क्या हम वाकई इस नई वैज्ञानिक क्रांति के लिए तैयार हैं? क्योंकि हमारे वैज्ञानिकों के पास जटिल कार्यों के लिए न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही अत्याधुनिक सुविधाएं। इसके अलावा, उभरती प्रौद्योगिकियों में प्रतिभा की कमी भी एक समस्या है।
लिहाजा, हमें सबसे पहले वैज्ञानिक बुनियादी ढांचे में अधिक से अधिक निवेश करके यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्यबल के पास मांगों के अनुरूप नई और उभरती प्रौद्योगिकियों का सही कौशल हो। विदेशी पेटेंट पर निर्भरता को कम करने और देश को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को मजबूती प्रदान करना बेहद जरूरी है। ऐसा तभी संभव है, जब भारत के संस्थान केवल तकनीक पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय समस्या-समाधान पर भी ध्यान केंद्रित करें। राष्ट्रीय लक्ष्यों की दिशा में काम करने वाला वैज्ञानिक समुदाय इन निवेशों को प्रभावशाली परिणामों में बदल सकता है। ये सामूहिक प्रयास जेनरेटिव एआई, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), 5जी, ब्लॉकचेन तकनीक, संवर्धित और आभासी वास्तविकता, क्वांटम कंप्यूटिंग, न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, रोबोटिक ऑटोमेशन, स्वायत्त वाहन, डिजिटल ट्विंस और सिंथेटिक मीडिया जैसी प्रमुख तकनीकों में प्रगति करके वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को मजबूत करेंगे।
(साथ में डॉ. धनंजय तिवारी,ब्राउन यूनिवर्सिटी, अमेरिका के सीनियर फेलो)