पूर्व क्रिकेट प्रशासक ललित मोदी की गोपनीय ढंग से अनुचित मदद करने के आरोप में घिरी भाजपा की दो दिग्गज नेत्रियों, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, को लेकर उठा विवाद अब भी थमता हुआ नजर नहीं आ रहा। थोड़े दिनों पहले तक भी राजधानी दिल्ली में दोनों भाजपा नेत्रियों पर कार्रवाई को लेकर तरह-तरह की चर्चा गर्म थी कि इनमें से एक को कुर्सी छोड़नी पड़ेगी या फिर दोनों में से किसी की कुर्सी नहीं छिनेगी। लेकिन इन दोनों पर लगे आरोपों को मोदी सरकार ने खारिज कर दिया है। सुषमा स्वराज का मामला सामने आने के बाद नेतृत्व तत्काल उनके समर्थन में खड़ा हो गया। और शुरुआती पसोपेश के बाद वसुंधरा राजे को भी पार्टी और सरकार का समर्थन मिला है। चाहे संघ की सलाह हो या नहीं, पर यह तथ्य है कि पहले नितिन गडकरी ने वसुंधरा राजे को क्लीन चिट दी, फिर राजस्थान कैबिनेट ने गडकरी के पक्ष में राज्य को सड़क विस्तार में मदद के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया।
पार्टी और सरकार बेशक इन दोनों के साथ हों, पर मीडिया और राजनीतिक गलियारे में इस पर व्यापक सहमति है कि इससे नरेंद्र मोदी सरकार को कम से कम तीन मोर्चों पर गंभीर नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इससे सबसे पहले तो मोदी की राष्ट्रीय साख को धक्का पहुंच सकता है, क्योंकि वह भ्रष्टाचार को खत्म करने का वायदा कर ही सत्ता में आए हैं, और उन्होंने हर मंच से भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई है। लेकिन उनकी पार्टी की दो वरिष्ठ नेत्रियां भारतीय अधिकारियों की पीठ पीछे विदेशी सरकारों के साथ संपर्क साधती पाई गई हैं। फिर सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे के परिवार के सदस्यों और प्रवर्तन निदेशालय से भागे ललित मोदी के बीच व्यावसायिक सौदों और मदद के भी सुबूत हैं।
सुषमा स्वराज ने ललित मोदी को लंदन से बाहर यात्रा के लिए ब्रिटिश यात्रा दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए बात करने की सच्चाई शुरुआत में ही मान ली। मानवीयता का उनका तर्क अपनी जगह है, पर ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधियों से संपर्क करने के बजाय होना यह चाहिए था कि वह अपने मंत्रालय को ललित मोदी के लिए अस्थायी यात्रा दस्तावेज की व्यवस्था करने के लिए कहतीं और प्रवर्तन निदेशालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलने के बाद सीमित समय के लिए मदद करतीं। खासकर तब, जब प्रवर्तन निदेशालय ने मोदी के खिलाफ काले धन को वैध बनाने समेत कई आरोप लगाए हैं।
इसी तरह वसुंधरा राजे ने ललित मोदी के आव्रजन आवेदन की सिफारिश के लिए ब्रिटिश सरकार को न सिर्फ गोपनीय पत्र लिखा, बल्कि यह शर्त भी रखी कि उनके इस 'सहयोग' की जानकारी भारतीय अधिकारियों को न दी जाए। वह अपने पक्ष में चाहे कुछ कहें, लेकिन सच यह है कि अब तक उस पत्र की अहस्ताक्षरित पत्र की प्रामाणिकता को खारिज करने में वह नाकाम रही हैं, जिसका खुलासा ललित मोदी की कानूनी टीम ने मीडिया के सामने किया था।
तथ्य यह है कि भाजपा की दोनों नेत्रियों के परिवार के सदस्यों और ललित मोदी के बीच पेशेवर रिश्तों और व्यावसायिक सौदों से संबंधित साक्ष्यों से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है कि विदेश मंत्रालय (जिसकी प्रमुख सुषमा स्वराज हैं) द्वारा निरस्त ललित मोदी के पासपोर्ट पर दिल्ली की एक अदालत के फैसला सुनाए जाने के दौरान मोदी के वकील के तौर पर सुषमा स्वराज की बेटी पेश हुई थीं। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि हाई कोर्ट में मोदी के खिलाफ मुकदमा हारने के बाद विदेश मंत्रालय के सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं करने के फैसले को रहस्यमय माना जा रहा है। इसी तरह सरकार के इस तर्क को कोई मानने के लिए तैयार नहीं है कि वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत की घाटे में चल रही कंपनी के शेयर ललित मोदी द्वारा ऊंचे मूल्य में खरीदा जाना एक 'व्यावसायिक सौदा' है। मुख्यमंत्री के तौर पर पुर्तगाल के उस कैंसर अनुसंधान केंद्र को राजस्थान में जमीन आवंटित किए जाने पर भी संदेह जताया जा रहा है, जिसमें ललित मोदी की पत्नी का इलाज हुआ था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह मुद्दा सिर्फ इसलिए जटिल नहीं है कि यह भ्रष्टाचार से जुड़ा है, बल्कि जटिल इसलिए भी हो गया है, क्योंकि इससे सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार में खुलेआम गुटबाजी का खतरा बढ़ गया है। सुषमा स्वराज का मुद्दा सामने आने के तत्काल बाद भाजपा सांसद कीर्ति आजाद ने इसके पीछे एक वरिष्ठ मंत्री का हाथ होने की ओर इशारा किया था। उनका कहना था कि वही नेता इस मुद्दे को मीडिया में ले आए हैं। मानो पार्टी और सरकार के असहज होने के लिए यही कम न हो, कीर्ति आजाद ने आईपीएल घोटाले में, जिसमें ललित मोदी उलझे हैं, उस मंत्री की भूमिका की जांच की मांग कर डाली। इसी तरह भाजपा सांसद आर के सिंह ने भी यह कहकर मुद्दे को और गर्मा दिया है कि ललित मोदी जैसे भगोड़े की मदद करना गलत है, उन्हें पकड़कर भारत लाना चाहिए।
आर के सिंह के बयान का कोई निहितार्थ है या नहीं, मालूम नहीं, पर यह साफ है कि इस मुद्दे पर चुप रहना सरकार की छवि के लिए अच्छा नहीं होगा। प्रधानमंत्री शायद इसीलिए कोई कदम उठाने से बच रहे हैं कि इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। लेकिन ऐसे में, संसद का आगामी सत्र क्या ठीक से चल पाएगा? फिर सवाल ललित मोदी के खिलाफ कार्रवाई का भी है। आर के सिंह ने कहा है कि उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। सरकार अगर इस दिशा में दृढ़ता नहीं दिखाती, तो उसकी छवि को धक्का लगना तय है।
वरिष्ठ पत्रकार और बहनजी- ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती के लेखक