क्वांटम सिद्धांत की बुनियाद यह है कि चीजें जैसी हमें दिखती हैं, वैसी होती नहीं हैं, उनके भीतर एक अलग ही दुनिया होती है, जो ज्ञात नियमों से परे काम करती है। प्रकृति में क्वांटम सिद्धांत के पहले संकेत 1900 में भौतिकविद मैक्स प्लैंक और 1905 में आइंस्टीन के काम में दिखते हैं। उन्होंने इतना समझाया कि प्रकाश एक तरंग नहीं, बल्कि सूक्ष्म कणों के रूप में गति करता है। जर्मन भौतिकशास्त्री हाइजेनबर्ग ने 1925 में क्वांटम विज्ञान को व्यापकता में समझाया, जिसे मैक्स बॉर्न व पास्कुअल जॉर्डन ने आगे बढ़ाया और उसी वर्ष श्रोडिंगर ने इसे सिद्धांत का रूप दिया। 2025 सही मायनों में क्वांटम सिद्धांत का शताब्दी वर्ष होना चाहिए। लेकिन कुछ सवाल फिर भी अनुत्तरित रह गए। जब सत्रहवीं सदी में न्यूटन ने यांत्रिकी के अपने शास्त्रीय सिद्धांत प्रस्तुत किए, भौतिकी के सिद्धांत उसके इर्द-गिर्द ही घूमने लगे।
दरअसल, न्यूटन के सिद्धांतों से लेकर आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत तक सभी ने जिस मूल विचार को आधार बनाया, वह यह था कि अगर कोई ग्रह किसी तारे का चक्कर लगा रहा है, तो उसकी वर्तमान स्थिति और परिवर्तन की दर, दोनों को संज्ञान में लेकर ही उसकी सटीक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। क्वांटम सिद्धांत ने इस विचार को गंभीर झटका दिया। क्वांटम सिद्धांत के अनुसार, हम वस्तुओं की स्थिति व गति को देख सकते हैं, लेकिन भविष्य में इनकी स्थिति अनिश्चित है, क्योंकि यह तरंग के रूप में होती है। असहमति का केंद्र है कि क्या यह तरंग एक वास्तविकता है, या महज वैज्ञानिक कल्पना। समस्या यह है कि तरंग हमें दिखती नहीं, सिर्फ वस्तुएं दिखती हैं। दशकों से वैज्ञानिक इस पर जूझ रहे हैं और टेलीविजन को ऊपर से थपथपा रहे हैं, लेकिन साफ तस्वीर अब तक सामने नहीं आई है। -आधार सामग्री : नेचर